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पंचायती राज दिवस: कोरोना महामारी और हमारी पंचायतें

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पंचायत सदस्यों से बात करते हुए कहा कि हमें यह सीखने की जरूरत है कि गांव, शहरों की अपेक्षा कोविड-19 महामारी से से बेहतर तरीके से निपट रहे हैं

By Richard Mahapatra

On: Friday 24 April 2020
 
पंचायती राज दिवस पर ग्राम सरपंचों से बात करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। फोटो: पीआईबी
पंचायती राज दिवस पर ग्राम सरपंचों से बात करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। फोटो: पीआईबी पंचायती राज दिवस पर ग्राम सरपंचों से बात करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। फोटो: पीआईबी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पंचायत के चुने हुए प्रतिनिधियों को पंचायती राज दिवस पर संबोधित किया। यह संबोधन सालाना संबोधन की तरह सामान्य नहीं है। मोदी उन्हें तब संबोधित कर रहे हैं जब भारत की स्थानीय सरकार कोविड-19 महामारी से लड़ाई के बीच में है, और यह महामारी विध्वंसक स्तर तक पहुंच गई है।

जहां देश में लॉकडाउन के 40 दिन होने वाले हैं, हमारे पास उत्सव मनाने जैसा कुछ भी नहीं है, क्योंकि कोविड-19 के मामले तेजी से बढ़ चुके हैं। लेकिन अगर कोई उम्मीद की किरण देखना चाहे तो यह लगभग हर गांव में नजर आती है और चुने हुए पंचायत के सदस्यों में भी। ऐसे वक्त में , पंचायत के सदस्यों से सबको बात करने की जरूरत है। पीएम मोदी ने भी स्थानीय सरकारों की महामारी से लड़ने में सक्रिय दृष्टिकोण की सराहना करते हुए ऐसा ही किया।

गांव वापस आए प्रवासी मजदूरों को क्वारेंटाइन में रखने की बात हो या भूखे लोगों की पहचान किस तरह हो और खाने की सहायता पहुंचाने का काम हो, एक मुख्यमंत्री को अपने विधानसभा के चुने हुए प्रतिनिधियों से अधिक इन चुने हुए प्रतिनिधियों की आवश्कता होती है। यही वजह है कि केरल और ओडिशा जैसे राज्य इस विपदा पर अपनी दिखती हुई जीत का जश्न मना रहे हैं। दोनों राज्यों ने पंचायतों पर ध्यान केंद्रित किया और अपनी महामारी से लड़ने की नीति बनाई। दूसरे राज्य भी अब यही रास्ता अपना रहे हैं। कम से कम 16 राज्यों ने कोविड-19 आपदा की नीति को पंचायतों को केंद्र में रखकर तैयार किया है और लागू कर रहे हैं।

स्थानीय सरकारों की वजह से एक भारतीय के पास प्रति व्यक्ति अस्पताल का बिस्तर, डॉक्टर या सरकारी कल्याणकारी अधिकारी से अधिक चुने हुए सदस्य हैं। स्थानीय सरकार या पंचायती राज में 30 लाख से अधिक चुने हुए प्रतिनिधियों के साथ यह विश्व का सबसे बड़ा सीधा लोकतंत्र है। ये प्रतिनिधि कोविड-19 की लड़ाई में सबसे आगे रहकर लड़ रहे हैं। 

ये प्रतिनिधि लोगों के इलाज के लिए सक्रिय होकर इंतजाम कर रहे हैं, सामुदायिक रसोई तक खाद्यान्नों की आपूर्ति का इंतजाम कर रहे हैं। संक्रमण के लिए जरूरी साफ-सफाई जिसमें समाजिक दूरी भी शामिल है, को गांव के स्तर पर पालन करना भी सुनिश्चित कर रहे हैं। वे नीति निर्धारक और समाज के बीच एक पुल की तरह काम कर रहे हैं और उन निर्णयों को जमीनी स्तर तक पहुंचा रहे हैं।

केरल और ओडिशा के सरकारी अधिकारियों ने ध्यान दिलाया कि ऐसा कभी नहीं हुआ, जब अधिकारी पंचायत के सदस्यों से बात न कर रहे हैं, और सिर्फ बातचीत ही नहीं, बल्कि यह बातचीत कोविड-19 संक्रमण को लेकर आपातकालीन कदम उठाने को लेकर केंद्रित रही। उन लोगों को खोजना जो दूसरे राज्य या देश से कोविड-19 के संक्रमण के साथ लौटे हैं, उनके संपर्क जुटाने जैसे कामों के लिए चुने हुए प्रतिनिधि काफी मददगार साबित हुए।

