Governance

दोहरी चुनौती

2014 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो बड़े वादे किए थे। इन वादों की कसौटी पर कितने खरे उतरे मोदी?

 
By Sushmita Sengupta, Rashmi Verma , Banjot Kaur
Last Updated: Wednesday 17 October 2018
स्वच्छता गंगा

अगर चुनाव पर्यावरण के मुद्दों पर लड़े जाएं तो 2019 का आम चुनाव दिलचस्प होगा। 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो बड़े वादे किए थे। पहला, अक्टूबर 2019 तक देश को खुले में शौच से मुक्त करना और दूसरा, गंगा को साफ करना। ये दो वादे पर्यावरण की सबसे बड़ी चुनौतियां हैं और देश के समग्र विकास से ये बेहद करीब से जुड़ी हैं। साफ भारत के बिना हजारों लोग परिहार्य कारणों से बेमौत मरते रहेंगे। और गंगा की सेहत सुधारे बिना लाखों लोगों का जीवनयापन, पानी और सिंचाई की जरूरतें दाव पर लगी रहेंगी। गंगा हमारी नदियों की बदहाल स्थिति को भी प्रदर्शित करती है। ये दोनों वादे पर्यावरण और विकास की उन चुनौतियों पर भी सियासतदानों को कसौटी पर कसते हैं जिनसे आम आदमी जूझ रहा है।

दोनों वादे एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और अगर सही मंशा से इन्हें पूरा किया जाए तो यह समस्याओं को टिकाऊ तरीके से सुलझाने का आदर्श उदाहरण पेश कर सकते हैं। उदाहरण के लिए गंगा की सफाई और उसे मूल स्वरूप में लाने के लिए सर्वांगीण दृष्टिकोण चाहिए। जलग्रहण क्षेत्र की सफाई, प्रदूषण रोकने के लिए कानून और नदी के निर्बाध प्रवाह के लिए यह जरूरी है। लेकिन इसके जलग्रहण क्षेत्र में बड़ी आबादी रहती है जो स्वच्छता से वंचित है। उनके कचरे से नदी प्रदूषित होती है। इसलिए संपूर्ण स्वच्छता का मतलब केवल शौचालयों का निर्माण नहीं है, बल्कि यह भी देखना है कि सुरक्षित तरीके से कचरे का प्रबंधन कैसे हो। इसमें संदेह नहीं है कि यह बहुत बड़ी चुनौती है।

दो साल पहले हमारे प्रवेशांक की आवरण कथा “चुनौती 2019” में बताया गया था कि स्वच्छता या हर घर में शौचालय का निर्माण 2019 का लोकसभा चुनाव जीतने से मुश्किल चुनौती है। पिछले दो साल में गंगा की सफाई का दूसरा वादा मोदी के लिए अगली चुनौती के रूप में उभरा है। चूंकि वादे मोदी के मतदाताओं को बड़ी संख्या में प्रभावित करते हैं और हमेशा टीस देने वाली इन दोनों समस्याओं को उनके पूर्ववर्तियों ने दूर नहीं किया, इसलिए मोदी अच्छी छवि बना सकते हैं।

इस आवरण कथा में पड़ताल की गई कि क्या मोदी अपने वादों को खुद द्वारा निर्धारित समयसीमा में पूरा कर पाएंगे?

लक्ष्य पूरा, मकसद अधूरा

खुले में शौच से भारत को मुक्त बनाने के लक्ष्य की उल्टी गिनती इस साल 2 अक्टूबर से शुरू हो जाएगी। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि एक बार फिर इस महत्वाकांक्षी योजना का लक्ष्य अधूरा ही रह जाएगा। लेकिन, हम लोग अक्टूबर 201 9 की समयसीमा से पहले ही लक्ष्य हासिल कर लेंगे। यह भारत का पहला अनुभव होगा, जहां हम सभी के पास शौचालय होगा। जाहिर है, यह एक प्रशंसनीय काम है। हालांकि, हम पहले चरण, यानी सभी के लिए शौचालय बनाने का सबसे आसान काम पूरा कर चुके हैं, लेकिन पूर्ण सफलता के लिए हमारे सामने अब भी कई चुनौतियां हैं। सुष्मिता सेनगुप्ता और रश्मि वर्मा उन चुनौतियों के बारे में बता रही हैं, जिनके समाधान की जरूरत है

कोई भी यह तर्क दे सकता है कि हमने अपनी पुरानी सभ्यता से एक नई सभ्यता में छलांग लगा ली है। अगले 25 हफ्तों में, भारत अपने सबसे बदनुमा दाग को धो देगा। फरवरी 2019 तक, देश खुले में शौच से मुक्त होगा। लेकिन, 60 करोड़ भारतीयों की पीढ़ियों पुराने व्यवहार में बदलाव से ही इस सफलता को पूर्णत: हासिल किया जा सकता है।

1986 में भारत सरकार ने केंद्रीय ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम शुरू किया था। यह पहला राष्ट्रव्यापी स्वच्छता कार्यक्रम था। कार्यक्रम का कोई लक्ष्य वर्ष निर्धारित नहीं था। यह अपने मकसद में भी अस्पष्ट था। इसमें जीवन की गुणवत्ता में सुधार की बात की गई थी। पिछले तीन दशकों में, ग्रामीण भारत के लिए निर्मल भारत अभियान और शहरी भारत के शहरी गरीबों के लिए बुनियादी सेवाओं जैसे कई अन्य बड़े स्वच्छता कार्यक्रम शुरू किए गए। लेकिन खुले में शौच से मुक्त होने की आशा उतनी ही खराब रही। लाखों शौचालयों का निर्माण तो हुआ, लेकिन कभी उसका इस्तेमाल ही नहीं हुआ है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अक्टूबर 2014 में महत्वाकांक्षी स्वच्छ भारत मिशन (एसबीएम) शुरू किया। देश में स्वच्छता की स्थिति, पहले स्वच्छता अभियान के शुरू होने के 28 साल बाद भी खराब थी। जब मोदी ने 2014 में अपना पहला स्वतंत्रता दिवस भाषण दिया था, तब देश में 50 प्रतिशत से कम परिवारों के पास स्वच्छता सुविधाओं तक पहुंच थी। अपशिष्ट जल और सीवेज का केवल 30 प्रतिशत ही उपचारित होकर नदियों में जाता था। अनुमान के मुताबिक, हर साल 4 लाख बच्चे स्वच्छता से संबंधित बीमारियों जैसे कॉलेरा, दस्त से मरते हैं और उनका शारीरिक विकास भी ठीक से नहीं होता है। इसलिए, महात्मा गांधी की 150वीं जयंती यानी 2 अक्टूबर, 2019 तक देश को खुले में शौच से मुक्त करने का मोदी का वादा भी एक अन्य कार्यक्रम के जरिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की एक और अभिव्यक्ति प्रतीत होती है।

नया रूप में आया एसबीएम कम से कम घरेलू स्तर पर शौचालय उपलब्ध कराने के मामले में सफल साबित हुआ है। इसकी प्रगति लुभावनी है। चार वर्षों में, 4,57,000 गांवों को खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) घोषित किया गया है, जो भारत के कुल गांव का 76 प्रतिशत है। कार्यक्रम शुरू होने से ठीक पहले, केवल 47,000 गांवों को यह सफलता मिली थी। इस योजना के तहत अब तक 8.38 करोड़ शौचालय बनाए गए हैं।

घरेलू शौचालय कवरेज में प्रगति इतनी तेजी से बढ़ी है कि मोदी की समयसीमा से पहले ही, यानी भारत छह महीने में ही इस लक्ष्य को पूरा कर लेगा। अगस्त 2018 में आयोजित एक बैठक में, पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय (एमडीडब्ल्यूएस) के सचिव परमेश्वरन अय्यर ने गर्व से घोषणा की, “हम लगभग भारत को ओडीएफ बनाने के लक्ष्य तक पहुंच गए हैं।” मोदी के इस फ्लैगशिप कार्यक्रम के कर्ताधर्ता अय्यर ने कहा, “राज्य तेजी से ओडीएफ बन रहे हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा निर्धारित समयसीमा से पहले हम लक्ष्य तक पहुंच जाएंगे।”

एमडीडब्ल्यूएस वेबसाइट (5 सितंबर, 2018 को) के आंकड़ों से पता चलता है कि देश में घरेलू शौचालय कवरेज लगभग 92 प्रतिशत तक पहुंच गया है। 35 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से लगभग 20 राज्य शौचालय के 100 प्रतिशत घरेलू कवरेज तक पहुंच गए थे, जबकि दो राज्य 99 प्रतिशत लक्ष्य हासिल कर चुके हैं। लगभग 1.3 करोड़ परिवारों को कवर किया जाना बाकी है। यदि 2017-18 में शौचालय निर्माण (इस वर्ष 3 करोड़ शौचालय बनाए गए थे) की दर बनाए रखी जाती है, तो भारत फरवरी 2019 तक ओडीएफ बन जाएगा। यह आत्मविश्वास कुछ राज्यों में हो रहे उत्साहजनक विकास से भी आता है। बिहार, ओडिशा, झारखंड और उत्तर प्रदेश, ये चार राज्य पिछले साल भारत की खुले में शौच जाने वाली आबादी की 60 प्रतिशत हिस्सेदारी रखते हैं। शौचालय कवरेज में उनकी प्रगति पर ही देश की ओडीएफ यात्रा की सफलता निर्भर करती है। झारखंड व उत्तर प्रदेश ने एक साल में इस दिशा में प्रभावशाली विकास किया है। झारखंड ने 87 फीसदी, जबकि उत्तर प्रदेश ने 94 फीसदी के घरेलू कवरेज के साथ जबरदस्त सुधार दिखाया है।

बिहार और ओडिशा चिंता का कारण हैं, क्योंकि इन राज्यों ने अब भी 65 प्रतिशत के आसपास घरेलू कवरेज दिखाया है। अय्यर का कहना है कि इन राज्यों के वे जिले, जो इस मामले में पीछे हैं, सामाजिक-आर्थिक मानकों पर सबसे कमजोर हैं। उनका कहना है कि उत्तर प्रदेश के ऐसे कई जिले हैं, जहां 90 प्रतिशत घरेलू कवरेज है, लेकिन शौचालय का उपयोग बहुत कम है। मंत्रालय ने इन जिलों को आकांक्षा जिलों के रूप में नामित किया है। एमडीडब्ल्यूएस के अनुसार, इन जिलों में शौचालय के पर्याप्त उपयोग न होने के पीछे की मुख्य समस्या पानी की कमी है। मंत्रालय टिकाऊ जल आपूर्ति सुनिश्चित करके शौचालय उपयोग बढ़ाने के लिए नीति आयोग के साथ मिलकर काम कर रहा है।

पानी की कमी वाले जिलों में शौचालयों का उपयोग केवल मॉनसून और इसकी बाद की अवधि के दौरान तब किया जाता है, जब पानी की उपलब्धता होती है। उदाहरण के लिए, यूपी के झांसी में पानी की कमी वाले समय के दौरान यहां शौचालयों का उपयोग काफी कम हो जाता है। अय्यर भी इस बात से सहमत हैं कि उत्तर प्रदेश के कई जिलों में शौचालयों का उपयोग न करने की मुख्य वजह पानी की कमी है। राज्य शौचालय वाले घरों के लिए कैसे पानी आपूर्ति की समस्या का हल करते हैं, यह खुले में शौच को खत्म करने के लिए महत्वपूर्ण है। कुछ जिलों की समस्याओं के बावजूद, भारत ओडीएफ बनने के बहुत करीब है। देश ने पहला और सबसे आसान मील का पत्थर पार कर लिया है।

अब, भविष्य के लिए एक कठिन सवाल सामने है। आगे क्या? भारत के स्वच्छता कार्यक्रमों का इतिहास उन सावधानियां की ओर इशारा करता है, जिनकी वजह से यह लक्ष्य भी अधूरा रह जाएगा। भारत ने 1986 के पहले कार्यक्रम के बाद ही 6.1 करोड़ शौचालय बनाए थे (एसबीएम से पहले)। इस पर एक लाख करोड़ रुपए खर्च हुए थे। लेकिन शौचालय निर्माण के बाद ओडीएफ का मकसद थम गया। पहला तो यह कि इसका उपयोग सुसंगत नहीं था। ओडीएफ स्टेटस में गिरावट आई और लक्ष्य का पीछा करने के लिए आंकड़ों पर अधिक निर्भरता थी। दूसरा, लाखों निर्मित शौचालय उपयोग में नहीं आए और बाद में उपयोग लायक नहीं रहे। तीसरा, हम पानी की आपूर्ति सुनिश्चित नहीं कर सके और जन सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ठोस और तरल अपशिष्ट प्रबंधन नहीं कर सके। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि भारत ने देश को खुले में शौच से मुक्त बनाने के लिए 2017 की अपनी पिछली समयसीमा को मिस कर दिया। ये तीन चुनौतियां इस जीत को भारी विफलता में बदल सकती हैं।

आइए पहले प्रश्न से शुरू करते हैं। कैसे एक गांव या एक राज्य को खुले में शौच से मुक्त घोषित किया जाए? 1986 में शुरू स्वच्छता कार्यक्रम के समय से ही यह एक विवादित मुद्दा रहा है। 19 सितंबर को भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी या कैग) ने एक बार फिर से एसबीएम पर प्रश्न उठाया। गुजरात की विधानसभा में पेश की गई एक रिपोर्ट में सीएजी ने कहा कि ओडीएफ होने का राज्य का दावा गलत था। असल में इसके लिए डेटा में हेरफेर हुआ था। गुजरात 20 राज्यों में से एक है, जिसने खुद को एसबीएम के तहत ओडीएफ घोषित कर दिया है। कैग ने पाया कि आठ जिलों के 30 प्रतिशत घरों में कोई शौचालय नहीं था।

