यात्रा वृतांत: उत्तराखंड का यह गांव, जहां से युवा नहीं करते पलायन

उत्तराखंड के गांव के गांव खाली हो रहे हैं। सबसे पहले युवा रोजगार की तलाश में पलायन करते हैं, लेकिन इन गांवों में ऐसा नहीं है

By Mahipal Mohan

On: Wednesday 18 May 2022
 
उत्तराखंड के पिंडारी ग्लेशियर के पास बसा गांव खाती। फोटो: महिपाल मोहन
उत्तराखंड के पिंडारी ग्लेशियर के पास बसा गांव खाती। फोटो: महिपाल मोहन उत्तराखंड के पिंडारी ग्लेशियर के पास बसा गांव खाती। फोटो: महिपाल मोहन

अप्रैल माह की शुरुआत में मुझे उत्तराखंड के पिंडारी ग्लेशियर के पास के खाती और बाछम गांव में जाने का मौका मिला। वहीं बागेश्वर ज़िले के कपकोट ब्लॉक के अंदर मौजूद है तल्ला दानपुर मला दानपुर, जिसे भारत का अंतिम गांव भी कहा जाता है।

बागेश्वर से चार से पांच घंटे सड़क मार्ग से जाने के बाद लगभग पांच किमी की पैदल यात्रा करने के बाद हम वहां पहुंचे। पिण्डारी ग्लेशियर मार्ग पर स्थित खाती गांव एक ऐसा क्षेत्र है जहां आज के समय में भी मोबाइल का नेटवर्क नहीं आता है।

यहां के लोग एक दूसरे से वॉकी-टॉकी से संपर्क करते हैं, और जरूरी सूचना एक गांव से दूसरे गांव तक देते हैं। गांव के लोगों ने बताया कि 2022 के विधानसभा चुनाव के समय इस क्षेत्र में पहली बार एक भारत संचार निगम लिमिटेड (वीएसएनएल) का टावर लगाया गया है। लेकिन उसके बाद भी हफ्ते में एक से दो ही दिन नेटवर्क बमुश्किल आ पाता है।

फिर भी पूरे क्षेत्र के अधिकतर युवा गांव में ही मौजूद थे। मेरे लिए यह आश्चर्यजनक बात थी, क्योंकि जहाँ एक ओर पूरे राज्य भर में लगातार पलायन हो रहा है, वहीं इसके उलट इस गांव के युवा गांव में ही रहकर आजीविका चला रहे हैं।

आखिर कैसे? मन में सवाल उठना लाजिमी भी है कि इतना दुर्गम क्षेत्र होने के बाद भी अधिकतर युवा गांव में क्यों और कैसे मौजूद हैं?

स्थानीय लोगों से बात करने पर पता चला कि इस गांव के पास आजीविका के लिए खेती के साथ-साथ पर्यटन और दूसरी सबसे महत्वपूर्ण जो चीज मौजूद है वह हैं इनकी गांव की वन पंचायत “इनके अपने जंगल”।

जंगल न केवल जंगली पशु-पक्षियों, कीट पतंगों को बल्कि इनके आस-पास बसे इन्सानों को भी पालते आए हैं और आगे भी पालते रहेगे। पिंडारी ग्लेशियर के इस भू-भाग के लोग इन्हीं जंगलों से पीढ़ियों से अपनी आजीविका चलाते आए हैं और अभी भी चला रहे हैं।

इस पूरे क्षेत्र में कई तरह की जड़ी-बूटियां जैसे बाल जड़ी, हथा जड़ी, कीड़ा जड़ी, अतीस, गोकुल धूप, वन तुलसी और अनेक तरह के वन संपदा मौजूद है। साथ ही रिंगाल से बनने वाले सामान जैसे- टोकरी, सूप और चटाइयाँ भी यहाँ के कई काश्तकार बनाते हैं।

