Sign up for our weekly newsletter

क्या टिड्डियों को मारने का आखिरी रास्ता कीटनाशक ही हैं?

टिड्डियों को मारने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाला ऑर्गेनोफॉस्फेट पानी में मिल जाता है और वातावरण को नुकसान पहुंचाता है

By DTE Staff

On: Wednesday 10 June 2020
 
राजस्थान के जयपुर जिले में टिड्डियों के ऊपर फायर ब्रिगेड की गाड़ी से कीटनाशक का छिड़काव करते कर्मचारी। फोटो: इशान कुकरेती
राजस्थान के जयपुर जिले में टिड्डियों के ऊपर फायर ब्रिगेड की गाड़ी से कीटनाशक का छिड़काव करते कर्मचारी। फोटो: इशान कुकरेती राजस्थान के जयपुर जिले में टिड्डियों के ऊपर फायर ब्रिगेड की गाड़ी से कीटनाशक का छिड़काव करते कर्मचारी। फोटो: इशान कुकरेती

भारत के कई राज्यों मे टिड्डियों का आतंक है। इनके चलते किसानों की नींद उड़ी हुई है। प्रशासन किसानों को समझा रहे हैं कि जब टिड्डी दल आए तो वे बर्तन या ढोल बजा कर उन्हें भगाने का प्रयास करें। कुछ राज्यों में डीजे तक बजाने की सलाह दी जा रही है, लेकिन इन टिड्डियों को मारने के लिए कीटनाशक का प्रयोग किया जाता है। 

भारत में 2019 में लगभग 3,70,000 हेक्टेयर से ज्यादा भूमि पर ऑर्गेनोफॉस्फेट का छिड़काव किया। ऑर्गेनोफॉस्फेट का छिड़काव करने का अधिकार केवल भारत सरकार के लोकस्ट वॉच सेंटर (एलडब्ल्यूसी) के पास है, लेकिन सरकार ने किसानों को भी इसके इस्तेमाल की इजाजत दे दी है

ऑर्गेनोफॉस्फेट जैसे क्लोपाइरिफस, मलादियान और फेनिट्रोदियान, रसायनों के समूह हैं, जिन्हें नाजियों ने मनुष्य के स्नायु तंत्र को कमजोर करने के लिए बनाया था। इन्हें बाद में कीटनाशकों के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा। यह खेतों के पास स्थित पानी के स्रोतों में मिल जाने के लिए जाने जाते हैं। इसके जरिए यह अलग-अलग स्रोतों से हमारे शरीर में भी घुस जाते हैं। जोधपुर के कृषि विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर मदन मोहन कहते हैं, “राजस्थान में आने वाले प्रवासी पक्षी अगले मौसम में निश्चित रूप से मारे जाएंगे क्योंकि यह ऑर्गेनोफॉस्फेट्स पानी के स्रोतों में मिल चुके होंगे।”

खाद्य और कृषि संगठन ने टिड्डों के नियंत्रण के लिए 10 प्रकार के रसायनों (तीन श्रेणियों में विभाजित) की सिफारिश की है। इनमें से ऑर्गेनोफॉस्फेट्स का इस्तेमाल आखिरी उपाय के रूप में किया जाता है। पहली श्रेणी मायकॉइनसेक्टिसाइड की है जिनमें मेटारिजियम शामिल है। इनसे अन्य जीवों जैसे टिड्डियों को खाने वाले पक्षियों और पानी में रहने वाले जीवों को कम खतरा होता है। दूसरी श्रेणी कीड़ों की बढ़ोतरी को नियंत्रित करने वाले कीटनाशकों जैसे टेफ्लूबेंजुरोन और ट्राइफ्लुमुरोन की है। इससे मनुष्य के शरीर में बहुत कम जहरीला पदार्थ जाता है और यह न्यूरोटॉक्सिक कीटनाशकों की तुलना में कम हानिकारक होते हैं। जीवों, खासतौर से पानी में रहने वाले जीवों पर इसका कुछ दुष्प्रभाव अवश्य पड़ता है।

जोधपुर के टिड्डी नियंत्रित में प्रशिक्षित वैज्ञानिक चंद्रशेखर शर्मा कहते हैं, “यदि हम शुरुआत में ही टिड्डियों के बढ़ने का पता लगा लें तो पहली दो श्रेणियां कारगर होंगी। लेकिन इस बार हमने देर से कार्रवाई की है, इसीलिए हमें खतरनाक और प्रभावी ऑर्गेनोफॉस्फेट का इस्तेमाल करना पड़ा।” उन्होंने बताया कि क्लोरपाइरिफस 3 घंटे के भीतर अपने 50 प्रतिशत शिकार को खत्म कर देता है। बचे हुए पतंगों को लकवा हो जाता है या वे बेहोश हो जाते हैं त‍था 1 घंटे के भीतर खत्म हो जाते हैं।

64 देश प्रभावित

पूरी दुनिया में रेगिस्तानी टिड्डी के प्रकोप से लगभग तीन करोड़ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र प्रभावित हुआ है। इतने क्षेत्र में उत्तर-पश्चिमी और पूर्वी अफ्रीकी देश, अरब देश, अरब प्रायद्वीप, दक्षिणी सोवियत रूस, ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत सहित करीब 64 देश शामिल हैं। सामान्य दिनों में जब इनका प्रभाव कम होता है तब भी ये 30 देशों के एक करोड़ 60 लाख वर्ग किमी क्षेत्र में पाई जाती हैं।

18 फरवरी 2020 को सीएनबीसी अफ्रीका काे दिए एक साक्षात्कार में मूडीज एनवेस्टरर्स सर्विस के उपाध्यक्ष केल्विन डेलरिम्पल ने कहा कि पूर्वी अफ्रीकी देश जैसे युगांडा और तंजानिया जैसे देशों की अर्थव्यवस्थाएं टिड्डियों के हमले से व्यापक रूप से प्रभावित हो रही हैं। उन्होंने कहा कि पिछले एक माह के दौरान केन्या, सोमालिया व इथियोपिया की फसलों को टिड्डी दलों ने बड़ी मात्रा में नुकसान पहुंचाया है। ध्यान रहे कि इस हमले के बाद इन देशों के आर्थिक विकास पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं और तेजी से खाद्य असुरक्षा बढ़ रही है। सोमालिया सरकार ने तो खाद्य संकट की घोषणा तक कर डाली है। इस संबंध में संयुक्त राष्ट्र संघ का कहना है कि टिड्डियों के हमले से पूरे पूर्वी अफ्रीका में एक करोड़ 40 लाख लोग प्रभावित हुए हैं। उसका कहना है कि इस संकट से निपटने के लिए 76 मिलियन डालर की जरूरत है।