स्रोत: एमडीडब्ल्यूएस और व्यक्तिगत संचार

शौचालय निर्माण और उपयोग की बात को तो भूल ही जाएं। कैग ने कहा, “राज्य सरकार ने 2 अक्टूबर, 2017 तक गुजरात के सभी जिलों को ओडीएफ के रूप में घोषित किया। हालांकि, 2014-17 की अवधि के लिए आठ चयनित जिला पंचायतों के तहत 120 परीक्षण-जांच ग्राम पंचायतों द्वारा प्रदान की गई जानकारी से पता चला कि 29 प्रतिशत परिवारों के पास शौचालय नहीं है।” कैग रिपोर्ट डेटा में हेरफेर की ओर इशारा करती है। कैग ने पाया कि परीक्षण किए गए 120 गांवों में से 41 में, एसबीएम के तहत बनाए गए शौचालयों का उपयोग नहीं किया जा सका, क्योंकि पानी का कोई कनेक्शन नहीं था।

लक्ष्य पूरा करने के लिए आंकड़ों में हेरफेर की बात सामने आने पर एसबीएम (ग्रामीण) सचिवालय ने नवंबर 2017 में ओडीएफ प्रमाणित करने के संबंध में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए एक सलाह जारी की। ये एडवाइजरी मध्य प्रदेश के गुना जिले के 155 गांवों और अन्य राज्यों के जिलों से ओडीएफ की झूठी घोषणा की रिपोर्ट मिलने के बाद आई। शिकायतों के बाद, जिला के अतिरिक्त मजिस्ट्रेट द्वारा तैनात अधिकारियों ने खुले में शौच के 2,000 से अधिक उदाहरण और ऐसे कई घर पाए, जहां शौचालय थे ही नहीं। इसी तरह की घटनाएं अन्य स्थानों से भी प्रकाश में आईं।

ओडीएफ की घोषणा एक फिसलन भरा मुद्दा है। क्योंकि लक्ष्य प्राप्त करने के लिए लोग झूठे दावे करने लगते हैं। अतीत में भी ऐसा हुआ है। 2001 से 2011 तक यूपी में शौचालय वाले परिवारों का प्रतिशत केवल 19.2 से बढ़कर 21.8 हुआ। हालांकि, यूपी अब कह रहा है कि सितंबर 2018 तक 94 प्रतिशत परिवारों के पास शौचालय हैं। इसका मतलब है कि पिछले सात सालों में यह संख्या चौगुनी हो गई है। एमडीडब्ल्यूएस के सलाहकार नरेश चंद्र सक्सेना कहते हैं, “किसी को भी इस दावे पर सन्देह हो सकता है, क्योंकि यूपी ने अतीत में भी बढ़ा चढ़ाकर रिपोर्टिंग की है।” स्वच्छता राज्य का विषय है, इसलिए एसबीएम ने गांवों में ओडीएफ स्टेटस की जांच करने और केंद्र को रिपोर्ट करने के लिए राज्य समर्थित सर्वेक्षण करने के लिए राज्यों को स्वायत्तता दी है। केंद्र अंतिम मूल्यांकन के लिए ओडीएफ गांवों/ जिलों का एक छोटा सा नमूना जांचता है। एमडीडब्ल्यूएस एडवाइजरी कहती है कि गांवों की तरफ से ओडीएफ की घोषणा तभी की जाए जब स्थानीय समिति सुनिश्चित कर दे कि गांव के प्रत्येक घर में शौचालय है और कोई खुले में शौच के लिए नहीं जाता।

इस जटिल और मानवशक्ति की आवश्यकता वाली प्रक्रिया को समझने के लिए डाउन टू अर्थ ने गंगा नदी के पास बसे कन्नौज जिले का दौरा किया। यह समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव का विधानसभा क्षेत्र है। यह जिला पहले ही 100 प्रतिशत शौचालय कवरेज हासिल कर चुका है, जिसमें से 80 प्रतिशत एसबीएम के दौरान हासिल किया गया। दिलचस्प सवाल यह है कि गांवों ने खुद को ओडीएफ घोषित कैसे किया?

राज्यों के लिए एमडीडब्ल्यूएस द्वारा एक व्यापक दिशानिर्देश दिया गया है। इसमें यह भी शामिल है कि गांव परिसर में कहीं भी खुले में मल नहीं दिखना चाहिए और गांव के सभी शौचालय मल के निपटारे के लिए सुरक्षित तकनीक का उपयोग कर रह हों। ओडीएफ का दो बार सत्यापन किया जाता है, आत्म-घोषणा के तीन महीने बाद और फिर छह महीने बाद। यह पूरी सत्यापन प्रक्रिया नौ महीने में पूरी होती है। इसके लिए राज्य अपनी टीम का उपयोग कर सकता है या बाहरी विशेषज्ञों को शामिल कर सकता है। ऐसा देखा जाता है कि राज्य ज्यादातर समुदाय के लोगों, ब्लॉक अधिकारियों समेत अपनी टीमों को इस काम के लिए चुनना पसंद करते हैं।

कन्नौज के मुख्य विकास अधिकारी एसके सिंह कहते हैं, “इस मामले में गांव, ब्लॉक और जिला स्तर पर क्रॉस वेरिफिकेशन किया जाता है।” वह आगे कहते हैं, “जिला स्तर की निगरानी और पर्यवेक्षण से, ओडीएफ सत्यापन आमतौर पर एक लंबी प्रक्रिया होती है, जिसमें तीन से नौ महीने लगते हैं। हम विभिन्न सरकारी विभागों के प्रतिनिधियों को शामिल कर टीम बनाते हैं। ओडीएफ लक्ष्य प्राप्त करने के बाद, ग्राम पंचायत सत्यापन के लिए फाइल भेजती है। अंत में, जिला के अधिकारी ओडीएफ स्थिति की पुष्टि करने के लिए गांव की यात्रा करते हैं।” सिंह ने स्पष्ट किया कि इसमें नौ महीने नहीं लग सकते हैं क्योंकि मंत्रालय के दिशानिर्देशों में दोबारा सत्यापन की बात नहीं है। एसबीएम (ग्रामीण) के जिला सलाहकार अनिल कुमार कहते हैं, “राज्यों के पास दिशानिर्देशों को संशोधित करने की स्वतंत्रता है।”

डाउन टू अर्थ ने महाराष्ट्र के नागपुर जिले की भी यात्रा की, जिसे ओडीएफ घोषित किया गया है। वहां भी ओडीएफ प्रमाण पत्र के लिए अपनाई गई सत्यापन प्रक्रिया में कई गलतियां दिखीं। नागपुर जिले के भरमानी ग्राम पंचायत की सरपंच माधुरी गोढमोरे बताती हैं, “सत्यापन तीन दिनों में जल्दी से जल्दी किया जा सकता है।” भरमानी को 2009 में निर्मल ग्राम पुरस्कार मिला था, इसलिए एसबीएम के तहत 2014 में केवल 20 प्रतिशत घरेलू शौचालय को कवर किया जाना था। यहां जिला के अधिकारी आए और गांव को सिर्फ तीन दिनों में सत्यापित कर दिया। माधुरी कहती हैं कि पिछले कार्यक्रमों की कमी का आकलन नहीं किया गया, जबकि गांव में कुछ निष्क्रिय शौचालय भी थे।

एमडीडब्ल्यूएस दिशानिर्देश सत्यापन के दौरान नौ महीने के लिए संबंधित राज्य अधिकारियों/ विभागों की भागीदारी की सिफारिश करते हैं। इस अवधि के दौरान उन्हें गांव में विभिन्न गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित करना होता है, जैसे पानी की उपलब्धता, जल स्रोतों की सफाई, जल निकाय, विकेन्द्रीकृत ठोस व तरल अपशिष्ट प्रबंधन, नालियों का रखरखाव, स्कूल का रखरखाव और आंगनवाड़ी शौचालय, हाथ धोने के लिए जागरुकता और पिट सफाई प्रशिक्षण, मल निस्तारण और फिकल कीचड़ प्रबंधन। कन्नौज में पूरी आधिकारिक भागीदारी शौचालय निर्माण तक सीमित थी। सत्यापन प्रक्रिया के लिए आवश्यक जनशक्ति की उपलब्धता एक ऐसा मुद्दा है जो ऐसे राज्यों को ओडीएफ स्टेटस पाने की राह में बाधा बन सकता है। कन्नौज जिले में 702 गांव हैं। 701 गांवों ने ओडीएफ की स्व-घोषणा कर दी है। हालांकि सत्यापन का काम केवल 577 गांवों का ही पूरा हो सका है। क्षेत्र से एकत्र किए गए आंकड़ों के अनुसार, सत्यापन के लिए गांव, ब्लॉक और जिला स्तर पर 3,513 लोगों की आवश्यकता है। क्षेत्र में तैनात लोगों को मल के सुरक्षित निपटान के लिए अच्छी तरह से प्रशिक्षित किया जाना चाहिए लेकिन इन अधिकारियों की कई जिम्मेदारियों को देखते हुए, यह स्पष्ट है कि सत्यापन प्रक्रिया से समझौता किया गया है। गुजरात पर कैग रिपोर्ट तो सिर्फ एक संकेत है।

गैर-ओडीएफ स्थिति का जारी रहना अतीत का वह भूत है, जो बड़े पैमाने पर एसबीएम का पीछा करता रहेगा। जुलाई में संसद में पेश ग्रामीण विकास पर संसदीय स्थायी समिति की 51वीं रिपोर्ट ने भी ओडीएफ को लेकर गलत जानकारी देने की ओर इशारा किया है। समिति ने उन क्षेत्रों का फिर से सर्वे करने की सिफारिश की है, जिन्हें ओडीएफ घोषित किया जा चुका है। दिल्ली स्थित विकास सलाहकार और थिंक टैंक, टीएआरयू लीडिंग एज द्वारा किए गए एक अध्ययन ने एसबीएम के पूर्ववर्ती संपूर्ण स्वच्छता अभियान के तहत, छः राज्यों में निर्मल ग्राम पुरस्कार प्राप्त करने वाले गांवों में स्वच्छता की स्थिति का विश्लेषण किया। अध्ययन में बताया गया है कि 162 सर्वेक्षणों में से केवल 109 ग्राम पंचायतों में शौचालय का उपयोग 60 प्रतिशत से अधिक था। बाकी लोग खुले में जाते हैं।

सरकार इसे ट्रैक करने के लिए नियमित सर्वेक्षण कर रही है। एसबीएम (ग्रामीण) में कम से कम दो राष्ट्रीय स्तर के स्वतंत्र सर्वेक्षण हैं। एक है भारतीय गुणवत्ता परिषद (क्यूसीआई) और दूसरा है राष्ट्रीय वार्षिक ग्रामीण स्वच्छता सर्वेक्षण (एनएआरएसएस) 2017-18। ये दोनों स्वच्छता स्थिति पर एक अद्यतन रिपोर्ट प्रदान करते हैं। क्यूसीआई ने मई से जून 2017 तक 4,626 गांवों का मूल्यांकन किया, जो भारत के सभी राज्यों में फैले हुए हैं।

इसके अलावा, 200 नमामि गंगे गांवों का भी ग्रामीण स्वच्छता की जांच के लिए मूल्यांकन किया गया था। स्वच्छ सर्वेक्षण ग्रामीण 2017 के परिणाम महत्वाकांक्षी एसबीएम की तीसरी सालगिरह से सिर्फ एक सप्ताह पहले घोषित किया गया था। यह भारत में 62.45 प्रतिशत शौचालय कवरेज दिखाता है। परिणाम यह भी बताता है कि 91 प्रतिशत ग्रामीण आबादी शौचालय का उपयोग करती है। स्वच्छ सर्वेक्षण ग्रामीण 2017 के तहत, क्यूसीआई ने 4,626 गांवों के1.4 लाख ग्रामीण परिवारों का सर्वेक्षण किया, जो भारत के कुल गांवों का 0.72 प्रतिशत था। स्वच्छ सर्वेक्षण ग्रामीण अपने सर्वे में शौचालय निर्माण प्रौद्योगिकी, ठोस और तरल अपशिष्ट प्रबंधन, अनुकूलन और ग्रामीणों द्वारा इसकी स्वीकृति को अनदेखा करता है।

स्रोत: एमडीडब्ल्यूएस और व्यक्तिगत संचार

दिल्ली विश्वविद्यालय के सांख्यिकी विभाग के प्रोफेसर अजीत चतुर्वेदी इस परिणाम को लेकर कहते है कि सैंपल साइज अनिवार्य रूप से 10 प्रतिशत होना चाहिए, लेकिन यहां उससे काफी कम है। उसी विभाग के प्रोफेसर जगदीश सरन ने नमूने के तरीकों पर संदेह उठाया है। वह कहते हैं, “क्या उन्होंने आबादी के सभी स्तरों से नमूने का चयन किया? क्या उन्होंने सभी गांवों से बराबर संख्या में सैंपल का चयन किया?” सरन का कहना है कि जब सर्वेक्षण की लागत बहुत अधिक होती है तो नमूना आकार जानबूझ कर कम कर दिया जाता है। लेकिन इस मामले में सर्वेक्षण स्थानीय लोगों से बातचीत और क्षेत्र के अवलोकन के आधार पर किया गया।

एसबीएम (ग्रामीण) को विश्व बैंक परियोजना समर्थन के तहत, एनएआरएसएस, 2017-18 (मध्य नवंबर 2017 और मध्य मार्च 2018 के बीच आयोजित) ने भारत के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से 6,136 चयनित गांवों के 92,040 परिवारों का सर्वेक्षण किया। एनएआरएसएस ने घर में व्यक्तियों के उपयोग पैटर्न को देखा। सर्वेक्षण उपकरण और प्रोटोकॉल समेत संपूर्ण सर्वेक्षण प्रक्रिया की निगरानी अमिताभ कुंडू (चेयरमैन) और नरेश चंद्र सक्सेना (को-चेयरमैन) की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ कार्यकारी समूह (ईडब्ल्यूजी) ने की। ये दोनों एमडीडब्ल्यूएस के सलाहकार हैं। ईडब्ल्यूजी में विश्व बैंक और स्वच्छता पर काम कर रहे अन्य संगठनों आदि जैसे बहुपक्षीय एजेंसियों के प्रतिनिधि हैं। वे सर्वे किए गए 1,259 ओडीएफ गांवों में से 1,204 (95.6 प्रतिशत) की ओडीएफ स्थिति की पुनर्पुष्टि करते हैं। शेष 55 ओडीएफ गांवों की पुनर्पुष्टि इसलिए नहीं हो सकी कि वहां 100 प्रतिशत शौचालय उपयोग नहीं था। क्यूसीआई की तरह, इस बार भी नमूना आकार छोटा था। एसबीएम के निदेशक युगल किशोर जोशी के मुताबिक, “क्यूसीआई और एनएआरएसएस अध्ययन इस तथ्य के प्रमाण हैं कि एसबीएम (ग्रामीण) एमआईएस मजबूत है और ये ग्रामीण भारत में स्वच्छता की स्थिति की एक सटीक तस्वीर पेश करते हैं। यह 16 करोड़ से अधिक परिवारों के घरेलू डेटा को कैप्चर करता है। ग्रामीण स्वच्छता प्रगति के आंकड़े गांव, ब्लॉक, जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर वास्तविक समय में एमआईएस पर अपडेट किए जाते हैं।”