ग्लेशियर होने के कारण गर्मियों के समय पर्यटक भी यहां आते हैं। कई छोटे-छोटे होम स्टे- और गेस्ट हाउस से लेकर ट्रैकिंग तक का काम यहां होता है। स्थानीय युवा इस मौसम में गाइड का काम करते हैं, साथ ही पास के बाछम गांव के लोग घोड़ों और खच्चरों के द्वारा सामान ढोने का काम भी करते हैं, जिस कारण इन सभी की जीविका एक दूसरे से जुड़ी हुई है।

गांव जो हमेशा ही खूबसूरत होते हैं हर कोई उसे देखना और महसूस करना चाहता है। लेकिन उसे जीवंत रखते हैं वहां के लोग, वह भी युवा पीढ़ी , जैसे कोई भी घर बिना बच्चों के सुनसान लगता है।

ठीक उसी तरह गांव भी बिना युवाओं के वीरान पड़ जाते हैं। आज उत्तराखंड की स्थिति भी ठीक उसी तरह हो चुकी है। युवाओं की आबादी धीरे-धीरे गांवों से घटती जा रही है। कोई बेहतर जीविका की तलाश में तो कोई बेहतर शिक्षा या स्वास्थ्य के लिए गांव छोड़ रहे हैं।

बचे हुए लोग जो किसी सरकारी संस्थान में कार्यरत है, तो वह भी आज अपनी भावी पीड़ी के भविष्य के लिए राज्य के मैदानी (तराई) क्षेत्रों या देश के महानगरों की ओर दौड़ रहे हैं।

लोग पलायन क्यों करते हैं? यह भी समझना जरूरी है। खासकर हमारे पहाड़ी इलाकों का कृषि आधार वहां रहने वाले सभी लोगों को रोजगार प्रदान नहीं करता है और विकास में असमानता लोगों को ग्रामीण से शहरी क्षेत्रों में जाने के लिये विवश करती है।

साथ ही शैक्षणिक सुविधाओं की कमी बेहतर स्वास्थ्य और बेहतर चिकित्सा सुविधाओं की कमी में भी पलायन करते हैं। कई क्षेत्रों में जातीय संघर्ष के कारण भी लोग अपने घरों से दूर चले जाते हैं। गरीबी और रोज़गार के अवसरों की कमी लोगों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के लिये प्रेरित और मजबूर करती है।

आज के समय में जलवायु परिवर्तन से दिन प्रति दिन बदतर होती खेती के कारण ग्रामीण लोग शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन कर रहे हैं।

उत्तराखंड पलायन आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि अलग राज्य बनने के बाद उत्तराखंड से करीब 60 प्रतिशत आबादी यानी 32 लाख लोग अपना घर छोड़ चुके हैं। पलायन आयोग की रिपोर्ट कहती है कि 2018 में उत्तराखंड के 1,700 गांव भुतहा हो चुके हैं, जबकि करीब एक हजार गांव ऐसे हैं, जहाँ सौ से कम लोग बचे हैं। कुल मिलाकर 3900 गांवों से पलायन हुआ है। पलायन आयोग की पहली रिपोर्ट के अनुसार 2011 में उत्तराखंड के 1034 गांव खाली थे।

साल 2018 तक 1734 गांव खाली हो चुके थे. राज्य में 405 गांव ऐसे थे, जहाँ 10 से भी कम व्यक्ति हैं। अकेले पौडी में 300 से ज्यादा गांव खाली थे। इस रिपोट के अनुसार अकेले अल्मोड़ा जिले में ही 70 हजार लोगों ने पलायन किया है। किसी भी राज्य की ताकत जिसे माना जाता है वो हैं युवा और उत्तराखंड में पलायन करने वालों में 42.2 फीसदी युवा है।

जब ब्रिटिश भारत में आए तो वह धीरे-धीरे पूरे देश भर में फैले, इस तरह के ठंडे स्थानों जैसे मसूरी, नैनीताल, शिमला, दार्जिलिंग, रानीखेत को अपने आशियानों के तौर पर चुना और विकसित किया। इस गांव में ब्रिटिश समय का एक डॉक बंगला मौजूद है जो 1890 का बना हुआ है।

