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भारी खर्च के बाद भी कई राज्यों में कोई एकलव्य स्कूल चालू नहीं हुआ

झारखंड में 13 विद्यालयों को मंजूरी दी गई और 2018 तक 130 करोड़ रुपए जारी भी किए गए लेकिन आदिवासियों के लिए कोई स्कूल कार्यात्मक नहीं बनाया जा सका 

By Bhagirath Srivas

On: Thursday 21 March 2019
 
Credit: Kumar Sambhav Shrivastava
Credit: Kumar Sambhav Shrivastava Credit: Kumar Sambhav Shrivastava

देश के पिछड़े क्षेत्रों में आदिवासियों के बच्चों के लिए नवोदय विद्यालय की तर्ज पर खोले जाने वाले एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों (ईएमआरएस) पर भारी धनराशि खर्च तो हो रही है लेकिन कई राज्यों में कोई स्कूल चालू नहीं हुआ है। उदाहरण के लिए मौजूदा मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद अरुणाचल प्रदेश में पांच ईएमआरएस को मंजूरी दी गई। 2017-18 तक इसके लिए 48.68 करोड़ रुपए जारी भी किए गए लेकिन अब तक किसी भी विद्यालय को कार्यशील नहीं बनाया गया है।

इसी तरह झारखंड में 13 ईएमआरएस को मंजूरी दी गई और 2018 तक 130 करोड़ रुपए जारी भी किए गए लेकिन आदिवासियों के लिए कोई स्कूल कार्यात्मक नहीं बनाया जा सका। ओडिशा में 11 स्कूलों को स्वीकृति मिली लेकिन मार्च 2018 तक कोई स्कूल कार्यशील नहीं बनाया जा सका। हालांकि जनवरी 2019 में पांच विद्यालयों के कार्यशील होने की जानकारी दी गई।

यह जानकारियां “वादा फरामोशी: फैक्ट्स नॉट फिक्शन बेस्ड ऑन आरटीआई” पुस्तक में संकलित हैं। किताब को आरटीआई कार्यकर्ता संजॉय बासु, नीरज कुमार और पत्रकार शशि शेखर ने लिखा है। इस किताब में केंद्र सरकार की कई योजनाओं की पड़ताल आरटीआई के माध्यम से की गई है। किताब के अध्याय “एकलव्य का अंगूठा आज भी कट रहा है” में कहा गया है कि सरकार उत्तर-पूर्व के राज्यों में कोई ईएमआरएस को कार्यशील बनाने में सफल नहीं हो पाई है।

किताब के लेखक संजॉय बासु का कहना है, “विकास के पायदान पर सबसे पीछे खड़े आदिवासी सदियों से उत्पीड़न और धोखे का शिकार होता रहा है। ये अलग बात है कि आदिवासियों के नाम पर अरबों रुपए की योजना बनाई जाती रही है। लेकिन उसका फायदा शायद ही जमीन पर पहुंचा हो। एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय भी इसका एक उदाहरण है।”  

क्या है ईएमआरएस

साल 2000-01 में तत्कालीन एनडीए सरकार ने देशभर में विशेष रूप से जनजातीय आबादी के लिए इस विद्यालय योजना की शुरुआत की थी। इसके तहत तमाम सुविधाओं से युक्त आवासीय विद्यालय स्थापित किए जाने हैं। योजना का मकसद हाशिए पर खड़े आदिवासियों के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण विद्यालय में पढ़ने का अवसर देना है ताकि उनका सर्वांगीण विकास हो सके। ये विद्यालय केंद्र सरकार द्वारा 100 प्रतिशत वित्त पोषित हैं।

2018 तक सिर्फ एक विद्यालय का निरीक्षण

सूचना के अधिकार के तहत किताब के लेखकों ने पूछा था कि केंद्र सरकार ने विद्यालयों की जमीनी हकीकत को जानने के लिए कितने नियमित या सरप्राइज दौरे किए। जवाब में बताया गया कि 2018 तक इस तरह का केवल एक निरीक्षण किया गया और वह भी मध्य प्रदेश के सिंजोरा से प्राप्त भ्रष्टाचार की विशेष शिकायत पर।  

गुजरात के पांच विद्यालयों में 299 छात्र

गुजरात में पांच वर्षों में पांच नए ईएमआरएस खोलने की मंजूरी मिली। आरटीआई से प्राप्त सूचना में सभी को कार्यशील दिखाया गया है। इन विद्यालयों के लिए 40.4 करोड़ की धनराशि का वितरण भी किया गया लेकिन इन पांच स्कूलों में छात्रों की कुल संख्या 299 ही है।