इन लेखापरीक्षाओं के अलावा, विभिन्न संगठनों और विशेषज्ञों द्वारा एसबीएम का विश्लेषण किया गया है। गैर-लाभकारी शोध संगठन रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर कंपासिनेट इकोनॉमिक्स (आरआईसीई) के डियान कॉफी और डीन स्पीयर्स द्वारा लिखित एक ऐसा ही पेपर मार्च 2018 में इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली में प्रकाशित हुआ था। लेखकों ने राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 (एनएफएचएस-4) डेटा का उपयोग करके ग्रामीण क्षेत्र में खुले में शौच पैटर्न की जांच की। ये डेटा जनवरी 2015 और नवंबर 2016 के बीच एकत्रित राष्ट्रीय प्रतिनिधि सर्वे होता है। रिपोर्ट का विश्लेषण करते हुए, शोधकर्ताओं का कहना है कि हालांकि खुले में शौच 10 साल पहले की तुलना में काफी कम हुआ है, लेकिन यह अब भी बेहद प्रचलित है। आधे से ज्यादा ग्रामीण परिवार अभी भी खुले में शौच करते हैं। लेखकों का कहना है कि कुल मिलाकर एसबीएम के दौरान भी बदलाव की गति धीमी है। जोशी भारत में स्वच्छता कवरेज का विश्लेषण करते समय इस पेपर के लेखकों का हवाला नहीं देते।

यह हमें अगली बड़ी चुनौती की ओर ले जाता है, जिसमें उस स्थिति के निर्माण की क्षमता है, जब भारत को शौचालय नहीं होते थे। यह है मल की गन्दगी, जो प्रदूषण फैलाने के साथ ही लाखों अपरिहार्य मौतों का कारण बनती है। घरेलू शौचालय निर्माण के लिए यह सबसे मजबूत तर्क रहा है। लेकिन सवाल है कि नए बने शौचालयों से निकलने वाले ठोस और तरल अपशिष्ट का निपटान कैसे किया जाएगा? खुले में शौच की तुलना में यह एक बड़ी समस्या है, क्योंकि घरेलू मल पदार्थ लोगों के घरों के करीब होगा जबकि खुले में शौच का स्थान निवास क्षेत्रों से दूरी पर होते हैं। एक तरह से हम कचरे को अपने घरों में ले आए हैं और इसकी मात्रा नए निर्मित शौचालयों की संख्या को देखते हुए दिमाग सुन्न करने वाला है। प्रतिदिन 1,00,000 टन मल कचरा उत्पन होगा। एक ऐसे देश के लिए जो सिर्फ 30 प्रतिशत ही उत्पादित अपशिष्ट और सीवेज का उपचार कर पाता है, उसके लिए 1,00,000 टन मल कचरा का निस्तारण एक बहुत ही कठिन काम है। लेकिन स्वच्छता अभियान को प्रभावी ढंग से सफल बनाने के लिए ऐसा करना भी अनिवार्य है।

एक बार गांव ओडीएफ बनने के बाद, सरकार को ठोस तरल अपशिष्ट प्रबंधन पर केंद्रित होना होगा। यद्यपि, ठोस तरल अपशिष्ट प्रबंधन को ओडीएफ सत्यापन दिशानिर्देशों के एक हिस्से के रूप में शामिल किया गया है, लेकिन राज्य इस पैरामीटर पर शायद ही कभी ध्यान देते हैं। यही समय है जब सही शौचालय प्रौद्योगिकी उपयोग का महत्व सामने आता है। एसबीएम पर एमडीडब्ल्यूएस के सलाहकार नरेश चंद्र सक्सेना कहते हैं, “शौचालयों का उपयोग टिकाऊ नहीं हो सकता, क्योंकि लोग गलत तकनीक का उपयोग कर रहे हैं।” सही तकनीक का अर्थ है घरेलू शौचालयों से निकले ठोस और तरल अपशिष्ट का प्रबंधन करना। वर्तमान में सिंगल-पिट, ट्विन-पिट और सेप्टिक टैंक से जुड़े शौचालय जैसे तकनीकी समाधान उपलब्ध हैं। अमीर लोग सर्वश्रेष्ठ समाधान का विकल्प चुन सकते हैं, लेकिन ग्रामीण और शहरी इलाकों में गरीब सरकारी मदद के बाद भी सही तकनीक का इस्तेमाल नहीं कर सकते। अय्यर कहते हैं, “लोग सेप्टिक टैंक जैसा शौचालय चाहते हैं जो कचरे का उपचार कर सके, लेकिन यह बहुत महंगा है।” मंत्रालय 12,000 रुपए देता है, जो सेप्टिक टैंक शौचालयों के निर्माण के लिए बहुत कम हैं।

अधिकांश ग्रामीण भारत पिट शौचालयों पर निर्भर हैं। ऐसे शौचालयों में ठोस और तरल कचरे का इलाज गड्ढे में किया जाता है। विशेषज्ञों द्वारा ट्विन-पिट प्रणाली की वकालत की जाती है, लेकिन ग्रामीण भारत ज्यादातर वन-पिट (एक-गड्ढे) प्रणाली का उपयोग कर रहा है। सक्सेना कहते हैं, “तकनीकी रूप से 50 क्यूबिक फीट क्षमता के दो छोटे गड्ढे होने चाहिए लेकिन दुर्भाग्यवश न तो आकार और न ही गड्ढे की संख्या पर नजर रखी जा रही है।”

व्यावहारिक रूप से, कहीं भी डंप करने के अलावा अपशिष्ट प्रबंधन के लिए कोई व्यवस्था नहीं है। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश, जो 94 प्रतिशत शौचालय कवरेज तक पहुंच गया है, रोजाना 16,000 टन मल कचरा पैदा करता है। यहां तक कि एक बहुत ही गरीब देश भी प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 75 ग्राम मल पदार्थ पैदा करता है। इस गणना के अनुसार, प्रतिदिन घरेलू स्तर पर कम से कम 59,000 टन मल पदार्थ का उत्पादन होगा। सही शौचालय तकनीक के बिना इस मल पदार्थ को हमारे आवास के करीब फेंक दिया जाएगा और यह मिट्टी और पानी के विभिन्न स्रोतों को प्रभावित करेगा। यदि खराब तरीके से डिजाइन किए गए शौचालय गंदगी वाले क्षेत्र में हैं, तो संग्रहित मल मॉनसून के दौरान प्रदूषण और स्वास्थ्य जोखिम उत्पन्न करते हैं। इसके अलावा, गड्ढे वाले शौचालयों की उच्च संख्या और खराब तरीके से बने सेप्टिक टैंक, नाइट्रेट और जीवाणु प्रदूषण के कारण पीने वाले जलीय पानी को अनुपयुक्त बना सकते हैं।



एक गहरे या उथले गड्ढे वाले शौचालय भी परेशानी वाली स्थिति पैदा कर सकते हैं। गहरे गड्ढे को खाली करने की आवश्यकता तो नहीं है, लेकिन अगर वे बहुत गहरे हैं तो भूजल को दूषित कर सकते हैं, जबकि उथले गड्ढे वाले शौचालयों को हर कुछ वर्ष बाद साफ करने की आवश्यकता है। दयानंद सागर कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, बेंगलुरु के वैज्ञानिकों द्वारा 2015 के एक शोध से पता चला कि लीच पिट शौचालयों ने कर्नाटक के बेंगलुरु ग्रामीण और रामानगर जिलों में भूजल दूषित कर दिया था।

दूसरी तरफ, ग्रामीण भारत में सेप्टिक टैंक और मल कचरा प्रबंधन के घरेलू उपयोग की समीक्षा पर हुए एक हालिया अध्ययन के मुताबिक, लोग मल कचरा हटाने के बारे में चिंतित तो हैं लेकिन इसे बहुत कम महत्व देते हैं। स्थानीय सरकारें मल कचरा खाली करने के लिए आवश्यक किसी भी प्रोटोकॉल से अनजान हैं। वाटरएड इंडिया के हाल के एक अध्ययन में पाया गया कि एमडीडब्ल्यूएस द्वारा ट्विन-पिट शौचालयों के प्रचार के बावजूद, लाभार्थी सेप्टिक टैंक शौचालयों को उच्च प्राथमिकता देते प्रतीत होते हैं। अध्ययन में सर्वेक्षण किए गए 1,000 परिवारों में से 24 प्रतिशत सेप्टिक टैंक पसंद करते हैं, लेकिन समस्या यह है कि लोग जिसे सेप्टिक टैंक कहते हैं वे भारतीय मानक ब्यूरो के अनुसार नहीं हैं। इस प्रकार वे निश्चित रूप से लंबे समय में मिट्टी और पानी के प्रदूषण का कारण बन जाएंगे। वाटरएड इंडिया के पॉलिसी हेड अविनाश कुमार का कहना है कि लगभग 57.8 लाख शौचालय का डिजाइन ही गलत है। वह या तो एक गड्ढे वाले हैं या बुरी तरह से डिजाइन किए गए सेप्टिक टैंक वाले शौचालय हैं। उपरोक्त गणना के अनुसार, 4,077 टन कच्चा मल पदार्थ हर दिन घरों के आसपास के पर्यावरण में डंप किया जाता है।

एकल-गड्ढे और दोषपूर्ण सेप्टिक टैंकों में तत्काल संशोधन की आवश्यकता है। एकल पिट शौचालयों को दो गड्ढे में परिवर्तित किया जा सकता है। त्रिचिनापल्ली स्थित एक गैर लाभकारी संगठन ग्रामालय के अनुसार, पानी के उच्च स्तर या बाढ़ प्रवण क्षेत्रों में, इकोसैन (इकोलॉजिकल सेनिटेशन) शौचालय बेहतर विकल्प है।

अन्य शोध संगठनों द्वारा दिए गए विकल्प में बायो शौचालय हैं और उठे हुए शौचालय हैं। बिहार में एक गैर-लाभकारी संगठन मेघ पायन अभियान द्वारा प्रचारित फायदेमंद शौचालय को एक ऊंचे स्थान पर बनाया जाता है ताकि बाढ़ के दौरान भी पहुंच सुनिश्चित हो सके। इसकी ऊंचाई क्षेत्र में अनुमानित उच्चतम बाढ़ स्तर से निर्धारित होती है। शौचालय की सीट में दो खुले स्थान होते है जो मूत्र और मल को अलग-अलग इकट्ठा करते हैं। ये जमीन पर स्थित दो अलग भंडारण टैंक से जुड़े हुए होते हैं। चूंकि यह एक शुष्क शौचालय है, इसलिए मल पदार्थ टूट कर गंध नहीं बनाता। इकोसैन शौचालय संरचना के पीछे रखी बिना सीमेंट वाली ईंटों को हटाकर संग्रह गड्ढे तक पहुंचा जा सकता है। बाद में मल पदार्थ का उपयोग खाद के रूप में किया जा सकता है जबकि एकत्रित मूत्र यूरिया विकल्प के रूप में कार्य करता है।

एमडीडब्ल्यूएस ने ओडीएफ मुक्त राज्यों के टिकाऊपन भी ध्यान केंद्रित करना शुरू कर दिया है। विशेषज्ञों की राय में उन्हें सही तकनीकों के चयन पर भी ध्यान देना चाहिए। अब यह एक दुष्चक्र ही है कि लोगों को दोषपूर्ण डिजाइन के साथ शौचालयों तक पहुंच मिली है, जिससे अंत में वे इसका इस्तेमाल बंद कर देंगे। दिल्ली स्थित नीति सलाहकार संगठन, सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट के शोधकर्ता बिहार के विभिन्न हिस्सों में गए। उन्होंने पाया कि लोग शौचालयों का उपयोग नहीं कर रहे हैं क्योंकि शौचालय कचरे के उपचार के लिए सही तकनीकें नहीं हैं। वाटरएड अध्ययन बताता है कि उप संरचना और इसे खाली करने की प्रक्रिया से संबंधित विस्तृत डेटा न केवल एसबीएम स्थिरता सर्वेक्षण बल्कि ओडीएफ सत्यापन का भी हिस्सा होना चाहिए।

एसबीएम को पिछले कार्यक्रमों की विफलता से सीखना चाहिए। पिछले कार्यक्रम न केवल लक्ष्य को पूरा करने में नाकाम रहे बल्कि शौचालयों का निर्माण भी ऐसे हुआ जिसका कभी उपयोग नहीं हुआ और अंत में आसपास की मिट्टी और जल स्रोतों को प्रदूषित करता चला गया। सबसे महत्वपूर्ण, लक्ष्य मल पदार्थ का सुरक्षित निपटान होना चाहिए, अन्यथा जीवन की गुणवत्ता में कभी सुधार नहीं होगा और भारत निश्चित रूप से 2030 तक सतत विकास लक्ष्य को पूरा करने में असफल रहेगा।

निष्क्रिय शौचालयों का क्या?
 
ओडीएफ स्टेटस प्राप्त करने के लिए निष्क्रिय शौचालयों का रूपांतरण बहुत महत्वपूर्ण हो गया है। सक्सेना मानते हैं कि एमडीडब्ल्यूएस केवल नए शौचालयों और उनके उपयोग के बारे में बात कर रहा है लेकिन एसबीएम के पहले के कार्यक्रमों के तहत बनाए गए पुराने शौचालयों के बारे में क्या?