इस वक्त, केंद्र सरकार से शुरू होकर जिला प्रशासन तक, जो भी आधिकारिक आदेश जारी होते हैं, सीधे पंचायतों के प्रमुखों तक पहुंचता है, जो आपदा नियंत्रण को गांव के स्तर तक देख रहे हैं। चुने हुए सदस्यों के अलावा पंचायत स्थानीय विकास में लगे कामकाजी शक्ति जैसे आशा कार्यकर्ता और महिला स्व-सहायता को भी नियंत्रित करता है। एक करोड़ से अधिक ऐसे कामकाजी लोग जिसमें पंचायती राज के सदस्य भी शामिल हैं, महामारी से संबंधित राहत कार्य जैसे हजारों लोगों के लिए खाना पकाना जसे कामों में सहयोग कर रहे हैं।

15 अप्रैल को केंद्र सरकारी ने पंचायतों को 14वीं वित्त कमिशन द्वारा प्रदान किए गए राशि का कोविड-19 से संबंधिक कार्यों में खर्च करने की छूट दिया। इससे ऐसे कामों के लिए विशेष छूट मिलने लगी। संवैधानिक तौर पर साफ-सफाई का काम स्थानीय सरकार का हो और कोविड-19 से संबंधित कामों को साफ-सफाई के तहत किया जाने लगा।

इसके अलावा, ओडिशा ने पंचायत प्रमुखों को मजिस्ट्रेट की शक्तियां देते हुए गांव स्तर पर क्वॉरेंटाइन करने की शक्ति दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पंचायत सदस्यों से 24 अप्रैल को संवाद करते हुए पंचायती राज दिवस मनाया। उन्होंने राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपदा के प्रबंधन में उनके योगदान की सराहना की।

लेकिन कई संस्थाओं के बावजूद अचानक पंचायतों की मांग क्यों बढ़ गई? यह तब हो रहा है जब हम अक्सर इस तीसरे स्तर की सरकारों को एक और भ्रष्ट सरकारी विभाग के रूप में नजरअंदाज करते हैं। भारतीय संविधान में उन्हें एक चुनी हुई सरकार के रूप में केंद्र और राज्य सरकारी की तरह स्पष्ट भूमिका प्रदान करने को अब 28 साल हो गए। तब से देश ने स्थानीय स्तर पर विकास की जटिल चुनौतियों और उसके प्रबंधन का एक विशाल अनुभव का संग्रह कर लिया है।

यहां तक कि एक देश के तौर पर हमने पंच-वर्षीय योजना की तिलांजलि दे दी है, लेकिन तब भी सभी पंचायत को ऐसे पांच वर्षीय योजनाएं साफ-सफाई, जल सुरक्षा, शिक्षा, मनरेगा के तहत विकास और संपूर्ण गांव के विकास की योजना बनानी होती है। पंचायत 80 फीसदी के करीब केंद्र द्वारा संचालित ग्रामीण विकास की योजनाओं के क्रियान्वयन का काम करता हो जो कि इस अनोखे चुने हुए प्रतिनिधियों का समूह बनाता है, जो कार्यपालक का काम भी करता हो। वित्त कमिशन के प्रावधान में पंचायत के पास करीब 90,000 रुपए सालान राज्यों की तरह एक समर्पित निधि है। इन पैसों को विभिन्न ग्रामीण योजनाओं में खर्च किया जाता है। यहां भी हर पांच साल में चुनाव होते हैं और आमतौर पर विधानसभा और सांसद की अपेक्षा इनके दोबारा चुने जाने की संभावना भी कम होती है।

जब भी 21वीं सदी की पहली महामारी का इतिहास लिखा जाएगा, जमीनी स्तर पर चल रही पंचायती राज व्यवस्था को एक विजेता के तौर पर पेश किया जाएगा। लेकिन, यह वक्त पंचायती राज को पूरी तरह उनके संवैधानिक अधिकार देने का है। हमने संविधान द्वारा अनिवार्य किए गए कार्यों को पंचायतों तक हस्तांतरित कर दिया है, लेकिन हम एक निर्वाचित सरकार की तरह प्रभावी कार्य करने के लिए सही धन और कार्यक्रमों को पूरी तरह से स्थानांतरित नहीं कर सके हैं। यह समय है कि हम उन्हें पूरी तरह से सरकार बनाएं।