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आदिवासियों के सवालों पर चुप्पी क्यों?

पूरी दुनिया में मूलवासियों/आदिवासियों की कुल जनसंख्या लगभग 48 करोड़ है, जिसका लगभग 22 फीसदी आदिवासी समाज भारत देश में रहता है

By Ramesh Sharma

On: Monday 10 August 2020
 
फोटो साभार : साइमन विल्लियम्स (एकता परिषद)
फोटो साभार : साइमन विल्लियम्स (एकता परिषद) फोटो साभार : साइमन विल्लियम्स (एकता परिषद)

भारत जैसे महादेश में आज आदिवासियत पर विमर्श अपरिहार्य है। वास्तव में यह केवल अस्मिता अथवा अधिकारों का मसला मात्र नहीं है - आदिवासियत की प्रासंगिकता उन तमाम संदर्भों से भी है, जो आदिवासी समाज के संपन्नता से विपन्नता तक के संक्षिप्त इतिहास में आज कहीं जाहिर-अजाहिर तौर पर दर्ज हैं। सरकारों के लिये आदिवासियत का पूर्ण-अपूर्ण अर्थ आदिवासी समाज का 'संवैधानिक दर्जा' है। एक ऐसा संवैधानिक दर्जा, जिससे जनमे कानूनों और नीतियों के जरिये आदिवासियों को तमाम अधिकार दिए तो गए, लेकिन उसे लागू करने की वैधानिक जवाबदेही उस तथाकथित कल्याणकारी राज्य के रहमोकरम पर छोड़ दी गई, जो संपन्न आदिवासी समाज को विपन्न बना देने के लिये सदियों से जिम्मेदार रहा है। मत्स्य न्याय के इस खेल में आदिवासी समाज के हिस्से चिर-पराजय ही रह गई।

आदिवासियत के संदर्भों का एक अहम उदाहरण, अमरीका का अपना मौलिक इतिहास है। सन 1775 में अमरीका के उच्चतम न्यायालय ने मूलवासियों के अधिकारों को मान्यता तो दी, लेकिन अंतिम निर्णय (उपनिवेशी) संघीय सरकार के विवेक पर छोड़ दिया। पुनः वर्ष 1832 में संशोधित आदेश में कहा गया कि मूलवासियों का, उनकी अपनी जमीनों और संसाधनों पर स्वामित्व तभी तक है, जब तक स्वेच्छा से वो अपना अधिकार न त्याग दें। बाद के बरसों में उपनिवेश के विस्तार के साथ-साथ संघीय सरकार के राजनैतिक और वाणिज्यिक निर्णय, राज्य और कंपनियों के अनुरूप बदलते गए और फिर एक दिन मूलवासियों के परमार्थ के नाम पर उन्हें 'एक संरक्षित क्षेत्र' में सीमित रखने के लिए वैधानिक घेराबंदी कर दी गई।

इसके पश्चात वर्ष 1887 में संघीय सरकार के जनरल अलॉटमेंट एक्ट ने कल्याणकारी राज्य को ही मूलवासियों की बस्तियां बसाने का एकाधिकार दे दिया। परिणामस्वरूप मूलवासियों के स्वामित्व की लगभग 13.8 करोड़ हेक्टेयर जमीन में से लगभग 7 करोड़ हेक्टेयर उपजाऊ भूमि और जंगल स्वयं लोकतांत्रिक राज्य द्वारा तथाकथित रूप से 'मूलवासियों के परमार्थ के लिए बनाए गए कानूनों' के द्वारा हमेशा के लिए हथिया लिए गए। मूलनिवासियों के हिस्से बचे शेष 4.8 करोड़ हेक्टेयर में से लगभग 2 करोड़ हेक्टेयर रेगिस्तानी और अर्ध-रेगिस्तानी जमीन थी। अंततः वर्ष 1924 में संघीय सरकार द्वारा घोषणा कर दी गई कि जो मूलवासी 'अमेरिका की नागरिकता' हासिल करना चाहते हैं - वो इंडियन सिटीजनशिप एक्ट (1924) के तहत सरकार से दरखास्त कर सकते हैं। सारांश यह कि अमरीका के मूलवासी अपने ही वतन में लगभग शरणार्थी बना दिए गए।

फ़िलहाल इस इतिहास को अधूरा छोड़कर लगभग उन्हीं बरसों से भारत के आदिवासियों की कहानी शुरू करते हैं। वर्ष 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून के बाद संघीय विधानों के माध्यम से आदिवासी समाज के संसाधनों का जो संरचनात्मक अधिग्रहण आरंभ हुआ वो कमोवेश बनते-बिगड़ते स्वरुप में आज भी जारी है। बाद के बरसों में औपनिवेशिक हुकूमत के द्वारा लाए गए भारतीय वन अधिनियम (1927) ने सायास एक ऐसी रेखा खींच दी, जहां आदिवासी समाज को हमेशा के लिए उनकी अपनी मातृभूमि में ही अतिक्रमणकर्ता साबित कर दिया गया।

एक अनुमान के मुताबिक वर्ष 1865 में आदिवासियों की जो सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत लगभग 38 फीसदी भौगौलिक क्षेत्र में विस्तारित थी, वो उनके जंगल-जमीन के अधिग्रहण के चलते आज मात्र 17 फीसदी भूभाग में ही सिकुड़कर रह गयी है। वर्ष 2018 में भारत सरकार द्वारा आदिवासियों के स्वास्थ्य पर जारी रिपोर्ट के अनुसार विगत दो दशकों के भीतर ही आजीविका के संसाधनों के समाप्त होने के साथ-साथ आदिवासी समाज न केवल बड़े पैमाने पर पलायन कर रहा है। बल्कि, आज हर दूसरा आदिवासी परिवार, आजीविका के नाम पर मजदूरी करने के लिए बाध्य है।

