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बैठे ठाले: पानीपत, एक युद्ध कथा

अब्दाली आज भी अफगानिस्तान की पहाड़ियों में अपने आधार कार्ड, पासपोर्ट, बिजली बिल, वोटर आईडी जैसे कागजात ढूंढ़ रहा है

By Sorit Gupto

On: Monday 06 January 2020
 
पानीपत, एक  युद्ध कथा
सोरित / सीएसई सोरित / सीएसई

अफगान बादशाह अहमदशाह अब्दाली और मराठा पेशवा सदाशिवराव भाऊ के बीच किसी बात पर बहस हो जाती है और मामला जंग तक जा पहुंचता है। दोनों जंग की तैयारी में जुट जाते हैं। अब्दाली स्वीडन से बोफोर्स खरीदता है तो सदाशिवराव फ्रांस से राफेल की खरीदारी करता है।

जंग की तैयारी के अगले चरण में सदाशिवराव और अहमदशाह अब्दाली क्रमशः मराठा और अफगान इकॉनमी को “वार-इकॉनमी” में बदल देते हैं। शिक्षा, जनस्वास्थ्य, किसानों को दी जाने वाली सब्सिडी, बूढ़ों को दी जाने वाली पेंशन को खत्म कर दिया जाता है। दोनों अपने-अपने देश के रिजर्व बैंक से आपातकालीन धन को निकाल लेते हैं। इस पैसे का एक बड़ा हिस्सा सदाशिवराव और अहमदशाह अब्दाली विज्ञापनों पर खर्च करते हैं। भाऊ अपने देश और अब्दाली अपने मुल्क के एयरपोर्टों, तेल कंपनियों और फायदे में चलने वाली सभी सरकारी उपक्रमों को औने पौने दाम पर बेचना शुरू कर देते हैं। टीवी चैनलों के एंकर रामलीला कमेटियों से ड्रेस किराए पर उठा लाए हैं।

बस एक दिक्कत है। “मेक-माई-वाॅर” ऐप दिखाता है कि पानीपत के जंग के मैदान में बुकिंग पूरे सालभर के लिए फुल है। यह सुनकर न केवल मराठा और अफगानी सेना बल्कि आम जनता में भी मातम छा जाता है। उन दिनों लड़ाई करने के लिए पानीपत का मैदान मशहूर था। दिल्ली से नजदीक होने की वजह से खबरिया चैनलों को युद्ध का लाइव टेलिकास्ट करने में सुविधा होती थी। इसके अलावा जंग में आया सैनिक जंग के बाद दिल्ली-दर्शन और बीवी-बच्चों के लिए मार्केटिंग भी कर लेता। इसकी बस एक छोटी से शर्त थी, उसे बस जिंदा बचे रहना था।

अपनी इन खूबियों के चलते पानीपत की लोकप्रियता का आलम यह था कि जंग की तारीख बरसों बाद की मिलती थी। बड़ी मशक्कत के बाद आखिरकार 14 जनवरी 1761 की डेट मिलती है।

दोनों सेनाएं आमने सामने हाजिर हो गईं। लड़ाई बस शुरू होने को थी कि अचानक दूर काले धुएं के बादल उठने लगते हैं। पता चलता है कि हरियाणा-पंजाब के किसानों ने पराली जला दी है। पराली के धुएं और राख से मराठा सेनाएं बुरी तरह खांसने लगती हैं पर अफगानी सेनाओं पर इस धुएं का कोई असर नहीं पड़ रहा है क्योंकि भारत में एंट्री से पहले अहमदशाह अब्दाली ने चांदनी चौक से चाइनीज फेस मास्क खरीद लिए थे।

मराठा सेना का खांसते–खांसते बुरा हाल है। उधर मौके का फायदा उठाकर अफगानी सेना मराठा सैनिकों को गाजर-मूली की तरह काट देती है। अहमदशाह अब्दाली जीत जाता है।

सदाशिवराव भाऊ मायूस हो जाता है। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि मराठाओं ने अहमदशाह अब्दाली को भारत से भगाने के लिए एक अनूठी चाल चली। मराठा सूबेदार मल्हार राव भोंसले के सुझाव पर सदाशिव राव भाऊ सिटिजनशिप अमेंडमेंट बिल और नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन ले आया और अहमदशाह अब्दाली से कहा, “ओ अब्दाली! गांधी के देश में हिंसा का क्या काम? तुम्हें हिन्दुस्तान पर राज करना है न? तो करो, किसने मना किया है? बस तुम अपनी नागरिकता का प्रमाणपत्र ले आओ फिर चाहे जब तक राज करो।”

कहते हैं कि अब्दाली आज भी अफगानिस्तान की पहाड़ियों में अपने आधार-कार्ड, पासपोर्ट, इलेक्ट्रिसिटी बिल, वोटर आई-डी जैसे कागजात ढूंढ़ रहा है।