अब इसे पीडब्ल्यूड़ी के गेस्ट हाउस के नाम से जाना जाता है। बागेश्वर से पिंडारी तक ब्रिटिश समय में ही एक पैदल मार्ग बनाया गया था जो इन क्षेत्रों को लोगों और पर्यटकों की आवाजाही के लिए सुगम मार्ग अभी भी कहीं कहीं पर मौजूद हैं।

एक स्थानीय युवा लोकपाल बताते हैं कि गर्मी के मौसम में जब बर्फ पिघलती है तो हम सब इन बुगयालों में जड़ी बूटी खोजने के लिए जाते हैं जिससे एक व्यक्ति इन दो महीनों में लगभग 60 से 80 हजार रुपये तक की जड़ी इकट्ठा कर लेते हैं। जिस घर में जितने अधिक सिर (लोग) होंगे उनकी कमाई भी अधिक होती है।

इसीलिए गांव के जो युवा काम के लिए या उच्च शिक्षा पाने के आसपास के शहरों या अन्य राज्यों में जाते हैं, वो सभी युवा इस समय में छुट्टी लेकर वापस अपने गांव वापस आ जाते हैं। यहां के कुछ लोगों का पलायन भी बिहार, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों की तरह मौसमी पलायन होता है।

जहां कुछ समय के लिए मैदानी या किसी अन्य राज्य में मजदूरी या किसी निजी कम्पनी में काम करने चले जाते हैं। और कुछ समय के बाद वापस अपने गृह क्षेत्र लौट आते हैं। यहाँ भी कुछ ही युवा सीजनल पलायन करते हैं।

किसी भी क्षेत्र के लिए मुख्य सड़क से जुड़ना उस क्षेत्र के लिए जरूरी माना जाता है। क्योंकि उससे क्षेत्र में खासकर शिक्षा और स्वास्थ्य यातायात में कुछ सहूलियत जरूर मिल जाती है। आज बाछम से खाती गांव को भी मुख्य मार्ग से जोड़ा जा रहा है।

ब्रिटिश काल का ये पैदल मार्ग आज एक सड़क का रूप ले चुकी है। लेकिन कई बार हम उसके दूसरे खतरों को नजर अंदाज कर देते हैं। मुझे व्यक्तिगत तौर से लगता है कि आने वाले समय में इस क्षेत्र के लोगों के कई रोजगार के साधन खत्म हो जाएंगे खासकर बाछम गांव के।

आने वाले समय में जब पर्यटक सीधे अपने साधनों से खाती गांव पहुंचने लगेगा तो इन गांव के लोग का घोड़ों खच्चरों के द्वारा पर्यटकों का सामान लाने या लेकर जाने का कार्य कर रहे हैं वह खत्म हो जाएगा।

वर्तमान समय में बागेश्वर से बाछम तक ही सड़क मार्ग है तो इस क्षेत्र के युवा अधिकतर पिंडारी जाने वाले पर्यटकों का सामान खाती गांव तक घोड़ों और खच्चरों के द्वारा छोड़ने का कार्य करते हैं। अन्य समय खेती और होम स्टे, छोटे छोटे होटल चलाकर अपनी आजीविका चलाते हैं।

आज जब हम समूचे उत्तराखंड में अगर देखते हैं तो कई क्षेत्र हैं, जहां इस तथाकथित विकास के बाद बाहरी या शहरी पूंजीपतियों की तादात बेतहाशा ढंग से बढ़ी है। आज आप कुमाऊं क्षेत्र के नैनीताल जिले के मुक्तेश्वर ब्लाक में ही देख सकते हैं कि पूरे पहाड़ पर होटल और रेसोर्ट की बाढ़ सी आ गई है।

