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99 वर्ष पूर्व मकर संक्रांति के दिन मिली थी कुली कलंक से मुक्ति

आज भी हर वर्ष 14 जनवरी के दिन लोग बागेश्वर के बगड़ में पहुंचते हैं और सरकार की जन विरोधी नीतियों संबंधी कागजात प्रतीकात्मक रूप से गोमती-सरयू में बहाते हैं

By Trilochan Bhatt

On: Tuesday 14 January 2020
 
बागेश्वर के ऐतिहासिक बगड़ में 14 जनवरी को प्रतीकात्मक रूप से कुली बेगार के कागज नदी में बहाए जाते हैं। फोटो - त्रिलोचन भट्ट
बागेश्वर के ऐतिहासिक बगड़ में 14 जनवरी को प्रतीकात्मक रूप से कुली बेगार के कागज नदी में बहाए जाते हैं। फोटो - त्रिलोचन भट्ट बागेश्वर के ऐतिहासिक बगड़ में 14 जनवरी को प्रतीकात्मक रूप से कुली बेगार के कागज नदी में बहाए जाते हैं। फोटो - त्रिलोचन भट्ट

मुलुक कुमाऊं का सुणी लिया यारो

झन दिया, झन दिया कुली बेगार

20वीं शताब्दी के दूसरे दशक में इस जनगीत ने सम्पूर्ण कुमाऊं कमिश्नरी (जिसमें ब्रिटिश गढ़वाल भी शामिल था) के लोगों में चेतना का ऐसा मंत्र फूंका, जिसकी परिणति 14 जनवरी, 1921 को, यानी आज से ठीक 99 वर्ष पहले, उस ऐतिहासिक घटना के रूप में हुई, जिसने इस क्षेत्र को कुली बेगार प्रथा के कलंक से हमेशा के लिए मुक्त कर दिया। इस ऐतिहासिक घटना का साक्षी बना, बागेश्वर में गोमती और सरयू नदियों का संगम स्थल, जिसे स्थानीय भाषा में बगड़ कहा जाता है। बगड़ में आज भी मकर संक्रांति के मौके पर विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक संगठनों की ओर से अपने-अपने पांडाल लगाकर जनता की समस्याओं को उजागर करने का प्रयास किया जाता है।

यूं तो उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में कुली बेगार प्रथा कत्यूरी, परमार, चंद और गोरखा शासन के दौरान भी मौजूद थी, लेकिन ब्रिटिश शासन में इस प्रथा का जो वीभत्स रूप सामने आया, उसने न सिर्फ यहां के जनमानस को बुरी तरह से झकझोर कर रख दिया, बल्कि आक्रोश की एक ऐसी चिनगारी भी सुलगाई जिसने ब्रिटिश फौज की गोलियों की परवाह किये बिना कुली-बेगार से संबंधित कागजात 14 जनवरी, 1921 को मकर संक्रांति के दिन सरयू और गोमदी नदी में प्रवाहित कर दिये।

कुली बेगार प्रथा के तहत स्थानीय लोगों से बिना पारिश्रमिक दिये अंग्रेज अफसरों और कर्मचारियों का सामान ढुलवाने और दूसरे सेवा सुश्रुषा के कार्य करवाये जाते थे। ब्रिटिश शासन में इस प्रथा की आड़ में जोर-जबरदस्ती बढ़ी तो छिटपुट आंदोलन भी शुरू हुए। इस प्रथा के खिलाफ पहला आंदोलन अल्मोड़ा के पास खत्याड़ गांव में हुआ। ग्रामीणों ने कुली बेगार करने से इनकार कर दिया। सरकार ने जुर्माना लगाया, लेकिन गांव वालों ने जुर्माना नहीं भरा। आखिरकार सरकार ने कुर्की कर जुर्माना वसूला।