वर्तमान में उत्तर प्रदेश, बिहार, असम, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश और झारखंड जैसे छह शीर्ष राज्यों के साथ पूरे देश में लगभग 24 लाख निष्क्रिय शौचालय हैं। एसबीएम के दौरान लगभग 54 प्रतिशत निष्क्रिय शौचालयों को कार्यात्मक बनाया गया। सबसे अधिक पश्चिम बंगाल (92 प्रतिशत) और तमिलनाडु (86 प्रतिशत) में ये रूपांतरण हुआ। बिहार में निष्क्रिय शौचालयों की एक बड़ी समस्या है। एसबीएम के दौरान 7.5 लाख निष्क्रिय शौचालयों में से केवल 18 प्रतिशत ही कार्यात्मक बनाए जा सके हैं।

स्वच्छ भारत कोष के तहत निष्क्रिय शौचालयों के रूपांतरण के लिए लगभग 399.86 करोड़ रुपए जारी किए गए हैं। स्वच्छ भारत कोष 2015 में स्वच्छता क्षेत्र में व्यक्तियों और निगमों के योगदान के साथ स्थापित किया गया था। 2017-18 की स्थायी समिति रिपोर्ट के अनुसार, जारी राशि का केवल 32 प्रतिशत उपयोग किया गया है। समिति की रिपोर्ट के अनुसार, ओडिशा ने 93 करोड़ रुपए का केवल 53 प्रतिशत ही खर्च किया है।

ग्रामीण विकास पर स्थायी समिति की 51वीं रिपोर्ट में निष्क्रिय शौचालयों पर एक मजबूत सिफारिश है। समिति का मानना है कि डेटा का एक बड़ा भ्रम है क्योंकि शौचालयों की सूची में निष्क्रिय शौचालय भी शामिल हैं। समिति ने एमडीडब्ल्यूएस से सिफारिश की है कि सूची में से इन निष्क्रिया शौचालयों को हटाए ताकि देश में निर्मित और कार्यात्मक शौचालयों की एक स्पष्ट तस्वीर सामने आ सके।

मरघट में गंगा

स्वच्छ भारत मिशन के तहत शौचालय निर्माण का लक्ष्य हासिल करना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बड़ी उपलब्धि है लेकिन जहां तक गंगा की सफाई का सवाल है, तो वह इस कार्यकाल में पूरा होना असंभव है। बार-बार समयसीमा बढ़ने के बाद भी गंगा मैली ही है। 2019 में होने वाला लोकसभा चुनाव अगर गंगा की सफाई के आधार पर परखा जाए तो यह मोदी के चुनावी वादे की बहुत बड़ी नाकामी होगी क्योंकि पिछले लोकसभा चुनाव में उन्होंने अपने भाषणों में बार-बार गंगा की निर्मलता का जिक्र किया था। गंगा की सफाई के लिए जारी निधि का खर्च न होना, परियोजनाओं की धीमी रफ्तार और नदी की धारा को अविरल बनाने के लिए कोई काम न होना, नमािम गंगे कार्यक्रम पर सवालिया निशान लगाता है। कानपुर, इलाहाबाद और वाराणसी की यात्रा कर बनजोत कौर ने गंगा सफाई के वादों और हकीकत की पड़ताल की

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मानकों के अनुसार, गंगा किनारे बसे किसी भी महत्वपूर्ण शहर में नदी का पानी पीने योग्य नहीं है

प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने गंगा की सफाई को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल करते हुए गंगा सफाई के तमाम कार्यक्रमों को बदल दिया। अपने पहले ही बजट में इसके लिए 2,000 करोड़ रुपए आबंटित किए। इसके बाद मंत्रिमंडल ने 13 मई 2015 को नमामि गंगे कार्यक्रम को मंजूरी दी और पांच वर्षों के लिए 20 हजार करोड़ रुपए देने की बात कही। यह 1985 से शुरू हुए गंगा एक्शन प्लान का लगभग पांच गुणा था। 7 अक्टूबर 2016 को राजपत्र अधिसूचना निकाली गई जिसके तहत नेशनल गंगा रिवर बेसिन अथॉरिटी को भंग कर नेशनल गंगा काउंसिल का गठन किया गया और नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा (एनएमसीजी) को अथॉरिटी के रूप में मान्यता मिली। इतना ही नहीं गंगा के लिए अलग मंत्रालय का भी गठन हुआ। 2017 में मोदी के एक होनहार कहे जाने वाले मंत्री नितिन गडकरी ने उमा भारती के बाद इस मंत्रालय का पदभार संभाला पर योजनाएं पटरी पर नहीं आईं तो गडकरी ने हाल ही में यह ऐलान किया कि गंगा दिसंबर 2020 में स्वच्छ होगी। जबकि मोदी ने गंगा सफाई का लक्ष्य 2019 रखा था। गंगा की सफाई हो पाएगी या नहीं यह तो समय बताएगा लेकिन अब तक के प्रयास बता रहे हैं कि गंगा सफाई कार्यक्रमों में पुरानी गलतियों को दोहराया जा रहा है।

एक नदी मुख्य रूप से एक ऐसा बड़ा चैनल है, जो बड़े क्षेत्र (जिसे कैचमेंट भी कहा जाता है) से पानी निकालती है और सैकड़ों सहायक और छोटे जल स्त्रोत द्वारा समर्थित होती है। इसलिए, यदि कोई गंगा जैसी नदी को साफ करने के बारे में सोचता है तो उसे न सिर्फ नदी में फैले प्रदूषण को साफ करना है बल्कि इसकी कई सहायक नदियों और अन्य जल स्त्रोतों की सफाई पर भी ध्यान देना होगा। इसलिए, यह मौजूदा बहस खत्म हो गई है कि क्या गंगा मिशन को केवल नदी पर केन्द्रित होना है या विशाल कैचमेंट एरिया या इसके बेसिन पर भी ध्यान देना चाहिए। आईआईटी के एक संघ ने नमामी गंगे के लिए गंगा बेसिन दृष्टिकोण की सिफारिश की है। इसका मतलब है कि न केवल 2,525 किमी लंबी गंगा बल्कि इसकी सहायक नदियों की सफाई भी होनी चाहिए। दूसरे शब्दोें में कहें तो गंगा के तटीय हिस्से में यहां-वहां कुछ परियोजनाएं स्थापित करने की बजाय, पूरे नदी बेसिन यानी गंगा के तहत आने वाले सभी राज्य और इसकी सहायक नदियों को कार्यक्रम के दायरे में लाना चाहिए। गंगा की सफाई के लिए सरकार का वर्तमान सिद्धांत इसे स्वीकार करता है। इसकी कई गतिविधियां आईआईटी संघ के एक अध्ययन “गंगा कायाकल्प बेसिन प्रबंधन कार्यक्रम” (जीआरबीएमपी) से प्रेरित हैं।

हालांकि, यह केवल दस्तावेजों तक ही सीमित रहा। पिछले साल दिसंबर में आई भारत के िनयंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (सीएजी) रिपोर्ट में लिखा था, “एनएमसीजी ने न तो परामर्श के लिए विभिन्न मंत्रालयों/विभागों के बीच जीआरबीएमपी प्रसारित किया और उनकी राय मांगी, न ही गंगा पर दीर्घकालिक हस्तक्षेप शुरू करने के लिए जीआरबीएमपी को अंतिम रूप दिया।” एनएमसीजी वेबसाइट पर मौजूद दस्तावेज जिन विचाराधीन शहरों के बारे में बात करता है, वे मुख्य रूप से गंगा के तटीय क्षेत्र में स्थित हैं, जैसे उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल। इसमें गंगा की सहायक नदियों पर स्थित शहरों की बात नहीं है। सरकार नमामी गंगे के तहत योजनाबद्ध परियोजनाओं को पूरा करने में भी पीछे है। इसने 200 से अधिक परियोजनाओं के साथ कई अवसरों पर बताया है कि नमामि गंगे एक विशाल कार्यक्रम है। हालांकि, परियोजनाओं की स्थिति पर नजर डालें तो, तो संदेह उत्पन होता है कि क्या सरकार 2020 की संशोधित समयसीमा के भीतर लक्ष्य हासिल कर सकेगी। 31 अगस्त, 2018 तक 236 परियोजनाएं मंजूर की गईं, जिनमें से केवल 63 ही पूरी हो पाई हैं।

जहां तक सीवेज इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं की बात है, 13 मई 2015 को केंद्रीय कैबिनेट द्वारा नमामि गंगे को मंजूरी मिलने के बाद 68 परियोजनाएं मंजूर की गई थीं। केवल छह परियोजनाएं 31 अगस्त 2018 तक पूरी हुई हैं। नमामि गंगे के गठन से पहले स्वीकृत 46 लंबित परियोजनाओं में से केवल 21 पूरी हो पाई हैं। गौरतलब है कि नमामि गंगे से पहले राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन अथॉरिटी (एनआरजीबीए) अस्तित्व में थी और इसी के तहत गंगा सफाई कार्यक्रम चल रहा था। नमामि गंगे के आने के बाद, एनआरजीबीए की सभी परियोजनाओं को नमामि गंगे कार्यक्रम में स्थानांतरित कर दिया गया था।

सीवेज उपचार संयंत्र (सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट अथवा एसटीपी) गंगा प्रदूषण खत्म करने के केंद्र में हैं। नमामी गंगे लक्ष्यों के मुताबिक, 2,000 मिलियन लीटर/दिन (एमएलडी) क्षमता के एसटीपी विकसित किए जाने हैं, जिसमें से केवल 328 एमएलडी क्षमता के एसटीपी ही विकसित हो पाए हैं। इस कार्यक्रम में पुराने और मौजूदा एसटीपी के पुनिर्विकास की भी परिकल्पना की गई है। पुनिर्विकास के माध्यम से 887 एमएलडी को नव निर्मित किया जाना था जिसमें से 92 एमएलडी किया गया। सरकार ने बार-बार कहा है कि नई परियोजनाओं में देरी हो रही है क्योंकि भूमि अधिग्रहण और अन्य संबंधित गतिविधियों में काफी समय लग रहा है। हालांकि, पुराने एसटीपी के पुनिर्विकास के काम में खराब प्रदर्शन के लिए लॉजिस्टिकल मुद्दों की कमी का तर्क समझ में नहीं आता है।

हालांकि, यह मुद्दा सिर्फ एसटीपी के निर्माण या पुनर्वास के साथ नहीं बल्कि उनके प्रदर्शन के साथ भी जुड़ा है। प्रत्येक स्थापित एसटीपी में बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) और टोटल सस्पेंडेड सॉलिड (टीएसएस) के लिए डिजाइन मानक है। कानपुर के जाजमऊ में 5 एमएलडी घरेलू अपशिष्ट जल उपचार संयंत्र में बीओडी का स्तर 65 मिलीग्राम/लीटर (30 के डिजाइन मानक के मुकाबले) और टीएसएस का स्तर 92 मिलीग्राम/लीटर (50 के डिजाइन मानक के मुकाबले) का प्रदूषण था। यह कानपुर जल निगम की अप्रैल-मई 2018 की रिपोर्ट के अनुसार है। रिपोर्ट में कहा गया है कि बीओडी और टीएसएस प्रदूषण मानदंडों से अधिक है, क्योंकि औद्योगिक अपशिष्ट और रसायनों को इस प्लांट में अवैध तरीके से मिश्रित किया जाता है जो औद्योगिक प्रदूषण के ट्रीटमेंट के लिए नहीं है। एनएमसीजी के मुताबिक, बिहार का भागलपुर 46.6 एमएलडी अपशिष्ट पैदा करता है। वहां िसर्फ 11 एमएलडी का एक प्लांट है। वह भी अपने मानकों को पूरा नहीं करता। पश्चिम बंगाल का हावड़ा 131 एमएलडी अपशिष्ट पैदा करता है और 45 एमएलडी का एक अकेला संयंत्र मानकों को पूरा नहीं कर पाता। कोलकाता में 130 एमएलडी अपशिष्ट का उपचार करने के लिए चार ट्रीटमेंट प्लांट हैं। एनएमसीजी के मुताबिक, उनमें से कोई मानकों का पालन नहीं कर रहा है।

एसटीपी के साथ एक और समस्या है उनका कम उपयोग। नतीजतन, वे उतने प्रदूषकों का उपचार नहीं कर पाते, जितने की जरूरत है। इसका कारण शहरों में सीवेज नेटवर्क की कमी है। अगर नए एसटीपी बनते भी हैं, तो सीवेज नेटवर्क के बिना इस उद्देश्य को पूरा नहीं कर सकेंगे। गौरतलब है कि नमामि गंगे के बाद 2,071 किलोमीटर नई सीवर लाइन परियोजनाओं को मंजूरी दी गई थी जो अभी सिर्फ 66.85 किमी ही बनी है। बिहार के गंगा बेसिन शहरों में 1,723 किमी सीवर लाइन बिछाई जानी थी। इसमें नमामि गंगे के पहले और बाद के लक्ष्य को शामिल किया गया है। हालांकि, अगस्त के अंत तक केवल 206 किमी की दूरी तक ही सीवर लाइन बिछाई जा सकी है।

इसने स्पष्ट रूप से एसटीपी की उपयोगिता को कम किया है। कानपुर के जाजमऊ में घरेलू अपशिष्ट जल उपचार संयंत्र की क्षमता 130 एमएलडी है। लेकिन अप्रैल-मार्च का औसत केवल 60.5 एमएलडी था। एनएमसीजी के मुताबिक, कानपुर के सभी मौजूदा संयंत्रों में 414 एमएलडी की क्षमता है लेकिन केवल 230 एमएलडी ही उपचारित हो पाता है। उत्तर प्रदेश स्टेट एन्युअल एक्शन प्लान 2017-20 के मुताबिक, कानपुर के केवल 40 प्रतिशत क्षेत्र ही सीवर लाइन से जुड़ा है। पटना में 109 एमएलडी के चार उपचार संयंत्र हैं, लेकिन केवल 32 एमएलडी क्षमता का ही काम हो रहा है।

