नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज की अवधि विस्तार पर लगा पूर्ण विराम, तीन दशकों से चल रहे आदिवासी आंदोलन की बड़ी जीत

तोप दागने के सघन अभ्यास के चलते यहां बसे आदिवासी समुदायों को उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा, उससे फील्ड फायरिंग रेंज विरोधी जन संघर्ष समिति जैसा संगठन वजूद में आया

By Satyam Shrivastava

On: Saturday 20 August 2022
 
नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज की अवधि विस्तार रद्द करने की मांग को लेकर 245 गांवों के आदिवासी तीन दशक से संघर्षरत थे। फोटो: एलिन अर्चना लाकड़ा
नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज की अवधि विस्तार रद्द करने की मांग को लेकर 245 गांवों के आदिवासी तीन दशक से संघर्षरत थे। फोटो: एलिन अर्चना लाकड़ा नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज की अवधि विस्तार रद्द करने की मांग को लेकर 245 गांवों के आदिवासी तीन दशक से संघर्षरत थे। फोटो: एलिन अर्चना लाकड़ा

झारखंड सरकार ने नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज की अवधि विस्तार रद्द कर दी है। 11 मई 2022 को इसकी अवधि समाप्त हो गई थी जिसे आगे बढ़ाया जाना था। अविभाजित बिहार सरकार ने 1954 में सेना मैनूवर्स फील्ड फायरिंग आर्टिलरी एक्ट, 1938 की धारा 9 के तहत नेतरहाट पठार के सात राजस्व गांवों में 8 वर्ग किलोमीटर को सेना द्वारा टोपाभ्यास के लिए अधिसूचित किया गया था। 1964 से लेकर 1994 तक लगभग 30 तीस सालों तक यहाँ रूटीन तोपाभ्यास होता रहा है। 

1991-92 में अविभाजित बिहार सरकार ने गजट नोटिफिकेशन के जरिये इस फायरिंग रेंज के क्षेत्र का दायरा और अवधि  बढ़ा दी। इस गज़ट नोटिफिकेशन के जरिये इसमें लातेहार और गुमला के 157 मौजों  के मातहत 245 गांव की 1471 वर्ग किलोमीटर भूमि को अधिसूचित किया गया था जिसे 2002 तक के लिए बढ़ा दिया गया। जिसे 1999 में पुन: बिहार सरकार ने इसकी अवधि 11 मई 2022 तक के लिए बढ़ा दी। 

1964-94 तक तोप दागने का सघन और निरंतर अभ्यास चला था। शुरूआत के चार-छह सालों यानी 1964-70 के बीच यहाँ सेना अपने छावनी बनाकर रही और सघन तोपाभ्यास किया। उसकी कड़वीं यादें अभी भी पीढ़ी दर पीढ़ी यहाँ बसे आदिवासी समुदायों में मौजूद हैं। इन चार सालों में सघन अभ्यास के दौरान जो प्रताड़ना और उत्पीड़न इन दो जिलों के जंगली इलाकों में सदियों से बसे आदिवासी समुदायों का हुआ उससे यहाँ फील्ड फायरिंग रेंज विरोधी जन संघर्ष समिति जैसा संगठन वजूद में आया। यह संगठन आज़ाद हिंदुस्तान में उन कुछ विरले सामाजिक संगठनों और अहिंसक आंदोलनों में गिना जाता है जो तीन दशकों की लंबी अवधि में निरंतर जारी रहा। 

यह पूरा क्षेत्र संविधान की पाँचवीं और ग्यारहवीं अनुसूची के दायरे में आता है जहां 1996 में संसद से पारित हुआ पेसा कानून लागू है। हालांकि झारखंड में पंचायती राज व्यवस्था का क्रियान्वयन बहुत देर से हुआ है इसलिए पेसा कानून के क्रियान्वयन की स्थिति भी अच्छी नहीं है। हालांकि जन समुदायों में इस कानून और उन्हें मिले विशिष्ट सांवैधानिक संरक्षण को लेकर बड़े पैमाने पर जागरूकता रही है और यह भी पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ती ही गयी है। 

