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मनरेगा जरूरी या मजबूरी -6: बढ़ानी होगी रोजगार की गारंटी

मनरेगा जैसे रोजगार गारंटी कार्यक्रम ना केवल लोगों के घर में कुछ पैसा लाएगा और बाजार में भी डिमांड पैदा करेगा

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मनरेगा जरूरी या मजबूरी-5: 3.50 लाख करोड़ रुपए की आवश्यकता पड़ेगी

कोरोनावायरस की वजह से पैदा हुए हालात के बाद अर्थव्यवस्था को संभालने में मनरेगा योजना कितनी कारगर रहेगी, एक विश्लेषण-

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मनरेगा जरूरी या मजबूरी-4: 250 करोड़ मानव दिवस रोजगार हो रहा है पैदा

आरोप लगाया जाता है कि मनरेगा के तहत पैसा व्यर्थ किया जाता है, लेकिन हकीकत यह नहीं है

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मनरेगा जरूरी या मजबूरी-3: 100 दिन के रोजगार का सच

कोरोना काल में ग्रामीण क्षेत्र के लिए मनरेगा योजना कितना कारगर साबित हो रही है, डाउन टू अर्थ की खास रिपोर्ट-

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क्या ‘मनरेगा’ में है कोरोनावायरस से पैदा हुए ग्रामीण संकट का जवाब

गांवों में आजीविका की गारंटी देने वाली इस स्कीम से न केवल लोगों को पैसे की मदद पहुंचती है, बल्कि जल संरक्षण का काम ...

लोकतंत्र के लिए कितनी सही हैं कॉरपोरेट पंचायत?

गैर सरकारी संगठन ट्वेंटी20 ने केरल के एक गांव में कॉरपोरेट पंचायत स्थापित की, लेकिन यह लोकतंत्र के लिए कितना सही और दीर्घकालिक होगा?

मानव विकास सूचकांक में एक पायदान लुढ़का भारत, 189 देशों की रैंकिंग में 131 वें स्थान पर पहुंचा

मानव विकास सूचकांक की 189 देशों की इस लिस्ट में भारत को 131 वां स्थान दिया गया है, जबकि पिछले वर्ष (2018 में) भारत को 130 वें स्थान पर रखा गया था

भूख का सामना कर रहे हर पांचवे अमेरिकी ने निभाई राष्ट्रपति चुनाव में भूमिका!

कोविड-19 महामारी से पहले अमेरिका में वर्ष 2019 में लगभग 10.5 प्रतिशत परिवार खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे थे

बिहार चुनाव में क्यों पीछे छूट गए असली मुद्दे

मानव विकास सूचकांक में आखिरी पायदान पर खड़े बिहार में आजीविका, पलायन, खेती, स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण जैसे सवालों का पीछे छूट जाना नाउम्मीद करता है

ग्रामीण भारत में स्वच्छ ईंधन अपनाने की गति क्यों है धीमी : अध्ययन

नए अध्ययन से पता चलता है कि ग्रामीण भारत में खाना पकाने के लिए स्वच्छ ईंधन के उपयोग में कमी आ सकती है। इसका कारण उनका इस बात पर विश्वास करना है कि जलाऊ लकड़ी (फायरवुड) का उपयोग उनके ...

बिहार चुनाव में कितने प्रभावी रहे गरीबी और रोजगार के मुद्दे?

आज तय होगा कि बिहार के लोगों ने रोजगार, गरीबी जैसे मुद्दे को कितनी गंभीरता से लिया है

कोरोना आपदा: 21वें साल में क्या उत्तराखंड लिखने जा रहा है नई इबारत

पलायन आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, लगभग 71 फीसदी प्रवासियों ने उत्तराखंड में अपनी आजीविका के साधन ढूंढ़ लिए हैं

बैठे ठाले: नोबेल का चुनाव

“एक बात समझ लीजिए, यह नोबेल दुनिया के लिए पुरस्कार है पर मेरे लिए इन्वेस्टमेंट है। बाकी आप समझदार हैं”