किसी भी शहर के लिए, एसटीपी को उसके सीवेज से निकलने वाले अपशिष्ट के अनुसार डिजाइन किया जा रहा है। 2016 में इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली में रघु दयाल द्वारा लिखे गए एक पेपर का कहना है कि “सीवेज से निकलने वाले अपशिष्ट का आकलन इस धारणा पर आधारित है कि आपूर्ति किए गए पानी का 80 प्रतिशत अपशिष्ट जल के रूप में वापस आ जाता है। सीपीसीबी द्वारा संकलित कुछ हालिया आंकड़ों से पता चलता है कि गंगा में अपशिष्ट जल का वास्तविक निर्वहन 6,087 एमएलडी है, जो अपशिष्ट पानी के अनुमानित निर्वहन से 123 प्रतिशत अधिक है।” वाराणसी के संकटमोचन फाउंडेशन (एसएमएफ) के अध्यक्ष वीके मिश्रा कहते हैं कि गणना की पद्धति दोषपूर्ण है। एसएमएफ को 2010 में अस्सी क्षेत्र में 35 एमएलडी के एसटीपी निर्माण का कार्य दिया गया था। मिश्रा, जो आईआईटी-बीएचयू में प्रोफेसर भी हैं, कहते हैं, “हमने अस्सी नाली का तीन दिवसीय अध्ययन किया और हमारे आश्चर्य का ठिकाना नहीं था। हमने पाया कि अपशिष्ट जल का निर्वहन 63.5 एमएलडी था। यह 2010 की बात है।” मिश्रा का कहना है कि जब पूरे शहर में पाइप से पानी की आपूर्ति नहीं हो रही है, तो सीवेज से निकलने वाले अपशिष्ट की गणना के लिए मानदंड कैसे बन सकता है। मिश्रा के तर्क को यूपी राज्य वार्षिक कार्य योजना 2017-2020 से भी समर्थन मिलता है, जो कहता है कि वाराणसी में पाइप जल आपूर्ति का कवरेज 60 प्रतिशत से कम है। वास्तव में कानपुर और इलाहाबाद में यह क्रमश: 60 प्रतिशत और 40 प्रतिशत से भी कम है। कानपुर, इलाहाबाद और वाराणसी पूरे गंगा बेसिन प्रदूषण के हॉट स्पॉट हैं।

लेकिन घरेलू सीवेज ही सिर्फ चिंता का कारण नहीं है। उद्योग, विशेष रूप से, कानपुर के जाजमऊ क्षेत्र के टैनरीज (चर्म उद्योग) को लेकर सुप्रीम कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने कई बार गुस्सा प्रदर्शित किया है। उत्तर प्रदेश सरकार ने 30 मार्च, 2017 को एनजीटी से कहा कि सैद्धांतिक रूप से, उसने जाजमऊ से टैनेरी उद्योगों को स्थानांतरित करने का निर्णय लिया है और जिस स्थान पर उन्हें स्थानांतरित किया जाना है, उस पर प्रभावी तरीके से विचार किया जा रहा है। यह अनिवार्य है कि टैनरीज क्रोमियम का उपचार अपने स्वयं के छोटे प्लांट या क्लस्टर में बने प्लांट के जरिए करें और फिर अपशिष्ट को सरकार द्वारा संचालित कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (सीईटीपी) में स्थानांतरित करे, परंतु ऐसा हो नहीं रहा। इस बात की पुष्टि एनजीटी ने अपने 13 जुलाई 2017 के आदेश में की है।

अप्रैल-मई 2018 की कानपुर जल निगम की रिपोर्ट, एनजीटी के अवलोकनों से मेल खाती है। यह कहती है कि सीईटीपी में आने वाला टैनरीज के अपशिष्ट में क्रोमियम की सान्द्रता प्रति लीटर 110.2 मिलीग्राम है। डाउन टू अर्थ टीम ने सीईटीपी का दौरा किया, जहां विशेषज्ञों ने टीम को दिखाया कि कैसे क्रोमियम ने अपशिष्ट जल पर एक अलग परत बना ली थी और इसे नंगी आंखों से देखा जा सकता था। प्लांट में कई अन्य प्रकार के कचरे आ रहे थे, जिसे टैनरीज को खुद ही उपचारित करना था। प्रति 100 मिलीलीटर 175 बीओडी के डिजाइन पैरामीटर और टीएसएस 200 मिलीग्राम/लीटर के मुकाबले इनमें प्रदूषक की मात्रा क्रमश: 203 मिलीग्राम/लीटर और 253 मिलीग्राम/लीटर थी।

जाजमाऊ और पास के गांवों की यात्रा डरावनी तस्वीर प्रस्तुत करती है। वाजिदपुर गांव में गंगा तट पर चार टैनरीज डाउन टू अर्थ टीम को दिखीं। यहां किसी भी टैनरी के बाहर कोई बोर्ड नहीं था और वे लगभग गुमनाम रूप से चल रही थीं। यह जाजमऊ प्लांट के कुछ किलोमीटर पूर्व में है। देखा जा सकता है कि वे गंगा में अपशिष्ट बहा रही हैं। छोटू निशाद ने अपनी छिद्रित त्वचा को दिखाते हुए कहा, “आउटलेट पाइप धूल फेंकते हैं जिसे हम रोजाना श्वास में भरते हैं।” डाउन टू अर्थ ने जिन भी परिवारों से बात की वहां बाल झड़ने, त्वचा संक्रमण, हृदय समस्याएं, सांस लेने की समस्या आम मिलीं। एक अन्य ग्रामीण जगदीश कहते हैं, “यदि हम ढक कर न रखें तो गिलास में रखा पानी लाल हो जाता है। अधिकारी हमारी सुनते ही नहीं हैं।”

जाजमऊ टैनरीज से कुछ किलोमीटर दूर शेखपुर गांव है। 50 वर्षीय ग्रामीण लक्ष्मी शंकर निषाद अपने बाएं पैर को दिखाते हैं, जिसकी त्वचा लगभग छिल गई है। वह कहते हैं, “हम त्वचा संक्रमण से पीड़ित हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि टैनरीज सीधे अपने अपशिष्ट को नालियों में बहा देती हैं और यह भूजल के साथ मिश्रित हो गया है, जो संक्रमित हो गया है।” डीटीई पास के टैनरी से सीधे जुड़े नालियों में अपशिष्ट जल देख सकता था। रसायनों ने नाली को भर दिया था। टैनरीज से बाहर आने वाली धूल ने क्षेत्र के लगभग सभी खंभे पर जंग लगा दिया था।

इस वजह से जाजमऊ के कई दुकानों के लोहे के दरवाजे गल चुके थे। एक अन्य ग्रामीण, 45 वर्षीय श्रीकृष्ण कहते हैं, “गांव के लोग नपुंसक हो रहे हैं और जब वे अस्पताल जा रहे हैं, तो डॉक्टर उन्हें क्षेत्र छोड़ने के लिए कहते हैं। हम यह कैसे कर सकते हैं?” वह कहते हैं कि हमारा घर है, छोटी खेती है, ये सब कैसे छोड़ कर जा सकते हैं। वह पास के खेत में उगाए गए चारा को दिखाते हैं। इस चारे को दो अलग-अलग खेतों में उगाया गया था। एक खेत को भूजल से पानी दिया गया था और दूसरे को वर्षा जल। जो चारा भूजल से उगाया गया था, वह करीब-करीब जल गया था। उन्होंने समझाया कि भूजल में मिले से रसायनों ने इसे जला दिया था। उन्होंने भैंसों को भी दिखाया जिनकी पूंछ सड़ गई थी। भैंस भी भूजल पीती हैं और रसायनों ने उन्हें ऐसा बना दिया है। अगले गांव में भी लोगों के पास ऐसी ही कहानियां थीं। 80 वर्षीय नानू यादव दो किशोर-अंकित और संध्या को दिखाते हैं जिनके सिर पर भूरे रंग की कुछ झुर्रियां हैं। वह कहते हैं, “उनके सभी बाल झड़ गए हैं और कोई नया बाल नहीं आ रहा है। दवाएं भी कुछ काम नहीं करतीं। डॉक्टरों का कहना है कि यह भूजल के संपर्क में आने से हुआ है। स्थिति 10 साल पहले इतनी खराब नहीं थी।” गांव के लोगों ने भी कमजोर नजर, गैस्ट्रिक समस्याओं और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं की शिकायत की।

ऐसा नहीं है कि उनकी समस्याओं का डॉक्युमेंटेशन नहीं हुआ है। एनजीटी के नोटिस में यह लाया गया है कि जाजमऊ, राखीमांडी और खानपुर गांव जैसे अन्य स्थानों पर खुले में क्रोमियम सल्फेट डंप बनाए गए हैं। एनजीटी ने पिछले साल के आदेश में इसे लिखा भी था। सीपीसीबी ने निर्देश के बाद इस साइट का अध्ययन किया। सीपीसीबी की पिछले साल की रिपोर्ट के मुताबिक, “अनुमानित 60,000 टन क्रोम अपशिष्ट और 2 लाख टन मिट्टी इस डंप के आसपास फैली है। इसका भूजल और पर्यावरण पर दीर्घकालिक अपरिवर्तनीय प्रभाव पड़ा है।” सीपीसीबी ने 140 करोड़ रुपए की लागत से साइट के उपचार के लिए अल्पकालिक और दीर्घकालिक उपायों के सुझाव दिए। इसके लिए वित्त पोषण स्रोत अभी तक पहचाना जाना बाकी है।

गंगा की सफाई लंबी सुनवाई के बाद, एनजीटी ने 13 जुलाई, 2017 को यूपी सरकार को निर्देश दिया कि या तो वह 9 एमएलडी के मौजूदा सीईटीपी के अलावा एक नया सीईटीपी बनाने के लिए योजना तैयार करे या उद्योग को स्थानांतरित करे। इसने सरकार को यह सुनिश्चित करने का भी निर्देश दिया कि कचरे को सीईटीपी तक पहुंचाने से पहले क्रोमियम का अनिवार्य रूप से ट्रीटमेंट किया जाए। इसके लिए सरकार द्वारा चलाए जा रहे मौजूदा सीआरपी को अपग्रेड किया जाए या टैनरीज का अपना स्वयं का क्रोमियम ट्रीटमेंट प्लांट (सीटीपी) हो। इस पर पिछले महीने एनएमसीजी ने एनजीटी में जवाब दिया कि कानपुर नगर निगम द्वारा सीआरपी उन्नयन की योजना बनाई गई है। यह भी सूचित किया गया कि 20 एमएलडी सीईटीपी को मंजूरी दे दी है। इससे जाजमऊ में कुल सीईटीपी क्षमता 29 एमएलडी तक पहुंच जाएगी जबकि सेंट्रल लेदर रिसर्च इंस्टीट्यूट ने 2010 में कहा था कि जाजमऊ में टैनरीज से 50 एमएलडी अपशिष्ट निकलता है।

टैनरीज से निपटने के अलावा एनजीटी ने अपने पिछले साल के 543 पृष्ठों के फैसले में गंगा, रामगंगा, काली और पांडु नदियों में जाने वाली 86 नालियों से संबंधित 100 से अधिक निर्देश जारी किए थे। 80 के दशक से गंगा बचाने की मुहिम में जुटे उच्चतम न्यायालय के अधिवक्ता एमसी मेहता ने बताया, “सरकारी एजेंसियों ने ज्यादातर निर्देशों के संबंध में अनुपालन रिपोर्ट जमा की, लेकिन मैंने इस क्षेत्र से जो सूचना इकट्ठा की वह सरकार के जवाब से अलग है।” मेहता की ही याचिका पर एनजीटी ने आदेश पारित किया।

आदेश पारित होने के बाद यह देखने के लिए कई सुनवाई हुईं कि आदेशों का अनुपालन किया जा रहा है या नहीं। अंतिम सुनवाई 6 अगस्त 2018 को हुई। अनुपालन की स्थिति पर टिप्पणी करते हुए एनजीटी ने कहा, “हालांकि ट्रिब्यूनल के 13 जुलाई 2017 के फैसले के आलोक में दिशानिर्देशों के अनुपालन पर प्रगति का दावा किया जा रहा है लेकिन हमें अब भी मीलों आगे जाना है। मौजूदा प्रगति हमारी पूर्ण उम्मीद को पूरा नहीं करती।” एनजीटी ने निगरानी के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक पूर्व न्यायाधीश और अन्य लोगों को मिलाकर एक चार सदस्यीय पैनल का गठन किया। एनजीटी ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को सभी बुनियादी सुविधाएं प्रदान करने के लिए पत्र लिखा। केस की अगली सुनवाई फरवरी 201 9 में होनी है। डाउन टू अर्थ ने संबंधित हाईकोर्ट न्यायाधीश अशोक टंडन से 19 सितंबर को बात की थी। उन्होंने कहा, “समिति 24 सितंबर को चार्ज लेगी और इसके बाद ही वह कुछ बता सकेंगे।”

गंगा सफाई के अलावा, नमामि गंगे वनीकरण के बारे में भी बात करता है। यह नमामि गंगे की एक महत्वपूर्ण गतिविधि भी है क्योंकि इससे भूजल रिचार्ज में मदद मिलती है। सरकार वनीकरण पर करोड़ों रुपए खर्च कर चुकी है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में वनस्पति विज्ञान विभाग के सहायक प्रोफेसर प्रमोद शर्मा लगे हुए पौधे दिखाते हुए कहते हैं “सरकार ने कचनार और गुलमोहर जैसे फूलों के पौधे लगाए जबकि जल संचय के लिए हमें पाकड़, गूलर, नीम और पीपल के पेड़ों की जरूरत थी। इन पौधों से केवल सुंदरता बढ़ाई जा सकती है” कम पानी, अधिक प्रदूषण नदी का प्राथमिक चरित्र है बहते रहना। यदि नदी सही मात्रा में पानी के साथ नहीं बहती तो यह स्वयं को कभी साफ कर ही नहीं सकती। किसी भी सफाई कार्यक्रम के लिए यह बुनियादी विज्ञान और बुनियादी सिद्धांत भी है। लेकिन गंगा में कम से कम पानी बह रहा है। इसका प्रवाह कई स्थानों पर बाधित हुआ है।