स्थानीय लोग अपनी जमीन बेचकर आज उनके ही होटलों, बाग,बगीचों में नौकरी कर रहे हैं। नई युवा पीड़ी का शहरों को पलायन बढ़ा है। आज के समय हर शिक्षित युवक-युवतियाँ का ग्रामीण जीवन को छोड़कर शहरी चकाचौध की ओर दिन प्रति दिन आकर्षण बढ़ता जा रहा है।

हाल के दिनों में देखी एक फिल्म Lunana: A Yak in the Classroom जो भूटान के एक छोटे से गांव की कहानी है, जिसमें फिल्म का एक युवा किरदार एक सरकारी स्कूल का अध्यापक है, जिसकी ख्वाहिश है कि वह एक सिंगर बने, जिसके लिए वह अपने दोस्तों और दादी को छोड़कर दूसरे शहर में जाकर रहेगा।

लेकिन एक कांट्रेक्ट के कारण उसे एक साल के लिए लुनारा के पहाड़ी में बसे घुमंतू समुदाय के एक छोटे से गांव में बच्चों को पढ़ाने के लिए जाना पड़ता है। जिसके बाद उस युवा के जीवन में एक बड़ा बदलाव शुरू होता है। वह युवा इनके बीच रहकर इनके बच्चों को शिक्षित करता है, और साथ ही उनके गीत संगीत और रहन सहन को सीखता है।

एक कहानी मात्र नहीं है। आज भी देश में ऐसे गांव हैं जहां के लोगों का शहर और बाजार से दूर-दूर तक का नाता नहीं है। भले ही वहां मोबाइल फोन बिजली जैसे आधुनिक यंत्र आज भी मौजूद ना हो। लेकिन उस समाज के लोगों के जीवन जीने की व्यवस्था आज की शहरी समाज से बेहतर है, वहाँ चकाचौध की जिंदगी ना हो, लेकिन वहाँ के संगीत में एक मिठास है एक खूबसूरत ठहराव और उसकी अपनी कहानियां है।

उनकी अपनी जीवन को जीने की संस्कृति है। जो आज भी हमें अपने देश के आदिवासी समाज, कई पहाड़ी और घुमंतू समाज में देखने को मिलेगी।

अगर खाती और बाछम जैसे गांवों की बात करें तो यहाँ के लोगों के लिए अभी के समय सबसे बड़ी चुनौती वन विभाग के द्वारा प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय लोगों की स्वायत्तता और हक़ हुकूकों को नज़रअंदाज़ करते हुए उनकी प्राकृतिक संपदा को लूटने की कोशिश है जिसके लिए वन विभाग व सरकार हर तरह के हथकंडे अपना रही है।

हाल ही में वन विभाग के द्वारा कई स्थाओं पर टूरिज्म के नाम पर लोगों से प्रति व्यक्ति एक सौ रुपया प्रवेश शुल्क वसूलना शुरू हुआ है। रख रखाव के नाम पर, जिसका कोई भी प्रबंध विभाग के द्वारा नहीं किया गया है। जिसको लेने का कोई भी अधिकार वन विभाग के पास नहीं है। जिसको लेकर स्थानीय लोगों में आक्रोश भी है। जिससे टूरिस्ट इन इलाकों में आने से बच रहा है।

लोगों की स्थानीय वन उपज के उपयोग पर भी पाबंदी लगा रहा है जिस कारण लोगों की आजीविका पर धीरे धीरे गंभीर असर पड़ रहा है। समय रहते अगर लोग जागरूक नहीं हुए तो वह दिन दूर नहीं जब वन विभाग इन जंगलों से मिलने वाली प्राकृतिक वन संपदाओं पर नियंत्रण हासिल करके किसी कंपनी को ठेके पर दे देगा और अपने ही जल जंगल जमीन से लोगों को दूर होना पड़ेगा जैसा पूरे देश में देखा जा रहा है।

ये सोचनीय विषय है कि क्या आने वाले समय में खाती और बाछम जैसे गांव इस कॉर्पोरेट परस्त व्यवस्था से अपना अस्तित्व बचाए रख पाएंगे ।

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