जिन क्षेत्रों में आदिवासी समाज की अपनी रियासतें और सभ्यतागत जड़ें थीं, वास्तव में आज उन्हीं जमीनों पर कल्याणकारी राज्य ने उनके स्वामित्व को आवेदनकर्ता के रूप में अपघटित कर दिया है। न्याय, अस्मिता और सुरक्षा के नाम पर निर्धारित -अधिसूचित क्षेत्रों की संवैधानिक संहिताओं के बावजूद किसी भी राज्य के द्वारा आज पंचायत (विस्तार उपबंध) अधिनियम 1996 के प्रावधानों को दृढ निश्चय के साथ लागू न किया जाना - कल्याणकारी राज्य की अपनी मौलिक नैतिक और राजनैतिक विफलता (अथवा चालाकी) ही तो है। आदिवासी समाज के संदर्भ में कल्याणकारी राज्य की कथनी और करनी के विरोधाभास आज पूरी तरह बेनकाब हो चुके हैं।

आप अमेरिका के मूलवासियों और भारत के आदिवासियों के इतिहास के तुलनात्मक अध्ययन में कुछ तारीखों और वर्षों का फर्क तो तलाश सकते हैं, लेकिन उनके परिणामों की त्रासदी में तब भी कोई विशेष अंतर नहीं मिलेगा जो अमरीका के मूलवासियों और भारत के आदिवासियों के मध्य अनदेखा रह गया। दुनिया के दो महान लोकतांत्रिक देशों में मूलवासियों / आदिवासियों के इतिहास, भूगोल, नागरिकता और अर्थतंत्र में कई अवांछनीय समानताएं हैं।

संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार पूरी दुनिया में मूलवासियों/आदिवासियों की कुल जनसंख्या लगभग 48 करोड़ है, जिसका लगभग 22 फीसदी आदिवासी समाज भारत देश में रहता है। जनसंख्या और जंगल-जमीन पर स्वामित्व के दायरों के दृष्टिगत सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश और संयुक्त राष्ट्र संघ के महत्वपूर्ण सदस्य के रूप में भारतीय गणराज्य की भूमिका निःसंदेह आदिवासी समाज के लिए और अधिक जवाबदेहपूर्ण होनी चाहिए।

अफसोस है कि भारत में आदिवासी समाज के आत्म-निर्णय, आत्म परिचय और सांस्कृतिक अस्मिता के सवाल अभी भी अनुत्तरित हैं। अधिसूचित क्षेत्र की संवैधानिक अवधारणा और उसके संवैधानिक कवच के ठीक विरुद्ध, आदिवासी समाज को विपन्न बना देने वाले क़ानूनों और नीतियों और व्यवस्थाओं के बनते-बिगड़ते अक्स में इसे देखा-समझा जा सकता है। वास्तव में आदिवासी समाज के लिये आत्मनिर्णय, राज्य के मौजूदा व्यवस्थाओं को और अधिक लोकतांत्रिक बनाने का कारगर माध्यम है और होगा। इसीलिये आत्मनिर्णय, आदिवासियों के सदियों से अनुत्तरित उनके अनेक सवालों का जवाब है, जिसे स्थापित किए बिना कोई भी कल्याणकारी राज्य, लोकतांत्रिक होने का दावा कर ही नहीं सकता।

बहरहाल जिन्हें संविधान और सरकारों ने विशेष 'समाज' कहा उन्हीं की अपनी आजा-पुरखा की भूमि आज ढांचागत और प्रत्यक्ष हिंसा के केंद्र में है- संसाधनों से प्रचुर उनकी अपनी जमीन के नीचे दबे कोयले और बॉक्साइट के खदान उनके संस्कृति की जड़ों को नेस्तनाबूद कर रहे हैं- गरीबी से उनके परमार्थ हेतु अंतर्राष्ट्रीय मंडियों से बेहिसाब कर्ज उठाये जा रहे हैं- यहां तक कि उनके संसाधनों और सांस्कृतिक अस्मिता की सार्वजनिक बोलियां जारी हैं।

आज मौजूदा व्यवस्थाओं को उपनिवेशिक विधानों और प्रावधानों से परे रखकर ही हम भारत में आदिवासी समाज और आदिवासियत को उनका खोया हुआ स्थान और स्वाभिमान सुनिश्चित कर सकते हैं। ऐसा तभी संभव है जब सरकार और शेष समाज यह स्वीकार करे कि आदिवासी समाज के लिये 'आत्मनिर्णय' उसकी प्रथम अपरिहार्यता है। विगत पूरी सदी से आदिवासी समाज को वंचित घोषित और साबित किये जाने के जो प्रयास हुये उसका संवैधानिक प्रायश्चित भी 'आत्मनिर्णय' से ही संभव है और होंगे। किन्तु ऐसा नहीं हो पाने का अर्थ उस पूरे समाज को नैतिक-राजनैतिक रूप से हमेशा के लिये गवां देना ही साबित होगा, जिसके जिम्मेदार समाज और सरकार दोनों होंगे।

(लेखक एकता परिषद के राष्ट्रीय समन्वयक हैं)