गंगा बेसिन में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से 795 छोटे और बड़े बांध हैं, जो इसके प्रवाह को अवरुद्ध करते हैं। विशेष रूप से उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में स्थित जलविद्युत परियोजनाओं, बैराज और नहरों ने गंगा को बर्बाद कर दिया है। इलाहाबाद स्थित एक कार्यकर्ता विजय द्विवेदी ने गंगा सेना का गठन किया है, जो नियमित रूप से नदी की सफाई करती है। वह कहते हैं कि केवल मॉनसून में ही गंगा में पानी का स्तर काफी अच्छा रहता है। वह कहते हैं, “अप्रैल या मई में तो इसमें घुटने तक पानी भी नहीं होता। लोग यहां गायों को चराते हैं, यह एक ड्राइविंग सीखने का क्षेत्र बन जाता है और बच्चों के लिए यह क्रिकेट मैदान।” वह कहते हैं, “हालांकि, योगी (यूपी के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी) ने घोषणा की है कि दिसंबर तक गंगा कुंभ मेला के लिए गंगा साफ हो जाएगी और उस महीने के दौरान अधिक पानी भी जारी किया जा सकता है। यह तब तक केवल कॉस्मेटिक उपाय साबित होगा, जब तक गंगा के प्रवाह को बहाल करने के लिए दीर्घकालिक उपाय नहीं किए जाते।”

संगम पर एक नाविक गोपाल निषाद ने बताया, “पानी की कमी के कारण गर्मी में मछली भी मर जाती है। घाटों पर आने वाले लोग आमतौर पर गर्मी में नाव की सवारी के लिए नहीं जाते हैं और इसका हम पर बुरा प्रभाव होता है।” निषाद पिछले 30 वर्षों से संगम के पास रह रहे हैं। वह कहते हैं, “कुछ साल पहले तक हम दूर से ही गंगा की लहरों की आवाज सुन लेते थे। इसका प्रवाह ही ऐसा था। हालांकि, चीजें अब तेजी से बिगड़ गई हैं।” वाराणसी में भी नाविकों ने ऐसी ही कहानी बताई। यूजीसी के एमेरिटस प्रोफेसर और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के गंगा रिसर्च सेंटर के प्रभारी बीडी त्रिपाठी कहते हैं, “हमें सिर्फ गंगा को साफ करने की जरूरत नहीं है, बल्कि इसे बचाने की भी जरूरत है।” वह कहते हैं, “नदी में पानी का स्तर अभूतपूर्व दर से नीचे जा रहा है। यह नदी के अस्तित्व के लिए एक खतरा है। यदि प्रवाह बनाए रखा जाता है तो नदी अपने-आप 60-80 प्रतिशत कार्बनिक प्रदूषकों को दूर कर सकती है और हमें इस तरह के बड़े कार्यक्रम की आवश्यकता नहीं होगी।”

वह यह भी कहते हैं कि अन्य नदियों के अलग, गंगा में तीन विशेष गुण होते हैं, जो इसके प्राकृतिक रूप से अपनाए जाने वाले पथ के कारण हैं। वह कहते हैं, “गंगा में औषधीय गुण हैं। ये गुण गंगा के रास्ते में औषधीय पौधों के कारण आते हैं। इसके अलावा गंगा जिस मार्ग से चलती है वह खनिजों समृद्ध है। इसमें बैक्टीरियोफेज है, जो बैक्टीरिया को मारता है। यदि आप गंगा के मार्ग को बैराज और नहर की वजह से मोड़ते हैं तो इसका प्राकृतिक मार्ग बदल जाता है। जाहिर है, इससे गंगा अपने गुणों को खो देगी।” वह कहते हैं कि प्रतिबंधों और प्रवाह में कमी के कारण, पानी की वेग कम हो जाता है और गाद बढ़ जाती है, इसलिए पानी के खनिज नदी तलहटी में जमा हो जाते हैं।

इन सभी सिद्धांतों को आईआईटी-खड़गपुर के अभिजीत मुखर्जी और अन्य द्वारा अगस्त 2018 में प्रकाशित एक पेपर के द्वारा समर्थन मिलता है। यह पेपर कहता है कि 1970 के दशक से शुरू हुए िसंचाई पंपिग युग के मुकाबले 2016 का गंगा का बेसफ्लो अमाउंट लगभग 59 प्रतिशत कम हो गया। गंगा का कम होता जलस्तर घरेलू जल आपूर्ति, सिंचाई आवश्यकताओं, नदी परिवहन और पारिस्थितिकी आदि को खतरे में डाल सकती है। नदी के पानी में कमी का इस क्षेत्र में रहने वाली 10 करोड़ से अधिक आबादी के लिए खाद्य उत्पादन पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। 2015-17 की गर्मियों में भी गंगा के जलस्तर और प्रवाह में भारी कमी देखी गई।

मुखर्जी ने कहा कि आने वाले सालों में गंगा के जलस्तर में और गिरावट की आशंका है। नदी को प्रभावित करने के अलावा यह भूगर्भीय प्रक्रियाओं को भी प्रभावित करेगा और असाधारण वर्षा, भूस्खलन इत्यादि जैसी चीजों का कारण बन सकता है। वह कहते हैं, “पूर्वी बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के अधिकांश हिस्सों में गंगा की धार सबसे कमजोर है क्योंकि इन क्षेत्रों में अत्यधिक मात्रा में भूजल से सिंचाई हो रही है।” उन्होंने कहा कि पहाड़ी इलाकों और उत्तराखंड का अध्ययन नहीं किया है। लेकिन उच्च पदस्थ लोगों ने उन्हें बताया है कि उत्तराखंड में जलविद्युत परियोजनाओं और नहर प्रणाली भी कहर बरपा रही हैं। इतना ही नहीं, देहरादून स्थित वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की मई 2018 की रिपोर्ट के मुताबिक, इन परियोजनाओं के चलते गंगा डॉल्फिन के विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। साथ ही अन्य जलीय जैव विविधता भी खतरे में है।

आईआईटी-दिल्ली के प्रोफेसर एके गोंसाईं कहते हैं, “जलविद्युत परियोजनाओं को इस तरह डिजाइन किया जा सकता है कि वे कम पानी का उपभोग करे। इससे निवेश लागत बढ़ सकती है, लेकिन गंगा की सुरक्षा के लिए ऐसा किया जाना चाहिए। अब सरकार यह तय करे कि क्या इसे एक अनिवार्य नीति बनाया जाए या नहीं।” त्रिपाठी का कहना है कि गंगा पर किसी भी नई बड़ी परियोजनाओं की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। हालांकि छोटे बांध बनाए जा सकते हैं। पूरे गंगा बेसिन में लिफ्ट चैनलों के जरिए गंगा के पानी से फ्लड इरिगेशन किया जा रहा है। त्रिपाठी के अनुसार, “सिंचाई के इस तरीके के कारण 80% से अधिक पानी बर्बाद हो जाता है। यदि ड्रिप इरिगेशन जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीिकयों को अपनाया जाता है, तो बर्बादी को कम हो सकती है। उल्लेखनीय है कि एनजीटी ने अपने 2017 के आदेश में कहा कि जब तक कोई मानक तय न हो जाए, तब तक इस बात को सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि गंगा का जलस्तर अपने मूल प्रवाह से 20 प्रतिशत रहे।

स्वच्छ भारत से नुकसान?

सरकारी दावों के अनुसार, गंगा तट पर स्थित 99.93 प्रतिशत गांवों को ओडीएफ (खुले में शौच मुक्त) घोषित किया जा चुका है। स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) पोर्टल के अनुसार, 17 सितंबर 2018 तक 4,000 से अधिक गांवों में 20.7 लाख से अधिक शौचालयों का निर्माण किया गया है। एक तरफ जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को स्वच्छ भारत मिशन के तहत लक्ष्य उपलब्धि के लिए याद किया जाएगा, वहीं गंगा सफाई के उनके दूसरे सबसे बड़े वादे पर इसका असर पड़ता दिख रहा है। इलाहाबाद मंे गंगा के किनारे बसे छपरी गांव के राशिद अली कहते हैं, “मेरे घर में शौचालय है लेकिन ट्विन पिट के कचरे से ओवरफ्लो हो रहा है। अधिकारी अक्सर शौचालय का उपयोग न करने के लिए मुझे डांटते हैं। लेकिन वे उपयोग करने योग्य नहीं हैं। मैं इसका इस्तेमाल कैसे करूं?” वह और उनके परिवार के सदस्य गंगा के पास शौच के लिए जाते हैं। ट्विन पिट प्रणाली के तहत शौचालय की सीट के नीचे दो गड्ढे बनाए जाते हैं। एक गड्ढे में वेस्ट चार-पांच साल तक रहना चाहिए। उसके बाद जब वह भर जाए उसे बंद कर दिया जाता है। जब तब वह वेस्ट खाद बनता है, तब दूसरे गड्ढे का इस्तेमाल होता है।

सीएसई द्वारा किए गए एक अध्ययन के मुताबिक, सर्वेक्षण किए गए अधिकांश शहरों में ट्विन पिट तकनीक थी, जो निचले इलाकों के लिए ठीक नहीं है। उदाहरण के लिए, पश्चिम बंगाल के गंगा बेसिन शहर, बनगांव के जुलाई 2017 की एक शिट फ्लो डायग्राम रिपोर्ट में कहा गया है कि सभी घर जो ऑनसाइट स्वच्छता प्रणाली (ओएसएस) पर निर्भर हैं और जो सीवर नेटवर्क से जुड़े नहीं हैं, वहां सबसे प्रचलित रोकथाम गड्ढा प्रणाली है। आश्चर्य की बात नहीं है कि सीएजी ने दिसंबर 2017 में नमामि गंगे की अपनी ऑडिट रिपोर्ट में ओडीएफ के दावों पर सवाल खड़े किए थे। सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार, बिहार में 228 गांवों में से किसी का भी सत्यापन नहीं हुआ था, उत्तर प्रदेश में ओडीएफ घोषित किए गए 1,022 गांवों में से केवल 108 गांवों का सत्यापन किया गया। गंगा में बढ़ता फिकल कोलिफॉर्म का स्तर इस बात द्योतक है कि मानव मल की मात्रा गंगा के पानी में कम नहीं है। गंगा बेसिन के गांव को ओडीएफ बनाने का उद्देश्य गंगा में फिकल कोलिफॉर्म स्तर में सुधार करना था। गंगा बेसिन पर बसे पांच राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों द्वारा प्रदत्त आंकड़ों के मुताबिक, मई 2018 में गंगा बेसिन शहरों में फिकल कॉलिफॉर्म का स्तर 2500 से 2,40,000 प्रति 100 एमएल था जबकि मानक 2,500 प्रति एमएल का है (देखें, मानकों पर खरा नहीं गंगा का पानी)। यूपी, बिहार और पश्चिम बंगाल में फिकल कोलिफॉर्म स्तर क्रमश: 2,500-15,000, 6,100-31,000 और 1,10,000-2, 80,000 प्रति 100 एमएल था। इसी प्रकार, यूपी, बिहार और पश्चिम बंगाल में कुल कोलिफ़ॉर्म का स्तर क्रमश: 5, 200-2,80,00; 14,000-22,000 और 17,000-3, 50,000 प्रति 100 एमएल था जबकि 5,000 प्रति 100 एमएल का है।

स्रोत: 2018 के आंकड़ों के लिए यूपी, बिहार तथा पश्चिम बंगाल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड,
 2016 के आंकड़ों के लिए ईएनवीआईएस

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट द्वारा की गई गणना के मुताबिक, अगर गंगा बेसिन के पांच राज्य उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल पूर्ण ओडीएफ बन जाते हैं तो प्रति दिन लगभग 180 मिलियन लीटर मल कचरा उत्पन्न होगा। यदि उचित फिकल कचरा प्रबंधन नहीं होता है, तो यह सब गंगा में जाएगा। आगे चिंता का कारण यह होना चाहिए कि मल (फिकल स्लज), सीवेज से भी अधिक प्रदूषित होगा। जहां सीवेज का बीओडी (देखें चुनौतियां और भी हैं) 150-300 मिलीग्राम/लीटर है। वहीं मल कचरा में यह प्रति लीटर 15,000-30,000 मिलीग्राम होगा। लिंड्रा स्ट्रैंड ने अपनी पुस्तक में कहा है कि मल कचरा में कार्बनिक पदार्थ, कुल ठोस और अमोनियम आमतौर पर वेस्ट वाटर की तुलना में 10 या 100 गुना अधिक होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि शौचालयों के निर्माण के दौरान शायद ही कभी मल कचरा प्रबंधन पर विचार किया गया था।

फिकल स्लज एंड सेप्टेज मैनेजमेंट (एफएसएसएम) 2017 पर बनी राष्ट्रीय नीति भी उन चुनौतियों की बात करती है, जो अधिक से अधिक शौचालयों के निर्माण से पैदा होंगी।” एसबीएम के तहत अगले कुछ वर्षों में शहरी परिवारों को शौचालय सुविधाएं मिलेंगी, इसलिए संभव है कि कई लोग सीवेज सिस्टम उपलब्ध नहीं होने पर शहरों में ट्विन पिट शौचालयों और सेप्टिक टैंक पर निर्भर होंगे। इस प्रकार, एसबीएम के तहत जब मानव अपशिष्ट की रोकथाम काफी हद तक संभव हो सकेगी, इसका उपचार अभी से एक बड़ी चुनौती बन गया है। पर्याप्त सुरक्षित और टिकाऊ स्वच्छता की अनुपस्थिति में, स्वास्थ्य संबंधी बीमारियां, पानी और मिट्टी के गंभीर प्रदूषण के रूप में कई भारतीय शहर पहले से ही परिणाम भुगत रहे हैं।”

स्रोत: हाउसहोल्ड बाई एवेलबेलिटी ऑफ  टाइप ऑफ लैट्रिन फैसिलिटी, सेंसस 2011  
एक लाख से ऊपर जनगणना  वाले शहर, सेंसस 2011

एक सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी दीपक सानन कहते हैं, “गंगा बेसिन गांवों में फिकल स्लज के लिए केवल शौचालय नहीं बल्कि फिकल सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एफएसटीपी) की आवश्यकता थी। अब तक मैंने नहीं सुना है कि ऐसे किसी भी क्षेत्र में एफएसटीपी स्थापित किए गए हैं।”

