Sign up for our weekly newsletter

ओजोन क्षरण वाले एचसीएफसी141-बी आयात पर रोक, क्या बड़ी उत्सर्जन कटौती का दावा सही है?

सरकार के आंकड़े और दावे से उलट शोध पत्र यह इशारा करते हैं कि भारत में एचसीएफसी 141-बी से उत्सर्जन पहले से ही बहुत कम है।

By Vivek Mishra

On: Friday 24 January 2020
 

Photo : Pxfuel

केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने ओजोन परत को नुकसान पहुंचाने वाले हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन (एचसीएफसी)–141-बी का आयात एक जनवरी, 2020 से पूरी तरह से बंद कर दिया है। मंत्रालय ने कहा है कि 141-बी एचसीएफसी का इस्तेमाल मुख्य रूप से आयात के जरिए फोम इंडस्ट्रीज के जरिए  किया जाता है। सरकार का दावा है कि भारत में 141-बी-एचसीएफसी का उत्पादन होता नहीं है और आयात पर रोक के बाद ओजोन को नुकसान पहुंचाने वाली करीब 7800 टन गैस का उत्सर्जन घट जाएगा, जिसका बेसलाइन स्तर 2009-2010 होगा।

केंद्रीय वन एंव पर्यावरण मंत्रालय ने यह भी कहा है कि एचसीएफसी–141-बी आयात रुकने पर एचसीएफसी उपभोग में 50 फीसदी की कमी होगी। हालांकि, यह नहीं बताया गया है कि यह 50 फीसदी की मात्रा क्या है और यह अनुमान किस आधार पर निकाला गया है। ओजोन को नुकसान पहुंचाने वाले 7800 टन गैस उत्सर्जन में कटौती और 50 फीसदी उपभोग की कमी के लिए हमें यह जानना जरूरी है कि एचसीएफसी 141बी की भूमिका कितनी है। क्या वाकई आयात पर रोक लगाने से एचसीएफसी उत्सर्जन में इतनी बड़ी कटौती संभव है?  

केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के ओजोन सेल और यूएन एनवॉयरमेंट ने ओजोन क्षरण तत्वों (ओजोन डिपलीशन सबस्टेंस – ओडीपी) यानी एचसीएफसी को चरणबद्ध तरीके से हटाने के लिए दस्तावेज तैयार किया था। इसमें कुल पांच एचसीएफसी गैस उपभोग का जो आंकड़ा दिया गया है उनमे दो नाम प्रमुख हैं, शेष का उपभोग न के बराबर हैं। पहला है एचसीएफसी 141-बी, दूसरा है एचसीएफसी-22।

यह ध्यान रहे कि ओजोन परत के लिए सबसे ज्यादा नुकसानदायक क्लोरोफ्लोरोकार्बन (सीएफसी) है। इसके बाद दूसरे स्थान पर एचसीएफसी है। अभी बात एचसीएफसी पर ही हो रही है। एचसीएफसी में देश में सबसे ज्यादा उपभोग एचसीएफसी-22 गैस का होता है। सरकार के मुताबिक सिर्फ इसका उत्पादन देश में किया जाता है और कई देशों को निर्यात भी किया जा रहा था। कुछ वर्ष ऐसे भी रहे हैं जिनमें एचसीएफसी-22 को थोड़ी मात्रा में आयात भी करना पड़ा है। प्रतिवर्ष इसका उत्पादन 09 हजार से 11 हजार टन के बीच है।  

पर्यावरण मंत्रालय के दस्तावेज के मुताबिक एचसीएफसी 22 का 77 फीसदी इस्तेमाल कमरों में वातानूकलन के लिए रेफ्रिजरेंट्स के तौर पर किया जाता है। बाकी 14 फीसदी डक्टेड स्पलिट में किया जाता है। अब दूसरे स्थान पर एचसीएफसी 141 बी का नाम शामिल है जिसके आयात पर रोक लगाकर ओजोन को नुकसान पहुंचाने वाली गैस उत्सर्जन में बड़ी कटौती की बात कही जा रही है। हालांकि शोध पत्रों से सरकार के आंकड़े मेल नहीं खाते हैं।

