Sign up for our weekly newsletter

उत्तराखंड में 29 डिग्री पहुंचा तापमान, जंगलों में अभी से लगने लगी आग

पिछले 10 साल का रिकॉर्ड बताता है कि उत्तराखंड में फरवरी के पहले पखवाड़े में इतना उच्च तापमान नहीं पहुंचा, जिसे जलवायु परिवर्तन का हिस्सा माना जा रहा है

By Trilochan Bhatt

On: Saturday 15 February 2020
 

उत्तराखंड की केदारनाथ घाटी के ऊंचाई वाले जंगलों में 14 फरवरी की रात से दिख रही हैं आग की लपटें। फोटो : त्रिलोचन भट्टउत्तराखंड वन विभाग का फॉरेस्ट फायर सीजन आज शुरू हो गया है। यह सीजन मानसून आने तक यानी लगभग 15 जून तक चलेगा। लेकिन, इस बार औपचारिक फॉरेस्ट फायर सीजन शुरू होने से पहले ही वनाग्नि की घटनाएं दर्ज की गई हैं। जोशीमठ के पास उर्गम घाटी में 12 और 13 फरवरी को लगातार दो दिन तक जंगल में आग सुलगती रही। केदारनाथ घाटी में तुंगनाथ के पास के जंगलों में 14 फरवरी से आग की लपटें नजर आ रही हैं। आग की इन घटनाओं से वन विभाग की चिन्ताएं बढ़ गई हैं। हालांकि विभाग ने दावा किया है कि जंगलों की आग से निपटने के लिए फॉरेस्ट फायर सीजन शुरू हो जाने से पहले ही सभी तैयारियां पूरी कर दी गई हैं, लेकिन आग की एक-दो घटनाओं से निपटने में दो-दो दिन लग जाने से अंदाजा लगाया जाता है कि पीक सीजन में जब एक ही दिन में सैकड़ों जगहों पर वनों में आग लग जाती है, तब वन विभाग इससे कैसे निपटेगा।

इस बार दिसम्बर और जनवरी के महीने में अच्छी बारिश और बर्फबारी के बाद उम्मीद की जा रही थी कि वनों में आग की घटनाओं में कमी आएगी और आग लगने घटनाएं पिछले वर्षों की तुलना में देर से शुरू होंगी, लेकिन फरवरी पहले पखवाड़े में अचानक तापमान में हुई जबरदस्त बढ़ोत्तरी और चमोली व रुद्रप्रयाग जिलों में आग की घटनाओं ने इस उम्मीद पर पानी फेर दिया है।

पिछले दस वर्षों में पहली बार फरवरी के पहले पखवाड़े में सबसे ज्यादा तापमान दर्ज किया गया। बीते 13 फरवरी को देहरादून में अधिकतम तापमान 29.2 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। वर्ष 2010 के बाद फरवरी के महीने में दो ही ऐसे मौके आए हैं, जब अधिकतम तापमान 29 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंचा। लेकिन, दोनों बार ऐसा फरवरी के दूसरे पखवाड़े में हुआ। 23 फरवरी, 2018 को अधिकतम तापमान 29.5 डिग्री सेल्सियस और 28 फरवरी, 2010 को 29.2 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड किया गया था। फरवरी महीने में देहरादून में अब तक का सबसे ज्यादा अधिकतम तापमान 2006 में 25 फरवरी को दर्ज किया गया था।

देहरादून में मौसम विज्ञान केन्द्र के निदेशक बिक्रम सिंह मानते हैं कि फरवरी के पहले पखवाड़े में तापमान में यह बढ़ोत्तरी अप्रत्याशित है, लेकिन वे कहते हैं कि अगले दिनों में तापमान में कमी दर्ज होगी। इसके बावजूद वे सलाह देते हैं कि वन विभाग को पूरी तरह से सतर्क रहने की जरूरत है।

पर्यावरणविद् रमेश पहाड़ी कहते हैं कि बर्फबारी के कुछ दिन बाद ही कई जगह जंगलों में आग की लपटें नजर आने लगी हैं। यह बेहद चिन्ताजनक स्थिति है। वे कहते हैं कि यदि समय रहते सभी बंदोबस्त नहीं किये गये तो स्थितियां 2016 से भी बदतर हो सकती हैं। उल्लेखनीय है कि 2016 में उत्तराखंड के जंगलों में आग की अब तक की सबसे ज्यादा और सबसे भयावह घटनाएं घटी थी। उस वर्ष कुल 4,538 हेक्टेयर वन क्षेत्र आग की भेंट चढ़ गया था। वर्ष 2010 से 2019 तक राज्य में कुल 19,945 हेक्टेयर वन आग से स्वाहा हुए, यानी कि हर साल औसतन 1994 हेक्टेयर वनों में आग लगी।

वन विभाग के अधिकारियों का दावा है कि वनों की आग से निपटने की सभी तैयारियां पूरी कर दी गई हैं। वन विभाग में फॉरेस्ट फायर के नोडल अधिकारी बीके गांगटे ने दावा किया है कि वनों की आग से निपटने के लिए 40 मास्टर कंट्रोल रूम और 175 वॉच टावर बनाये गये हैं। इसके अलावा 1437 क्रू स्टेशन बनाए गये हैं, जिनमें 24 घंटे कर्मचारी तैनात रहेंगे। उनका दावा है कि आग की सूचना देने के लिए इस बार 35 रिपीटर, 506 वायरलेस सेट, 1631 हैंडसेट और 199 मोबाइल सेट की व्यवस्था की गई है।

मध्य हिमालयी क्षेत्र के वनों में हर साल होने वाली आग की घटनाओं पर नजर रखने वाले उत्तराखंड वानिकी एवं औद्यानिकी विश्वविद्यालय के पर्यावरण विभाग के अध्यक्ष डॉ. एसपी सती वन विभाग के इन दावों पर सवाल उठाते हैं। वे कहते हैं कि वन विभाग हर वर्ष ऐसे दावे करता है, लेकिन फिर भी हर साल हजारों हेक्टेयर वन जल जाते हैं। वे कहते हैं कि उत्तराखंड के ज्यादातर घने जंगल बेहद दुर्गम हैं, इन जंगलों में लगी आग बुझाने के लिए आज तक विभाग कोई कारगर उपाय नहीं कर पाया है।