दिल्ली में अंतरराष्ट्रीय गैर-लाभकारी संस्था के साथ काम कर रहे एक स्वच्छता विशेषज्ञ ने कहा, “फिकल स्लज के प्रबंधन के लिए कोई रणनीति नहीं बनाई गई। शौचालयों के निर्माण के साथ-साथ कई हस्तक्षेपों की आवश्यकता थी, जो स्पष्ट रूप से नहीं हुआ।” इंटरनेशनल वाटर मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट (आईडब्ल्यूएमआई) के फिकल स्लज मैनेजमेंट विभाग के प्रमुख रविशंकर टी कहते हैं, “हमें ब्लॉक स्तर पर या ग्रामीणों के समूह के लिए छोटे एफएसटीपी की आवश्यकता थी। हाई वाटर टेबल वाले क्षेत्रों के लिए, हमें स्लज ड्राइंग बेड की आवश्यकता होती है जो ब्लॉक या ग्राम पंचायतों के समूह के लिए बनाए जा सकते हैं। ये बांग्लादेश, अफ्रीका और भारत के कुछ शहरों में आम हैं।” लापरवाही के कारण भी सेप्टिक टैंक काम नहीं कर रहे हैं। गंगाघाट, मुगलसराय और उन्नाव जैसे तीन गंगा बेसिन शहरों का अध्ययन करने के बाद जनवरी 2017 में प्रकाशित आईडब्ल्यूएमआई पेपर ने कहा, “ज्यादातर घर (गंगाघाट में 97% तक) सेप्टिक टैंक पर भरोसा करते हैं, लेकिन इन्हें ठीक तरह से रखा नहीं जाता। प्रत्येक 10-15 साल में फिकल स्लज एकत्र किया जाता है, भले ही हर 3 साल में ऐसा किया जाना जरूरी हो। नतीजतन, सेप्टिक टैंक जो वेस्ट वाटर से 60 प्रतिशत सस्पेंडेड सॉलिड और 40 प्रतिशत ऑर्गेनिक वेस्ट हटा सकते हैं, नहीं हटा पा रहे।”

यह पेपर एक और समस्या पर प्रकाश डालता है और कहता है कि शहरों का प्रदूषण छोटी और खुली नालियों के नेटवर्क से बहता है, जो अंत में गंगा में मिलता है। उत्तर प्रदेश के बिठूर के पास ब्रहवतघाट पर रहने वाले 80 साल के गोविंद प्रसाद दीक्षित ने दिखाया कि कैसे घाट के पास 100 से ज्यादा घरों से निकलने वाली खुली नाली सीधे गंगा में जा रही है। वह बताते हैं, “अधिकारी यहां कई बार आए हैं। वे सर्वेक्षण करने घाट पर जाते हैं और सौंदर्यीकरण का काम देखते हैं लेकिन इस नाली पर कभी ध्यान नहीं देते।” हालांकि यह पेपर गंगा बेसिन शहरों के फिकल स्लज प्रबंधन के लिए एक समाधान प्रदान करता है। यह कहता है कि सीवर और ट्रीटमेंट प्लांट लगाने की लागत 17 बिलियन अमरीकी डालर से अधिक हो सकती है और हर साल संचालन और रखरखाव पर सैकड़ों लाख रुपए लगेंगे। यह कहता है, “ऐसी परियोजनाओं के लिए भूमि मिलना भी एक मुद्दा है। यदि सेप्टेज को मशीन से उठाने के बाद उसका ट्रीटमेंट और पुन: उपयोग किया जाए तो यह फायदे का सौदा है। इसकी (250 से 2,000 रुपए/व्यक्ति) लागत पारंपरिक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स (5,000 रुपए/व्यक्ति) के मुकाबले कम है।

गंगा सफाई का अर्थशास्त्र

गंगा बेसिन नदी प्रबंधन योजना तैयार करने के लिए बने सात आईआईटी के संघ की रिपोर्ट 2013 में आई। अपनी अंतरिम रिपोर्ट में इसने कहा है कि किसी नगरपालिका में उत्पन्न होने वाले वेस्ट वाटर को इस हद तक ट्रीट किया जा सकता है कि वह पुन: उपयोग लायक बनाया जा सके। इसका खर्च एक पैसा प्रति लीटर उस समय बताया गया। नमामि गंगे की पूरी लागत 22,000 करोड़ रुपए है। हालांकि संसदीय स्थायी समिति की एक रिपोर्ट के मुताबिक, परियोजना के समय पर पूरे न होने के कारण नमामि गंगे कार्यक्रम की लागत बढ़ जाएगी। कितनी बढ़ेगी, इसका अनुमान दिसंबर 2018 के बाद ही लगाया जा सकेगा।

नमामि गंगे के दायरे में आने के बाद भी 2011 की शुरुआत में स्वीकृत कई परियोजनाएं अपनी समयसीमा पर पूरी नहीं हो सकीं। जापान इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी (जीका) की सहायता से वाराणसी में एसटीपी का निर्माण किया जाना था। इसे 14 जुलाई, 2010 को 496 करोड़ रुपए की मंजूरी दे दी गई थी और काम 2017-18 में पूरा होने की समयसीमा तय की गई थी। कुछ हिस्सों का काम 2016 में पूरा किया जाना था। डाउन टू अर्थ के पास मौजूद दस्तावेजों से पता चलता है कि इस प्लांट की प्रगति दिसंबर 2014 शून्य थी।

जीका से टेक्निकल बिड पर सहमति का इंतजार था। दिसंबर 2015 में स्थिति जस की तस थी। उसके बाद एसटीपी का निर्माण निर्माण शुरू हुआ और दिसंबर 2016 तक 34 प्रतिशत काम पूरा हुआ। अंतोगत्वा सरकार ने इस प्लांट का संशोधित प्लान जारी किया और परियोजना का व्यय 641.19 करोड़ रुपए हो गया। एक बार फिर समयसीमा को जून 2018 तक बढ़ा दिया गया। यह उत्तर प्रदेश का अकेला उदाहरण नहीं है। गढ़मुक्तेश्वर में 9 एमएलडी क्षमता का एसटीपी अप्रैल 2018 में स्थापित हुआ जबकि समयसीमा 2015-16 निर्धारित थी। इसी तरह की कहानी बुलंदशर एसटीपी की भी है। बिहार में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिलता है। 8 मार्च 2010 को राज्य के बेगूसराय जिले के लिए 2015-16 की समयसीमा के साथ 65 करोड़ रुपए की लागत से 17 एमएलडी का एसटीपी मंजूर किया गया था। परियोजना विश्व बैंक द्वारा सहायता प्राप्त थी।

एनएमसीजी दस्तावेजों से पता चलता है कि दिसंबर 2016 तक निर्माण मोर्चे पर कोई प्रगति नहीं हुई। दिसंबर 2017 में, निविदा रद्द कर दी गई थी। संशोधित एए एंड ईएस (एडमिनिस्ट्रेटिव अप्रूवल एंड एक्सपेंडिचर सेंक्शंड) मार्च 2018 में जारी हुआ। 230 करोड़ रुपए की बढ़ी हुई लागत के साथ इसकी समयसीमा भी बढ़ाई गई और अब यह विश्व बैंक की बजाय केंद्र सरकार की परियोजना बन गई। 8 मार्च 2010 को राज्य के हाजीपुर जिले के लिए 2015-16 की समयसीमा और 113 करोड़ रुपए की लागत पर 22 एमएमडी का एसटीपी मंजूर किया गया था। इस पर अभी तक कोई काम नहीं हुआ है। अब जनवरी 2020 की समयसीमा तय की गई है। ताजी निविदा के साथ 305 करोड़ रुपए की लागत से एक संशोधित एए एंड ईएस जारी किया गया है। पटना का करमलीचक एसटीपी अब 2020 तक 77 करोड़ के बदले 227 करोड़ रुपए की लागत से बनाया जाएगा, जबकि इसे 2010 में पांच साल की समयसीमा के साथ बनाया जाना था। बिहार में ऐसे कई उदाहरण और भी हैं।

इसके अलावा सीएजी ने दिसंबर 2017 की रिपोर्ट में नमामि गंगे के खराब वित्तीय प्रबंधन की भी ओर इशारा किया। इसमें कहा गया, “2014-15 से 2016-17 के दौरान केवल आठ से 63 प्रतिशत धन का उपयोग किया गया। केंद्र की नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा (एनएमसीजी), विभिन्न राज्य गंगा समितियां और अन्य कार्यकारी एजेंसियों का क्रमश: 2,133.76 करोड़ रुपए, 422.13 करोड़ रुपए और 59.28 करोड़ रुपए का फंड इस्तेमाल नहीं हुआ।” 31 मार्च 2017 को स्वच्छ गंगा फंड में 198.14 करोड़ रुपए उपलब्ध थे। यह फंड गंगा की सफाई के लिए आम लोगों द्वारा सरकार को दिया गया है। हालांकि, एनएमसीजी इस फंड का एक रुपए भी इस्तेमाल नहीं कर सका और संपूर्ण राशि योजना को अंितम रूप न देने पाने के कारण बैंकों में ही पड़ी रह गई। एनएमसीजी ने अगस्त 2017 को सीएजी को कहा था कि दिसंबर में 2016 में उसके प्राधिकरण के रूप में आने के बाद सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स (एसटीपी), इंटरसेप्शन एंड डाइवर्सन (आई एंड डी) के कामकाज और संबंधित परियोजनाओं के स्वीकृति की गति बढ़ गई। एनएमसीजी के मुताबिक, इसका नतीजा न केवल लक्ष्यों बल्कि वर्ष 2017-2018 के अंत तक उच्च व्यय के रूप में मिलने की भी संभावना है। हालांकि, एनएमसीजी के दस्तावेज बताते हैं कि 31 अगस्त, 2018 तक 22,323.37 करोड़ रुपए की परियोजनाओं को मंजूरी दे दी गई है, लेकिन सिर्फ 5,291 करोड़ रुपए का ही इस्तेमाल हुआ। कैग ने पाया, “इस प्रकार, एनएमसीजी का जवाब 2014-17 के दौरान कार्यों के निष्पादन की धीमी गति की ओर इशारा करता है और इसलिए धन का कम उपयोग होता है।”

नमामि गंगे के मीडिया आउटरीच पर अनावश्यक खर्च को लेकर भी सीएजी ने सवाल उठाए। डीएवीपी की नई विज्ञापन नीति के अनुसार, केंद्र सरकार के मंत्रालयों / विभागों / संलग्न और अधीनस्थ कार्यालयों / फील्ड कार्यालयों को केवल डीएवीपी के माध्यम से ही विज्ञापन देने हैं। इसके अलावा, डीएवीपी के माध्यम से किए गए विज्ञापनों के लिए मंत्रालयों / विभागों और अन्य क्लाइंट संगठनों को डीएवीपी 15 प्रतिशत छूट (एजेंसी कमीशन के समतुल्य) प्रदान करता है। सीएजी ने कहा, “हमने पाया कि एनएमसीजी ने देश भर के प्रमुख राष्ट्रीय समाचार पत्रों में प्रिंट विज्ञापन जारी करने के लिए अन्य विज्ञापन एजेंसियों को किराए पर लिया और 2.46 करोड़ (मार्च 2014 से जून 2016) का व्यय किया। इसमें 36.06 लाख रुपए एजेंसी कमिशन और 5.23 लाख रुपए सेवा कर के रूप में दिया गया था।” सीएजी ने कहा कि प्रिंट विज्ञापनों के लिए निजी एजेंसियों की सेवा सरकारी नीति का उल्लंघन थी और इसके परिणामस्वरूप एजेंसी कमीशन और सेवा कर के कारण 36.06 लाख और 5.23 लाख रुपए बर्बाद हुए।

विभागों और सरकार के बीच समन्वय

जल संसाधन मंत्रालय ने नमामि गंगे के तहत बेहतर कार्यान्वयन के लिए नौ मंत्रालयों के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए थे। इसमें रेलवे, एचआरडी, युवा, शिपिंग इत्यादि मंत्रालय शामिल थे। हालांकि, आज तक इसका कोई भी विवरण उपलब्ध नहीं है कि ये मंत्रालय कैसे काम कर रहे हैं। उमा भारती के मंत्री रहते मंत्रालय ने जालंधर के बलबीर सिंह सीचेवाल के साथ भी समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए थे। सीचेवाल ने कई वर्षों के प्रयास के बाद जालंधर की कालीबेन नदी को सामुदायिक प्रयासों से पुनर्जीवित किया था जिसके लिए वह विश्व विख्यात हैं। सीचेवाल ने डाउन टू अर्थ से बात करते हुए कहा, “शुरू में हमारे पास कुछ गांवों के मुखिया व अन्य लोग प्रशिक्षण के लिए आए थे। स्वयं उमा भारती भी हमारे प्रयासों को देखने आई थीं पर अब पिछले डेढ़ साल से कोई नहीं आया। हमें नहीं मालूम कि हमारे द्वारा दिए गए प्रशिक्षण का जमीनी स्तर पर क्या इस्तेमाल हुआ। मंत्रालय का कोई भी आदमी लंबे समय से हमारे संपर्क में नहीं है।” नमामि गंगे के बारे में पूछे जाने पर सीचेवाल ने कहा, “हमें नहीं लगता कि एसटीपी और घाट सौंदर्यीकरण तक सिमटी इस कार्यक्रम का कोई दूरगामी परिणाम होगा। जब तक समुदाय को इस कार्यक्रम में सक्रिय रूप से शामिल नहीं किया जाएगा, तब तक यह कार्यक्रम कभी सफल नहीं होगा।”

