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हिमाचल में ओलों के बड़े आकार से किसानों का नुकसान बढ़ा

ओलों का आकार बड़ा होने के कारण सेब के पेड़ों के ऊपर लगाए गए एंटी हेल नेट टूट रहे हैं। इससे बागवानों का नुकसान बढ़ रहा है

By Rohit Prashar

On: Thursday 04 June 2020
 
हिमाचल प्रदेश: ओलों के साइज को हाथ में उठाकर दिखाता बागवान। फोटो: रोहित पराशर
हिमाचल प्रदेश: ओलों के साइज को हाथ में उठाकर दिखाता बागवान। फोटो: रोहित पराशर हिमाचल प्रदेश: ओलों के साइज को हाथ में उठाकर दिखाता बागवान। फोटो: रोहित पराशर

हिमाचल प्रदेश के किसान और बागवान इन दिनों एक नई मुसीबत से जूझ रहे हैं। पिछले तीन महीने से जहां राज्य के 12 में से 10 जिलों में सामान्य से अधिक बारिश और ओलावृष्टि हो रही है। वहीं, ओलों का साइज इतना बड़ा है कि इससे उनकी खेती को ज्यादा नुकसान हो रहा है। खासकर, सेब बागवानों के लिए ये ओले बड़ी मुसीबत बन रहे हैं। सेब किसान ओलावृष्टि से बचने के लिए एंटी हेल नेट लगाते हैं, लेकिन ओले के बड़े साइज की वजह से ये हेल नेट टूट जा रहे हैं। 

सेब बागवान बताते हैं कि इससे पहले कभी इतने बड़े साइज के ओले नहीं गिरते थे। साइज के साथ-साथ भारी मात्रा में ओलावृष्टि का बोझ एंटी हेल नेट नहीं झेल पाते हैं। पिछले तीन माह में 10 से अधिक बार बड़े साइज के ओलों ने किसान-बागवानों की खड़ी फसलों में तबाही मचाई है। 

हर साल 3500 से 4000 सेब की पेटियों का उत्पादन करने वाले शिमला जिले के टिक्कर क्षेत्र के बागवान संजीव सूंटा ने बताया कि इस बार ओलों ने बागवानों की कमर तोड़ दी है। अप्रैल-मई में आए ओले ने ज्यादातर बागवानों के उत्पादन को 50 फीसदी कम कर दिया है। वह हर साल अपने 40 बीघा के बगीचे से 3500 से 4000 पेटियां सेब उप्तादित करते थे, लेकिन इस बार ओले की मार से केवल 500 से 600 पेटियां होने का अनुमान लगाया जा रहा है।

वहीं, जुब्बल के एक अन्य बागवान प्रशांत सेहटा ने बताया कि हम अपने बुजुर्गाें से सुनते थे कि जिस वर्ष सर्दियों में बारिश और बर्फबारी अच्छी होती थी, उस साल मार्च-अप्रैल में ओलावृष्टि और बारिश ज्यादा नहीं होती थी और ये हमने भी स्वयं अपने क्षेत्र में जांचा था, लेकिन अब ऐसा नहीं हो रहा है। पहले ओले केवल 2-3 मिनट के लिए आते थे लेकिन अब ये 10 से 15 मिनट तक हो रहे हैं। 

मौसम विभाग की ओर से जारी रिपोर्ट के अनुसार मार्च से 31 मई तक रिकार्ड बारिश दर्ज की गई है। इस रिपोर्ट में 31 मई 2020 को हुई बारिश पिछले 33 वर्षाें में सबसे अधिक आंकी गई है। इसके अलावा मार्च से मई माह में सामान्य से 19 फीसदी अधिक बारिश दर्ज की गई है, जो वर्ष 2004 के बाद दूसरी बार हुई है। हिमाचल प्रदेश के 12 में से 10 जिलों में सामान्य से अधिक बारिश, जबकि शेष बचे दो जिलों लाहौल-स्पीति और किन्नौर में सामान्य से क्रमशः 51 और 47 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई है।

पर्यावरणविद् कुलभुषण उपमन्यू ने डाॅउन टू अर्थ को बताया कि हिमालय रीजन में मैदानी और अन्य क्षेत्रों के मुकाबले में तापमान अधिक गति से बढ़ रहा है। हिमालयन रीजन अन्य क्षेत्रों के मुकाबले अधिक संवेदनशील है और इसी की वजह से यहां पर पर्यावरण के बदलावों को बड़े जल्दी देखा जा रहा है। पहाड़ों में हो रहा अंधाधुंध निर्माण कार्य, बांधों का निर्माण, विकासात्मक गतिविधियों के लिए पेड़ों को काटना और पर्यटन गतिविधियां बढ़ने, वाहनों की संख्या में बढ़ोतरी से कार्बन उत्सर्जन अधिक बढ़ गया है। इससे हिमाचल जैसे पहाड़ी इलाकों में भी मैदानी इलाकों जैसा मौसम बनता जा रहा है। उपमन्यू कहते हैं कि मैदानी इलाकों में ओलों का आकार बड़ा होता है, लेकिन पहाड़ी इलाकों में इनका आकार छोटा होता था, लेकिन अब इसमें बदलाव आ रहा है।

बागवानी विकास अधिकारी डाॅ. किशोर शर्मा ने डाॅउन टू अर्थ को बताया कि पिछले कुछ वर्षाें में ओलावृष्टि की घटनाओं में वृद्धि देखी गई है। कुछ वर्ष पूर्व तक ओले मई माह के बाद गिरते थे। अप्रैल-मई में फलों का साइज बढ़ना शुरू हो गया होता है और इस दौरान फल वाॅलनट साइज के हो जाते हैं। ऐसे समय में ओले गिरने से नुकसान ज्यादा हो रहा है। बड़े आकार के ओले से फल झड़ने के साथ फलों में लाल रंग के धब्बे पड़ जाते हैं, जिससे मार्केट में इसे अच्छा रेट नहीं मिल पाता। इसके अलावा मई में ओलों के बड़े साइज से फलों को तो नुकसान हो रहा है। साथ ही पेड़ों को भी भारी नुकसान पहुंच रहा है।