भारत में खतरे में है पेड़ों की 347 प्रजातियां, तमिलनाडु में हैं सबसे अधिक प्रजातियां

भारत में पेड़ों की 3,708 से ज्यादा प्रजातियां हैं, जिनमें से करीब 9.4 फीसदी यानी 347 प्रजातियां खतरे में हैं। भारत पेड़ों की 609 ऐसी प्रजातियों का घर हैं जो मूल रूप से सिर्फ यहीं पाई जाती हैं

By Lalit Maurya

On: Wednesday 02 August 2023
 

भारत में पेड़ों की 3,708 से ज्यादा प्रजातियां हैं, जिनमें से करीब 9.4 फीसदी प्रजातियां खतरे में हैं। पेड़ों की इन संकटग्रस्त प्रजातियों की कुल संख्या 347 है। वहीं भारत पेड़ों की 609 ऐसी प्रजातियों का घर हैं जो मूल रूप से भारत में ही पाई जाती हैं।

पेड़ों की यह ऐसी प्रजातियां हैं जो प्राकृतिक रूप से भारत को छोड़कर किसी अन्य देश या क्षेत्र में नहीं पाई जाती। यह जानकारी वैज्ञानिकों द्वारा भारत में पेड़ों की विविधता और स्थिति का सटीक आंकलन करने के लिए बनाए नए डेटाबेस "ट्रीज ऑफ इंडिया" (टीओआई) में सामने आई है। इससे जुड़ा अध्ययन जर्नल बायोडायवर्सिटी एंड कंजर्वेशन में प्रकाशित हुआ है।

पेड़ न केवल धरती पर जैव विविधता को बनाए रखने और उसके विकास के जरूरी हैं। साथ ही यह जीवों व वनस्पतियों को आवास उपलब्ध कराने में भी मददगार होते हैं। वहीं यदि इंसानों की बात करें तो यह न केवल हमें ऑक्सीजन देते हैं साथ ही भोजन, ईंधन, लकड़ी, औषधीय उत्पादों व अन्य चीजों के जरिए जीवन व जीविका को बनाए रखने में बेहद अहम भूमिका निभाते हैं। इतना ही नहीं यह जलवायु में आते बदलावों और उससे जुड़े खतरों से निपटने में भी मददगार होते हैं।

भारत जैव-विविधता से समृद्ध देश है। यही वजह है कि उसे दुनिया के 36 प्रमुख जैवविविधता हॉटस्पॉट्स में देश के चार क्षेत्रों को भी शामिल किया गया है। हालांकि इसके बावजूद देश में पेड़ों की विविधता के बारे में आंकड़ों का आभाव है।

यही वजह है कि यूनिवर्सिटी ऑफ कश्मीर और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर से जुड़े वैज्ञानिकों के एक दल ने भारत में पेड़ों की विविधता और उनकी स्थिति की स्पष्ट तस्वीर लोगों के सामने लाने के लिए यह डेटाबेस तैयार किया है।

इस अध्ययन में शोधकर्ता अंजार अहमद खुरू के नेतृत्व में वैज्ञानिकों ने 1872 से 2022 के बीच प्रकाशित 313 अध्ययनों का विश्लेषण किया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह अध्ययन उन क्षेत्रों में संरक्षण सम्बन्धी योजनाओं और पारिस्थितिक की बहाली के लिए किए जा रहे प्रयासों में मददगार होगा, जहां अन्य क्षेत्रों के मुकाबले पेड़ों की स्थानीय और संकट ग्रस्त प्रजातियां अधिक हैं।

तमिलनाडु में है पेड़ों की सबसे ज्यादा विविधता

इस अध्ययन के जो निष्कर्ष सामने आए हैं उनके अनुसार भारत के हर राज्य में औसतन पेड़ों की करीब 606 प्रजातियां हैं, और हर प्रजाति कम से कम छह राज्यों में पाई जाती है। देश में पेड़ों की सबसे ज्यादा विविधता तमिलनाडु में है, इसके बाद असम और अरुणाचल प्रदेश का नंबर आता हैं। वहीं पेड़ों की सबसे कम संख्या लद्दाख में रिकॉर्ड की गई है।

रिसर्च से यह भी पता चला है कि देश के हर राज्य में औसतन पेड़ों की करीब 32 संकटग्रस्त और 36 स्थानीय प्रजातियां हैं। वहीं प्रत्येक स्थानीय प्रजाति करीब दो राज्यों में पाई जाती है। आंकड़ों पर गौर करें तो केरल में संकटग्रस्त और स्थानिक दोनों प्रकार की ही प्रजातियों की संख्या सबसे ज्यादा है, इसके बाद तमिलनाडु और कर्नाटक की बारी आती है।

पेपर के अनुसार जहां दिल्ली, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर में पेड़ों की दो-दो स्थानीय प्रजातियां हैं, जबकि लद्दाख, लक्षद्वीप और चंडीगढ़ में यह पूरी तरह नदारद हैं। गौरतलब है कि बॉटनिक गार्डनस कंजर्वेशन इंटरनेशनल द्वारा जारी रिपोर्ट "स्टेट ऑफ द वर्ल्डस ट्रीज" के मुताबिक देश में पेड़ों की कुल 2,611 प्रजातियां हैं, जिनमें से 374 प्रजातियां खतरे में हैं।

वहीं दो स्थानिक प्रजातियां होपिया शिंगकेंग और स्टरकुलिया खासियाना पहले ही विलुप्त हो चुकी हैं, जबकि कोराइफा टैलिएरा जंगलों से लुप्त हो चुकी है। रिपोर्ट के मुताबिक गंभीर रूप से लुप्तप्राय पेड़ों की सूची में कुछ महत्वपूर्ण स्थानिक प्रजातियों में इलेक्स खासियाना, आदिनांद्रा ग्रिफिथआई, पायरेनेरिया चेरापुंजियाना और एक्विलरिया खासियाना शामिल हैं, जो मेघालय में पाई जाती हैं।

इसके साथ ही केरल की अगलिया मालाबेरिका, डायलियम ट्रैवनकोरिकम, सिनामोमम ट्रैवनकोरिकम व बुकाननिया बरबेरी भी इस सूची में हैं, जबकि तमिलनाडु की बर्बेरिस नीलगिरिएंसिस व मेटियोरोमिर्टस वायनाडेन्सिस के साथ ही अंडमान क्षेत्र की शायजिअम अंडमानिकम और वेंडलांडिया अंडमानिकम भी इस लिस्ट में शामिल हैं।

ग्लोबल ट्री असेसमेंट में भी इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि भारत जीविका और पारिस्थितिक सेवाओं के लिहाज से महत्वपूर्ण पेड़ों की प्रजातियों को तेजी से खो रहा है। पेड़ों पर मंडराते खतरे के लिए कहीं न कहीं जंगलों की होती बेतहाशा कटाई, आवास और शहरीकरण के लिए काटे जा रहे पेड़, लकड़ी और अन्य उत्पादों के लिए किया जा रहा दोहन, कृषि, विदेश आक्रामक कीट और बीमारियां जैसे कारण जिम्मेवार हैं।

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