झारखंड की राजनीति में यह मामला और यह आंदोलन हमेशा चर्चा में रहा है। इसकी बड़ी वजह इस 1475 वर्ग किलोमीटर में मौजूद तीन विधानसभा क्षेत्रों का होना है। एक लिहाज से जन संघर्ष समिति का निर्वाचन की राजनीति में एक विशिष्ट महत्व रहा है इसलिए झारखंड राज्य के गठन के साथ ही तमाम राजनैतिक दलों ने इस मुद्दे पर कसमों –वादों का लोक लुभावन अंदाज़ तो बनाए रखा लेकिन कभी भी इन 245 गांवों के साथ हुईं और जारी रहीं ज़्यादतियों पर खुलकर कोई पक्ष नहीं लिया। सत्ता में रहते वक़्त इन गांवों को भूल जाना लेकिन विपक्ष में रहते हुए इस मुद्दे को ज़ोर शोर से उठाते रहना एक ऐसी रस्म बन गयी जिसे हर दल ने निभाया लेकिन आडवासी समुदायों को इससे कुछ हासिल नहीं हुआ। 

गठबंधन सरकार के मुखिया हेमंत सरकार ने इस बार पहली दफा इस रस्म को एक सार्थक अंजाम तक पहुंचाने का निर्णय लिया। यहाँ उल्लेखनीय है कि झारखंड मुक्ति मोर्चा अपने गठन के शुरूआत से ही नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज और इसकी वजह से आदिवासी समुदायों के साथ हुए अंत्याचारों क लेकर गंभीर रहा है और कई कई बार इस मुद्दे को संसद से सदन तक उठाया है। इस बार हेमंत सोरेन ने उन्हें मिले इस मौके का सार्थक इस्तेमाल करते हुए 245 गांवों को अभयदान दिया है। 

नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज को अवधि विस्तार न दिये जाने के पीछे जो कारण गिनाए जा रहे हैं उनका विस्तार से ज़िक्र 4 जून 2022 को लातेहार जिले के उपायुक्त (कमिश्नर) के उस पत्र में मिलता है जो उन्होंने झारखंड सरकार के प्रधान सचिव को लिखा है। इस पत्र में उपायुक्त ने जन संघर्ष समिति के उस सर्वे को शामिल किया जो इस संगठन ने फायरिंग रेंज में अभ्यास करने आए सैनिकों द्वारा स्थानीय समुदायों, विशेष रूप से आदिवासी महिलाओं पर हुए अत्याचारों को जानने के लिए कराया गया था। इस सर्वे से निकले निष्कर्षों को उपायुक्त ने दिल दहलाने वाला बताया।

अपने इस पत्र में इस सर्वे के निष्कर्षों को ज्यों का त्यों उल्लेख करते हुए लिखा गया है कि –“सेना के जवानों द्वारा आदिवासी महिलाओं के साथ बलात्कार किया जाना एक आम घटना थी। ऐसी दो महिलाओं का ज़िक्र इस सर्वे में आया है जो सैनिकों द्वारा सामूहिक बलात्कार के बाद जिंदा नहीं बच पायीं। जो बलात्कार के बाद भी बची रह गईं ऐसी महिलाओं की संख्या कम से कम 28 है। तोपाभ्यास के दौरान और उसकी वजह से कम से कम 30 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। गोला विस्फोट की वजह से 3 लोगों को अपंगता का शिकार होना पड़ा। इसके अतिरिक्त आदिवासियों की भेड़, बकरियाँ, मुर्गियाँ सेना के जवानों द्वारा लूटी जाती रहीं”। 

इस पत्र में समय समय पर संगठन और सरकार के बीच हुई बातचीत का भी हवाला दिया गया लेकिन इसका किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुँच पाने के कारणों का भी ज़िक्र किया गया है। 