वर्ष 1920 तक कुली बेगार प्रथा अपने वीभत्स रूप में पहुंच चुकी थी। कुमाऊं क्षेत्र में बद्रीदत्त पांडेय और गढ़वाल क्षेत्र में अनुसूया प्रसाद बहुगुणा ने इस प्रथा के खिलाफ लोगों को लामबंद करना शुरू कर दिया। इसी वर्ष बद्रीदत्त पांडेय, गोविन्द बल्लभ पंत, हर गोविन्द पंत, विक्टर मोहन जोशी आदि नेता कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में हिस्सा लेने गये और गांधीजी से कुली बेगार प्रथा के खिलाफ आंदोलन चलाने के संबंध में बात की। हालांकि गांधीजी ने खुद आने में असमर्थता जताई, लेकिन लोगों से कुली-बेगार न देने की अपील अवश्य कर दी।

गांधी जी की अनुमति मिलने से उत्साहित प्रतिनिधि मंडल वापस लौटा और निर्णायक आंदोलन करने का ऐलान कर दिया गया। दिन चुना गया मकर संक्रांति और स्थान बागेश्वर का बगड़, जहां इस दिन हजारों की संख्या में लोग संगम पर स्नान के लिए जुटते थे। बद्रीदत्त पांडेय के नेतृत्व में 50 स्वयं सेवकों का दल अल्मोड़ा से बागेश्वर पहुंचा। तब तक अन्य क्षेत्रों से भी हजारों लोग वहां जुट चुके थे। पूरे क्षेत्र के प्रधानों को सूचना भेज दी गई थी कि वे कुली बेगार के रजिस्टर लेकर पहुंचे। 14 जनवरी को बागेश्वर के बागनाथ मंदिर से प्रचंड जुलूस निकाला। सबसे आगे एक बैनर था, जिस पर लिखा था ‘कुली बेगार बंद करो’। जुलूस बगड़ में पहुंचने से पहले ही डिप्टी कमिश्नर डाईबिल ने धारा 144 लागू कर दी। पर वहां कौन परवाह कर रहा था। डाईबिल ने बद्रीदत्त पांडेय और अन्य नेताओं को बुलाकर उन्हें गिरफ्तार करने की चेतावनी दी, पर वे नहीं माने। गोली चलाने की भी धमकी दी गई, पर कोई असर नहीं हुआ।

इस घटना के संदर्भ में शंभू प्रसाद शाह अपनी पुस्तक ‘गोविन्द बल्लभ पंत, एक जीवनी’ में लिखते हैं कि डिप्टी कमिश्नर डाईबिल दरअसल नेताओं को गिरफ्तार कर गोली चलाना चाहता था, लेकिन उस समय उसके पास कुल 21 अफसर, 25 सिपाही और मात्र 700 गोलियां थी, जबकि वहां मौजूद लोगों की संख्या 15 हजार से ज्यादा थी। नेताओं की गिरफ्तारी अथवा गोली चलाने की स्थिति में भीड़ के हाथों एक भी अंग्रेज अफसर और सिपाही के जीवित बच पाने की संभावना नहीं थी, लिहाजा उसने अपना इरादा छोड़ दिया।

इसके बाद जो हुआ, वह न सिर्फ ऐतिहासिक था, बल्कि इसने इस पर्वतीय क्षेत्र में जनांदोलनों की नींव को मजबूत करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बद्रीदत्त पांडेय ने जनसमूह को शपथ दिलाई- ‘आज 14 जनवरी, 1921 को मकर संक्रांति के शुभ अवसर पर हम शपथ लेते हैं कि कुली-बेगार नहीं देंगे। 15 हजार लोगों की भीड़ ने ऊंचे स्वर में शपथ दोहराई। फिर शुरू हुआ उन रजिस्टरों को संगम में प्रवाहित करने का कार्यक्रम, जो हर गांव के मुखिया को बनाना होता था। इस रजिस्टर से सभी ग्रामीणों के नाम होते थे और उन्हें बारी-बारी अंग्रेज अफसरों और कर्मचारियों की सेवा में भेज दिया जाता था। आज भी हर वर्ष 14 जनवरी को इस ऐतिहासिक बगड़ में सरकार की जन विरोधी नीतियों से संबंधित कागजातों को प्रतीकात्मक रूप से गोमती-सरयू के हवाले किया जाता है।