2019 में एटमॉस्फेरिक केमेस्ट्री एंड फिजिक्स जर्नल में हालोकार्बन उत्सर्जन पर आधारित एक शोध पत्र प्रकाशित हुआ है।  इसके मुताबिक भारत में एचसीएफसी के बारे में बहुत ही कम जानकारी मौजूद है। महज उपभोग के आंकड़े ही मौजूद हैं । भारत एचसीएफसी 141बी के उत्पादन आंकड़ों को रिपोर्ट नहीं करता है और न ही एचसीएफसी 141बी उत्पादन के लिए जांच या निगरानी तंत्र है।

2019 में प्रकाशित इस शोधपत्र के मुताबिक दुनिया में एचसीएफसी की तीन प्रमुख गैसों का उत्सर्जन होता है। पहला एचसीएफसी 22, दूसरा एचसीएफसी 141बी और तीसरा एचसीएफसी 142बी। विकसित देशों में उत्सर्जन में गिरावट के कारण या तो इन गैसों का उत्सर्जन स्थिर है या फिर इनमें गिरावट जारी है। वहीं, भारत में प्रतिवर्ष एचसीएफसी141बी का उत्सर्जन एक हजार टन है। जबकि सरकार आयात रुकने के बाद 7800 टन उत्सर्जन घटने का दावा कर रही है। इसी शोध पत्र में कहा जा रहा है कि एचसीएफसी 22 का उत्सर्जन प्रति वर्ष करीब 8000 टन है। ऐसे में सरकार का दावा चकराने पर मजबूत करता है। यदि फैसला एचसीएफसी 141बी के आयात पर रोक का लिया गया है तो परिणाम एचसीएफसी 22 के कैसे आ सकते हैं?

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवॉयरमेंट के तरुण गोपालकृष्णन ने डाउन टू अर्थ को बताया कि भारत सरकार का उत्सर्जन संबंधी आंकड़े स्पष्ट नहीं हैं। न ही इनका संग्रह किया जाता है और नही इन्हें प्रकाशित किया जाता है। यदि सच में सरकार ने उत्सर्जन आंकड़ों में कटौती कर दी है तो हमें उत्सव मनाना चाहिए लेकिन सच्चाई यही है कि कटौती साबित हो यह बहुत ही टेढ़ी खीर है।

वहीं, आयात पर रोक लगाने के बाद यह भी संभव है कि एचसीएफसी का उत्पादन और इस्तेमाल करने वाली ऐसी सूक्ष्म और मध्यम औद्योगिक ईकाइयां इसका घरेलू स्तर पर इस्तेमाल चोरी-छुपे खुद से बढ़ा दें। यह इसलिए भी संभव है कि क्योंकि निगरानी और जांच के लिए कोई तंत्र नहीं है।  

17-21 सितंबर, 2007 को 19वीं मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल की बैठक में संधि के अनुच्छेद-5 के तहत यह निर्णय लिया गया था कि एचसीएफसी उत्पादन और उपभोग को विकसित और विकासशील देशों से चरणबद्ध तरीके से खत्म करना है।

वहीं इससे पहले जुलाई, 2002 में मॉन्ट्रियल प्रटोकॉल को लागू कराने वाली कार्यकारी समिति ने 37वीं बैठक में फोम सेक्टर में एचसीएफसी से भी ज्यादा घातक क्लोरोफ्लोरोकार्बन-11 (सीएफसी-11) को चरणबद्ध तरीके से हटाने के लिए परियोजना को मंजूरी दी थी। इसके लिए 5,424,577 यूएस डॉलर फंड की मदद से 612 ओडीपी टन सीएफसी-11 को कम करना तय किया गया था।