इस पत्र में आयुक्त ने जन संघर्ष समिति के उन तर्कों को उचित करार दिया जो इस आंदोलन के दौरान पिछले तीस सालों से दिये जा रहे हैं। उपायुक्त ने अपने पत्र में लिखा है कि “लातेहार व गुमला जिला संविधान की पाँचवीं अनुसूची क्षेत्र के अंतर्गत आता है। यहाँ पेसा एक्ट लागू है। जिसके तहत ग्राम सभा को सांवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं। इसी के तहत नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज के प्रभावित इलाके के ग्राम प्रधानों ने प्रभावित जनता की मांग पर ग्राम सभा का आयोजन कर नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज के लिए गाँव की सीमा के अंदर की ज़मीन सेना के फायरिंग अभ्यास के लिए उपलब्ध न कराने का निर्णय लिया है। साथ ही नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज की अधिसूचना को आगे और विस्तार न कर विधिवत अधिसूचना प्रकाशित कर परियोजना को रद्द करने का अनुरोध किया है”। 

इस पत्र में 2021 और 2022 के बीच आयोजित हुईं ऐसी 39 ग्राम सभाओं का विवरण भी दिया गया है जिन्होंने सर्वसम्मति से इस परियोजना को रद्द किए जाने के प्रस्ताव पारित किए हैं जो राज्यपाल को भी भेजे गए हैं। 

अंत में यह सिफ़ारिश इस पत्र में की गयी है कि “सेना मैनूवर्स फील्ड फायरिंग आर्टिलरी एक्ट, 1938 के अध्याय -2 की धारा 9 में फील्ड फायरिंग रेंज और तोपाभ्यास के संचालन संबंधी समस्त शक्तियाँ राज्य सरकार के अधीन हैं अत: राज्य सरकार इस बावत निर्णय ले सकती है। ग्राम सभाओं द्वारा पारित प्रस्तावों को सम्मान देते हुए ही इस विषय में यथोचित निर्णय लिया जाना चाहिए”। 

इस पत्र को संज्ञान में लेते हुए ही राज्य सरकार ने इसकी अवधि विस्तार को रद्द करने का निर्णय लिया है। हेमंत सोरेन को इस कदम के लिए ज़रूर श्रेय दिया जाना चाहिए कि उन्होंने आदिवासी समुदायों के हितों को ध्यान में रखा है। यहाँ उल्लेखनीय है कि सरकार में आकार हेमंत सोरेन ने वो दोनों वादे पूरे कर दिये हैं जो उन्होंने जनता से किए थे। पहला वादा था ऐसी सभी लोगों पर लगे देशद्रोह के मुकद्दमें वापिस लेना जो राज्य में चले पतथलगाड़ी आंदोलन के दौरान भाजपा की सरकार ने थोपे थे और दूसरा फील्ड फायरिंग रेंज को निरस्त करना। 

जन संघर्ष समिति इसे एक बड़ी जीत मानती है और 1964 से उनके ऊपर हुए अत्याचारों से मुक्ति के रूप में देख रही है लेकिन जहां तक सवाल इन समुदायों की खुशहाली का है तो अभी बाक्साइट खनन और टाइगर रिजर्व के रूप में नयी और गंभीर चुनौतियाँ सामने हैं। समिति के संयोजक जेरोम जेराल्ड कुजूर कहते हैं कि – “ हालांकि अभी यह परियोजना पूरी तरह से रद्द नहीं हुई है बल्कि अभी झारखंड सरकार ने इसकी अवधि को आगे नहीं बढ़ाने का फैसला ही लिया है। लेकिन जन संघर्ष समिति सरकार के इस फैसले का स्वागत करती है और यह मांग करती है कि केंद्रीय गृहमंत्रालय से भी इसे पूरी तरह रद्द करवाने का प्रयास करे"।  

जेरोम कुजूर कहते हैं कि –“इस बात का संतोष है कि हेमंत सोरेन और गठबंधन की सरकार ने आदिवासियों के सांवैधानिक अधिकारों को तवज्जो दी है और उनका सम्मान किया है लेकिन अभी भी पेसा कानून अपनी मूल भावना के साथ इस राज्य में लागू नहीं हो पाया है और वनाधिकार कानून की स्थिति भी बहुत खराब है। अब सरकार को चाहिए कि वो इन दोनों क़ानूनों के सही क्रियान्वयन पर जोर दे जिसमें उसे समुदाय की तरफ से पूरा समर्थन हासिल होगा। खुद समुयाय भी अब वनाधिकार के तहत अपने अधिकारों को हासिल करने की दिशा में सक्रिय पहल करेंगे”। 

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