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जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए 43 फीसदी शहरों के पास नहीं है कोई योजना

812 शहरों पर किए इस सर्वेक्षण में से 93 फीसदी ने माना वो किसी न किसी रूप में जलवायु परिवर्तन से जुड़े खतरों को झेल रहे हैं  

By Lalit Maurya

On: Thursday 13 May 2021
 

हाल ही में अंतराष्ट्रीय संगठन कार्बन डिस्क्लोसर प्रोजेक्ट (सीडीपी) द्वारा शहरों और उनकी जलवायु परिवर्तन से निपटने को लेकर की गई तैयारियों पर एक अध्ययन जारी किया है, जिसके मुताबिक 43 फीसदी शहरों ने माना है कि उनके पास जलवायु अनुकूलन को लेकर कोई योजना नहीं है। यह 43 फीसदी शहर 40 करोड़ लोगों का घर हैं, ऐसे में बिना प्रभावी योजना के यह जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरों का मुकाबला कैसे करेंगें, यह सोचने का विषय है।

दुनिया के 812 शहरों पर किए इस सर्वेक्षण में से करीब 93 फीसदी शहर किसी न किसी रूप में जलवायु परिवर्तन सम्बन्धी खतरों को झेल रहे हैं, जो उन शहरों में रहने वाले लोगों और वहां के बुनियादी ढांचे के लिए बड़ा खतरा है। वहीं 60 फीसदी शहरों ने माना कि उनके यहां जल संकट को लेकर खतरा बना हुआ है। शहरों के लिए बाढ़, समुद्र के जल स्तर का बढ़ना, हीटवेव, तूफान, सूखा, जल संकट और वायु प्रदूषण सबसे बड़े खतरे हैं, जिनसे निपटना जरुरी है।

इसके बावजूद 41 फीसदी शहरों ने जलवायु सम्बन्धी जोखिम का आकलन भी नहीं किया है, जोकि जलवायु परिवर्तन से निपटने की तैयारी में एक महत्वपूर्ण कदम है| इसी की मदद से यह पता चलता है कि शहरों में रहने वाले कितने लोग, संसाधन और वहां का बुनियादी ढांचा किस हद तक जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न हुए खतरे की जद में है|

जलवायु परिवर्तन का खतरा शहरों में स्वास्थ्य पर भी असर डाल रहा है| 166 शहरों ने माना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण वो संक्रामक बीमारियों का खतरा झेल रहे हैं| वहीं 74 फीसदी शहरों ने माना है कि पहले से ही हाशिए पर रह रही आबादी के लिए जलवायु परिवर्तन ने उनके संकट को और बढ़ा दिया है|

रिपोर्ट के अनुसार हर चार में से एक शहर के पास इससे निपटने के लिए पर्याप्त बजट नहीं है| वो अपने लोगों और बुनियादी ढांचे को बचाने के लिए केंद्र सरकार पर निर्भर हैं| यही नहीं 2020 में 422 शहरों में जलवायु परिवर्तन को लेकर बनाई गई 1,142 परियोजनाओं को वित्त की आवश्यकता है| इन परियोजनाओं पर आने वाला कुल खर्च करीब 529,727 करोड़ रूपए का है| जिसमें जल प्रबंधन के लिए 166,275 करोड़ रुपए और ट्रांसपोर्ट से जुड़ी परियोजनाओं के लिए 136,846 करोड़ रुपयों की जरुरत है|

हालांकि ऐसा नहीं है कि शहर जलवायु परिवर्तन को लेकर सजग नहीं हैं| जहां 2011 में सिर्फ 48 शहरों ने जलवायु परिवर्तन से जुड़ी जानकारियों को साझा किया था वो 2020 में बढ़कर 812 पर पहुंच गई है| यह शहर 81 करोड़ लोगों का घर हैं|

544 शहरों ने साझा की हैं अपने उत्सर्जन के बारे में जानकारी

यही नहीं 544 शहरों ने अपने उत्सर्जन के बारे में जानकारी दी है, इसके अनुसार इन शहरों ने 2020 में करीब 260 करोड़ मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन किया था| शहरों में रिन्यूएबल एनर्जी का उपयोग भी बढ़ रहा है| यह शहर अपनी 42 फीसदी ऊर्जा अक्षय स्रोतों से प्राप्त कर रहे हैं, जबकि वैश्विक स्तर पर यह आंकड़ा केवल 26 फीसदी ही है|

साथ ही 2020 में 45 फीसदी या 339 शहरों ने अपने उत्सर्जन को कम करने के लिए शहरी स्तर पर लक्ष्य निर्धारित किए हैं, जबकि इससे पहले 2011 में सिर्फ 11 शहरों ने ऐसा किया था| जिनमें से 148 शहरों द्वारा तय लक्ष्य तापमान में हो रही वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस पर रोकने के अनुरूप ही हैं| वहीं 399 शहरों ने जलवायु सम्बन्धी लक्ष्यों को हासिल करने के लिए कार्य योजनाएं भी बनाई हैं| 459 शहरों ने जलवायु परिवर्तन से जुड़े खतरों का सामना करने के लिए अनुकूलन सम्बन्धी योजनाएं तैयार की हैं, यह आंकड़ा 2011 में सिर्फ 30 था|    

वैश्विक उत्सर्जन के मामले में शहर बहुत मायने रखते हैं| आज दुनिया की करीब 50 फीसदी आबादी शहरों में रहती है, जो 2050 तक बढ़कर करीब 70 फीसदी हो जाएगी| यह शहर दुनिया के 70 फीसदी उत्सर्जन के लिए जिम्मेवार हैं, ऐसे में जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ी जा रही जंग में इनका योगदान बहुत मायने रखता है| यदि हमें 2050 तक वैश्विक उत्सर्जन को शून्य करना है और पेरिस समझौते के लक्ष्यों को हासिल करना है, तो हमें 2030 तक अपने उत्सर्जन को आधा करना होगा| यह तभी मुमकिन होगा जब शहर जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते खतरों को समझेंगें और इससे निपटने को गंभीरता से लेंगें|