आईआईटी-कानपुर के प्रोफेसर विनोद तारे कहते हैं, “गंगा एक्शन प्लान में मंत्रालयों के बीच समन्वय की कमी थी। नमामि गंगे में भी कमी है। यदि विभाग पर्याप्त समन्वय नहीं करते हैं, तो कार्यक्रम वांछित उद्देश्यों को प्राप्त नहीं करेगा।” तारे ने गंगा पर रिपोर्ट्स देने वाले आईआईटीज के कंसोर्टियम का नेतृत्व किया था। इन रिपोर्ट्स को बनाने के लिए सरकार ने आईआईटी के कंसोर्टियम को 16 करोड़ रुपए दिए थे। गंगा महासभा के प्रमुख स्वामी जीतेंद्रानंद सरस्वती भी इस बात पर चिंता जाहिर करते हैं। वह एनएमसीजी के डायरेक्टर जनरल (डीजी) को लिख रहे हैं। वह कहते हैं, “जल संसाधन मंत्रालय ने कई मंत्रालयों के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर तो कर लिए लेकिन कोई नहीं जानता कि इसके बाद क्या हुआ। मैंने कई बार पूछताछ की कोशिश की, लेकिन कुछ भी नहीं निकला।”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय गंगा परिषद (एनजीसी) का गठन अक्टूबर 2016 में हुआ। इसके बाद कभी इसकी बैठक नहीं हुई। एनजीसी गंगा नदी में प्रदूषण को रोकने, संरक्षित करने और नियंत्रित करने के लिए गठित किया गया था।

7 अक्टूबर, 2016 को जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय द्वारा जारी राजपत्र अधिसूचना कहती है, “राष्ट्रीय गंगा परिषद हर साल कम से कम एक बार बैठक करेगी या जरूरत पड़ने पर उससे अधिक बार भी।” इसी अधिसूचना के अनुसार, राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन अथॉरिटी (एनजीआरबीए), जिसका नेतृत्व मौजूदा प्रधानमंत्री द्वारा किया जाता है, एनजीसी के अस्तित्व में आने के साथ भंग हो गई। इसलिए, एनजीसी को एनजीआरबीए की जिम्मेदारियों का निर्वहन करना है। पीएम मोदी की अध्यक्षता में एनजीआरबीए की एक बैठक 4 जुलाई 2016 को हुई थी। इसके बाद, एनजीसी का गठन हुआ था। मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने पुष्टि की कि तब से एनजीसी की एक भी बैठक नहीं हुई है। प्रोफेसर तारे यह भी कहते हैं कि अगर प्रशासन में सुधार किया जाता है तो कार्यक्रम को विकेन्द्रीकृत किया जाना चाहिए। शीर्ष पर बैठी सरकार अत्यधिक केंद्रीकृत है और उसे अब सोचना है कि क्या करना है। वैसे लोगों को भारी संख्या में शामिल किया जाना चाहिए जो गंगा बेसिन क्षेत्र में रह रहे हैं।

क्या गंगा साफ हो जाएगी और क्या कोई समयसीमा संभव है? इस प्रश्न के जवाब में प्रोफेसर तारे का कहना है कि इसके लिए 2019 या 2020 की समयसीमा देना अवैज्ञानिक है। वह कहते हैं, “यह इतना आसान काम नहीं है कि कोई ऐसी छोटी समयसीमा दी जा सके। ऐसा करना राजनीतिक रूप से सही हो सकता है लेकिन वैज्ञानिक रूप से नहीं। वास्तव में, यह एक दीर्घकालीन प्रक्रिया है और मुझे नहीं लगता कि वर्तमान परिस्थितियों में कोई समयसीमा तय की जा सकती है।”

आदित्यन पीसी / सीएसई
“गंगा नदी को नई गंगा बनते नहीं देख सकता”
 

गंगा नदी का पर्यावरणीय प्रवाह बनाए रखने और उस पर बन रही ढांचागत परियोजनाओं व खनन रोकने के लिए पिछले 40 सालों से संघर्षरत भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर के पूर्व प्रोफेसर 86 वर्षीय डॉ. जी. डी. अग्रवाल 22 जून, 2018 से अनशन (94 दिनों) पर हैं। उन्होंने चेतावनी दी है कि गंगा को बचाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आगामी 10 अक्टूबर से वे पानी भी नहीं पिएंगे और दशहरे से पहले ही अपनी देह त्याग देंगे। वे गंगा के पुराने स्वरूप को पुर्नस्थापित करने के लिए अपनी जिंदगी का आधा समय त्याग कर चुके हैं। वे कहते हैं कि एक इंजीनियर होने के नाते वे बांध या जल विद्युत परियोजनाओं के विरोधी नहीं हैं लेकिन इसके कारण पवित्र गंगा का स्वरूप नहीं बिगड़ना चाहिए। उनसे गंगा नदी के बनते-बिगड़ते स्वरूप पर हरिद्वार के अनशन स्थल मात‍ृ सदन आश्रम पर अनिल अश्विनी शर्मा ने बातचीत की।

आप गंगा नदी का स्वरूप बचाने के लिए 5वीं बार अनशन कर रहे। कब अहसास हुआ कि गंगा का स्वरूप बिगड़ रहा है?

मुझे लगता है कि समय बीतने के साथ धीरे-धीरे गंगा के बारे में सरकार का, समाज का और मीडिया का भी ध्यान बढ़ रहा है। अगर मैं कहूं कि यह जागरूकता बढ़ने में मेरा भी थोड़ा सा प्रयास है तो गलत नहीं होगा। गंगा के बारे में कहूं तो पहली बार गंगोत्री तक 2006 में जाने का अवसर मिला। उससे पहले भागीरथी (गंगा नदी) 1978 में गया था। तब मैं पहली बार गया था तो मनेरी भाली फेज वन परियोजना का प्रारंभ था। उन्होंने वहां के इंजीनियरों के प्रशिक्षण के लिए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर (आईआईटी) से एक टीम बुलाई थी। मैं भी उस टीम का सदस्य था। तब मुझे पहली बार नजर आया कि कितनी तेजी से भागीरथी का न केवल पर्यावरण खत्म हुआ है बल्कि भागीरथी का तेजी से विनाश भी हो रहा है। भागीरथी को मैं धरोहर भी मानता हूं। तब मैंने अपनी धरोहर बचाने के लिए यह निर्णय लिया।

गंगा की अविरलता पर खतरा है, इसका प्रवाह प्रभावित हो रहा, यह आपने कब महसूस किया?

जब मैं 2006 में वहां गया तो देखा कि गंगोत्री से 160 किलीमीटर नीचे धरासू में मनेरी भाली टू का पॉवर हाउस है। धरासू में एक मीटर के बराबर ही जल रहा होगा। मुझे आश्चर्य हुआ कि मई माह में भागीरथी में इतना कम जल। इसके बाद उत्तरकाशी में तो खूब जल है और प्रवाह भी है, लेकिन उत्तर काशी से दो-तीन किलोमीटर आगे तो भागीरथी में प्रवाह न के बराबर था। यह प्रवाह बमुश्किल एक घनमीटर प्रति सेकेंड था। सरकार जलविद्युत परियोजना को “रन आॅफ रिवर प्रोजेक्ट” कह रही है, भला इस रीवर में प्रवाह कहां है? इसे तो वास्तव में “रन इन द टनल” कहें तो बेहतर होगा। इसके बाद भागीरथी के ऊपर लगभग सौ किलोमीटर जो निर्माण कार्य हो चुका है, उसे एक इंजीनियर होने के नाते तोड़ना सही नहीं चाहता।

उसके ऊपर लोहारी नागपाला पर काम तेजी से चल रहा था, सुरंग आधी बन चुकी थी और इसके ऊपर गंगोत्री मंदिर से एक किलोमीटर नीचे, जहां भैरवघाटी परियोजना बननी थी। सरकार ने आश्वासन दिया कि हम इन परियोजनाओं को बंद तो नहीं करेंगे लेकिन गंगा का पर्यावरणीय प्रवाह बनाए रखेंगे। तब मुझे लगा कि यदि सरकार नदी का प्रवाह बनाए रखती है तो एक हिसाब से यह एक उपलब्धि ही कही जाएगी। पर उसके बाद पर्यावरणीय प्रवाह कितना हो यही तय नहीं हो पा रहा था। तब एक विशेषज्ञ समिति बनी। लेकिन उन विशेषज्ञों में कोई आम राय नहीं बनी। ऐसे में मुझे 2009 में एक बार फिर से उपवास करना पड़ा। इसके बाद लोहारी नागपाला पर काम तुरंत बंद करने का आदेश जारी हुआ। इसके बाद ही नेशनल गंगा रीवर बेसिन अथॉरिटी(एनजीआरबी) का गठन किया गया। साथ ही गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित किया गया।

लेकिन, लोहारी नागपाला पर तो उच्च न्यायालय ने स्थगन आदेश दे दिया, तब आपने क्या किया ?

जी हां, आपकी बात सही है लोहारी नागपाला के बंद करने का जो आदेश था उस पर उच्च न्यायालय का स्थगन आदेश हो गया। ऐसे करने से मेरा प्रयास निरर्थक हो गया। जब अदालती रास्ते से सफलता नहीं मिली तो 2010 में तीसरी बार उपवास करना पड़ा। तब अंतत: भागीरथी के ऊपर के सौ किलोमीटर बनने वाले तीनों प्रोजेक्ट बंद हुए। और उस इलाके को सेंसेटीव जोन घोषित किया गया।

वर्तमान सरकार से आपको कितनी उम्मीद है कि वह गंगा नदी के स्वरूप को बचाने में कदम उठाएगी?

शुरू में तो हमें लगा कि यह (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी) सही आदमी है, जब उन्होंने कहा कि मुझे मां गंगा ने बुलाया है, मां गंगा के लिए काम करना है। इसके बाद सत्ता में आते ही गंगा के लिए अलग मंत्रालय बनाया और “रिजुवनेशन” शब्द का उपयोग किया। इसका मतलब नवीनीकरण नहीं होता है। इसका अर्थ होता है पुरानी स्थिति को बहाल करना। लेकिन उसके बाद से अब तक कोई काम हुआ नहीं। आज चार होने को आए कुछ नहीं हुआ। मुझे तो लगता है कि सरकार नई गंगा बनाने पर तुली हुई है। जैसे वे “नया भारत” तो कहते ही हैं। लेकिन मैं यह कहना चाहूंगा कि मैं “नए भारत” में भी नहीं रहना चाहूंगा, लेकिन कम से कम मैं गंगा को नई गंगा बनते हुए नहीं देख सकता। वास्तव में यह सरकार पूरी तरह से धोखा दे रही है और विशेष रूप से मोदी जी धोखा दे रहे हैं।

आपने गंगा नदी को बचाने के लिए एक कानून बनाने की बात की है, क्या कानून बनाना इस समस्या का हल है?

देखिए कानून बनाने की बात को मैं इस रूप में नहीं लेता हूं कि आप ऐसा नहीं करेंगे तो आपको इतनी सजा मिलेगी। मेरे कानून का मतलब एक संपूर्ण प्रबंधन तंत्र से है। इसे आप लॉ कहें, एक्ट कहें या कानून कहें, कहने का अर्थ कि एक्ट बनाकर ऐसा आॅटोनमस यानी स्वायत्तशासी संस्थान हो जिसमें किसी तरह से सरकार की दखलंदाजी न हो। और, संस्थान में गंगा को जानने व समझने वाले लोग ही काम करें। क्या आईआईटी के लिए एक्ट नहीं बना। हमने गंगा के लिए 2011 में एक ड्राफ्ट बनाया था और 2012 में इसे केंद्र सरकार को भेज भी दिया था।

गंगा नदी की परिस्थितिकी (इकोलॉजी) अब तक किस तरह से नष्ट हो रही है?

देखिए, गंगा नदी में जितने भी प्रकार के बैक्टीरिया, मछली आदि जीव-जंतु हैं, बांध बनते ही वे खत्म होने लगते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि मछली क्या बांध बनने के बाद नीचे से उछल कर ऊपर जा सकती है? या ऊपर से कूद कर नीचे जा पाएगी? उदाहरण के लिए हिल्सा मछली है जो बंगाल की खाड़ी से ऊपर तक यानी गंगोत्री और बदरीनाथ तक अंडे देने जाती थी। अब बांध बनने के बाद हिल्सा इधर से उधर कैसे जा सकती है। इसी तरह से गंगा में पाई जानेवाली विशेष डॉल्फिन है जो कि अब नीचे तो कहीं भी नहीं मिलती।

सरकार का दावा है कि उसने गंगा में जाने वाले कई बड़े नालों का रास्ता बदल दिया है और कई जलशोधन संयंत्र बनाए हैं। क्या गंगा के लिए ये सरकारी प्रयास नाकाफी हैं?

केंद्रीय मंत्री गडकरी ने अपने पत्र में मुझसे कहा था कि हमने कानपुर के सीसामऊ नाले के 140 एमएलडी प्रवाह में से 80 एमएलडी को डायवर्जन किया। 80 एमएलडी तो डायवर्जन की अधिकतम क्षमता हुई। 140 एमएलडी का क्या हुआ? नाले का औसतन प्रवाह? जिस समय, जिस दिन नापा गया उस का प्रवाह? मैं अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि यह नाले का अधिकतम (कम से कम पिछले 10 वर्ष का अधिकतम) नहीं है।

जिसे गंगा नदी की चिंता होती है, वह अधिकतम की बात करता है। सरकार कहती है कि बहुत सी जगहों पर एसटीपी बना दिया है। सवाल उठता है कि ये एसटीपी पर किया जाने वाला खर्च गंगा के मद से क्यों खर्च किया जा रहा है।

आपसे नेशनल मिशन आॅफ क्लीन गंगा के निदेशक राजीव रंजन मिलने आए थे। आपको कोई आश्वासन मिला?

मुझसे मिलने आए थे। मुझे यह आशा नहीं थी कि मेरे पास पहुंचे राजीव रंजन ने “नीरी” की रिपोर्ट देखी भी होगी। हालांकि उन्होंने कहा कि उन्होंने गंगा पर किए गए अलग-अलग अध्ययनों को देखा। और अन्य नदियों से तुलना करने पर पाया कि गंगा नदी के जल में रोगनाशक क्षमता अधिक है। मैंने उनसे प्रश्न किया कि आपने यह रिपोर्ट देखी तो इसके बाद कोई प्रोजेक्ट क्या रोका? उन्होंने कहा कि अभी तो अध्ययन हो रहे हैं। इस पर मैंने उनसे और अध्ययन करने को कहा। उन्होंने मुझे सरकार द्वारा बनाए एक्ट का नया ड्राफ्ट दिया और कहा कि मैं इसे देख लूं। मैंने उन्हें कहा, नए एक्ट में थोड़ा-बहुत परिवर्तन किया गया है। नहीं तो यह हमारे द्वारा तैयार किया गया ड्राफ्ट ही है।

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