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बेरोजगारी में अव्वल राज्य झारखंड में अब कितने सफल होंगे रोजगार के उपाय

झारखंड सरकार ने रोजगार को बढ़ावा देने के लिए तीन नई योजनाओं की शुरुआत की है, लेकिन...

On: Friday 08 May 2020
 
देवघर में सूरत से आने वाले श्रमिकों को प्रशासन की ओर से फूड पैकेट दिए गए। Photo: Twitter/@DCDeoghar
देवघर में सूरत से आने वाले श्रमिकों को प्रशासन की ओर से फूड पैकेट दिए गए। Photo: Twitter/@DCDeoghar देवघर में सूरत से आने वाले श्रमिकों को प्रशासन की ओर से फूड पैकेट दिए गए। Photo: Twitter/@DCDeoghar

आनंद दत्त

आठ लाख से अधिक बाहर गए मजदूर वापस आ रहे हैं। बीते पांच दिनों में 20 हजार से अधिक मजदूर और छात्र पहुंच चुके हैं. विशेषज्ञ लगातार चिंता जता रहे हैं कि जहां पहले से ही बेरोजगारी चरम पर है, वहां और लोगों के लिए रोजगार कहां से पैदा किए जाएंगे। उनके जीवनयापन के लिए उपायों पर विचार शुरू हो चुके हैं। इसको देखते हुए  रोजगार के लिए राज्य सरकार ने तीन बड़ी घोषणाएं की है।

इसमें बिरसा हरित ग्राम योजना, नीलांबर-पीतांबर जल समृद्धि योजना और वीर शहीद पोटो हो खेल विकास योजना है। सीएम हेमंत सोरेन के मुताबिक इन तीनों योजनाओं को मिलाकर लगभग 25 करोड़ मानव दिवस का सृजन होने की संभावना है। 

हाल ही में सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) की ओर से किए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक अप्रैल 2020 में बेरोजगारी दर 47.1% हो गई है। यह राष्ट्रीय औसत 23.5 प्रतिशत से कहीं अधिक है। इस लिस्ट में झारखंड से आगे बिहार में 47.6 प्रतिशत वहीं छत्तीसगढ़ में मात्र 3.4 प्रतिशत बेरोजगारी दर बढ़ी है. वहीं झारखंड सरकार के आंकड़ों को देखें तो राज्य मई पांच तारीख तक कुल 7,09,103 लाख लोग निबंधित तौर पर बेरोजगार हैं। ये हाल तब होने जा रहा है जब बाहर गए लोगों में आधे से भी कम लोगों के लौटने की संभावना है।

गढ़वा उन इलाकों में है जहां से सबसे अधिक लोग पलायन करते हैं। स्थानीय पत्रकार ओम प्रकाश पाठक बताते हैं, ‘’हाल ही में उन्होंने एक रैंडम सर्वे किया था। उसके मुताबिक अधिकतम 25 प्रतिशत लोग ही गांव लौट रहे हैं। लेकिन उसमें भी आधे से अधिक लोग दुबारा लौट जाएंगे। क्योंकि यहां गढ़वा शहर की आबादी 50 हजार है, वहां रोजगार क्या मिल सकता है। मनरेगा में 198 रुपए मिलते हैं। अगर किसी को 100 दिन का भी रोजगार मिलता है तो उससे पास महज 19,800 रुपए ही आएंगे। महानगर लौटने के अलावा इन मजदूरों के पास और कोई ऊपाय नहीं है।’’ 

तेलंगाना से झारखंड लौटे मजदूर अमरेश उरांव ने बताया कि पहले तो गढ़वा में ही रोजगार की तलाश करेंगे। नहीं मिला तो लॉकडाउन खत्म होने के बाद फिर वहीं चले जाएंगे। क्योंकि इतना कमा लेते हैं कि आनेवाले समय के लिए थोड़ा बचत भी हो जाता है।

हाल ही में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने पीएम मोदी से बातचीत में कहा था कि झारखंड में मनरेगा के तहत मिलने वाले 198 रुपए को बढ़ाया जाना चाहिए। झारखंड के मजदूर आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, गोवा, दिल्ली, यूपी जैसे राज्यों में काम करने जाते हैं। मनरेगा मजदूरी को ही देख लें तो आंध्रप्रदेश में 237, तेलंगाना में 237, महाराष्ट्र में 238, गोवा में 280, यूपी में 201 रुपए मिलते हैं।

जो मनरेगा में काम नहीं करेंगे उनका क्या 

सवाल ये भी है कि क्या सभी लोग मनरेगा में ही काम करेंगे। घरेलू कामगार, दुकानों में काम करनेवाले, ऑटो सेक्टर, मॉल आदि में काम करनेवालों का क्या। राज्य सरकार ने लौट रहे मजदूरों को कौशल विकास प्रशिक्षण के तहत ट्रेनिंग देने का भी फैसला लिया है। इसके तहत 18 से 35 साल के लोगों को 72 से तीन महीने तक की ट्रेनिंग दी जाएगी।

वहीं, इसका दूसरा पहलू देखिये। झारखंड में 2019-20 वित्तीय वर्ष के अक्टूबर महीने तक 1,82,087 दाखिला ले चुके हैं लेकिन प्रशिक्षण 1,75,146 को ही मिल सका है। प्रशिक्षित हुए ट्रेनी में से 1,28,926 को ही प्रमाणित किया गया और इसमें से नियुक्त होने वाले लोगों की संख्या महज 18,567 ही है। 

रांची के सेंट जेवियर इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल सर्विसेज के ह्यूमन रिसोर्स मैनेजमेंट विभाग के प्रमुख रमाकांत अग्रवाल कहते हैं आपदा के समय अगर कुछ भी उपाय हो रहे हैं, उसका स्वागत होना चाहिए. लेकिन ये बात भी सही है कि मनरेगा के तहत रोजगार देकर बहुत बड़ी आबादी को पलायन से रोकना संभव नहीं है। साथ ही बहुत बड़ा वर्ग ऐसा है जो मनरेगा के तहत काम नहीं कर सकता। ऐसे लोगों के लिए फिलहाल कोई उपाय करती सरकार नहीं दिख रही है। लेकिन इन सब तैयारी के लिए सरकार को थोड़ा वक्त मिलना चाहिए।

पहले का भुगतान बाकी, लेकिन नई योजनाएं तैयार 

अब आते हैं कृषि से रोजगार पैदा करने की तरफ। धान अभी तक बिका नहीं है। गेहूं राज्य सरकार खरीदती नहीं है. बारिश, ओला और लॉकडाउन की वजह से खेतों में लगे फसल बड़ी मात्रा में बर्बाद हो चुके हैं। ऐसे में बिरसा कृषि विश्वविद्यालय ने राज्य सरकार को सुझाव दिए हैं कि रबी फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया जाए। इसके अलावा बिना ब्याज के एक साल के लिए कृषि ऋण दिया जाए। लॉकडाउन में किसानों को हुए आर्थिक नुकसान का आकलन कर मई के अंत तक उन्हें भुगतान किया जाए।  

ये उपाय नाकाफी तब लगते हैं जब पहले से ही ऋषि ऋण माफी के तहत तय हुए 2000 करोड़ रुपए का बंटवारा किसानों के बीच नहीं हुआ है। जबकि राज्य के किसानों के ऊपर 7 हजार करोड़ का ऋण है। राज्य के 24 में से 10 जिलों को पिछले साल अक्टूबर में सूखाग्रस्त घोषित किया गया था। लेकिन इसके तहत मिलनेवाले पैसे का भुगतान अभी तक नहीं हुआ है।