Sign up for our weekly newsletter

कोरोना महामारी और शराब पर आधारित अर्थव्यवस्था

सड़कों पर दम तोड़ते श्रमिकों का इलाज पानी और भोजन है - यह समझने के लिए शराब के नशे मे डूबे समाज और सरकारों को पता नहीं और कितने बरस लगेंगे

By Ramesh Sharma

On: Friday 15 May 2020
 
राजधानी दिल्ली से सटे फरीदाबाद में लॉकडाउन के दौरान खुले के शराब के ठेके पर जमा लोग। फोटो: राजेंद्र पांचाल
राजधानी दिल्ली से सटे फरीदाबाद में लॉकडाउन के दौरान खुले के शराब के ठेके पर जमा लोग। फोटो: राजेंद्र पांचाल राजधानी दिल्ली से सटे फरीदाबाद में लॉकडाउन के दौरान खुले के शराब के ठेके पर जमा लोग। फोटो: राजेंद्र पांचाल

कुछ ही महीने पुरानी ही बात है, जब महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के अवसर पर उनके संदेशों को आत्मसात करने के लिए पूरा देश और देश के राजनेता कई संकल्प ले रहे थे। कई  राज्यों ने तो संकल्पपूर्वक अपने घोषणाओं में यहां तक कह दिया कि महात्मा गांधी के विचारों का अनुपालन करते हुये वे - 2 अक्टूबर 2019 तक 'शराबबंदी' लागू करेंगे। शपथपत्रों और भाषणों में भी यह जोरशोर से दोहराया गया। दरससल छत्तीसगढ़, बिहार और मध्यप्रदेश के एक बड़े और राजनैतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र में 'शराबबंदी' आंदोलनों का नया वर्तमान रहा है। इसलिये अमूमन सभी चुनावों में राजनैतिक दल अचानक महिला अधिकारों को लेकर सक्रिय हो उठते हैं और जोश ख़रोश में घोषणायें तक कर डालते हैं कि सत्ता मिलते ही शराबबंदी उनका सर्वोच्च एजेंडा होगा। 

मौजूदा महामारी के दौर में देश के आर्थिक स्वास्थ्य पर दूरगामी प्रभाव की अनिश्चितता से समूचा आर्थिक-राजनैतिक तंत्र आशंकित है। तलाश उन हरेक रास्तों की हो रही है जो 'त्वरित राजस्व' के माध्यम से अर्थतंत्र को खोई हुई ताकत दे सके। और दुर्भाग्य से समूचे तंत्र ने मान लिया कि शराब का नशा, अर्थतंत्र के परमार्थ का नया मार्ग है।

छत्तीसगढ़ के बलौदा बाजार की फूलो देवी 20 अन्य मजदूरों के साथ लॉक डाउन की वजह से विगत 45 दिन से देहरादून में फंसी हुई हैं। थोड़े रोष के साथ सब महिलाएं कहती हैं कि 'तथाकथित जनहित' में शराब की दुकानें शुरू करने वाले राज्यों को क्या दूसरे प्रांतों में फंसे हुये हजारों  मजदूरों की गुहार सुनाई भी देती हैं? उन फंसे हुये मजदूरों को उनके गांव वापस लाना क्या जनहित नहीं है? सरकारें क्यों नहीं अपने ही राज्यों में मजदूरों को काम देकर जनहित कमाना चाहती? आखिर शराबबंदी को तोड़ने वाली सरकार हजारों मजदूरों के किस्मत की तालाबंदी को क्यों नहीं समाप्त करतीं?

विगत डेढ़ महीनों के तालाबंदी में हजारों किलोमीटर पैदल अपने गावों को लौटते जिन भूखे प्यासे लोगों की जानें चली गई, काश उन्हें समाज और सरकार कम से कम पीने का पानी तो मुहैया करवा पाती। सड़कों पर सार्वजनिक रूप से दम तोड़ते श्रमिकों का इलाज पानी और भोजन है - यह समझने के लिए शराब के नशे मे डूबे समाज और सरकारों को पता नहीं और कितने बरस लगेंगे।   

महात्मा गांधी कहते थे कि - किसी भी राज्य अथवा निकाय के लिए शराब का व्यवसाय, अनैतिकता का साधन है। इसीलिये  देश के लिए समर्पित राज्यतंत्र को शराबबंदी के लिए स्वयं आगे आना चाहिए। महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता मानने वाले देश के नागरिकों और निर्माताओं के लिए यह अवसर था, जब 'जनहित' को 'व्यावसायिक हितों' से ऊपर रखा जाना था, लेकिन व्यावसायिक हितों को 'जनहित' से ऊपर रखते हुए राज्यों ने एक ऐसा कारनामा किया है, जहां शराब व्यवसाय को महामारी के आर्थिक उपचार के रूप में जाने-अनजाने स्थापित कर दिया गया सवाल यह होना चाहिए था कि देश के लाखों-करोड़ों भूखे लोगों तक भोजन कैसे पहुंचे, और समाधान यह हो गया कि देश के शराबखोरों को नशे में कैसे बरगलाये रखा जा सके। 

महामारी के मध्य बेमौत दम तोड़ते अर्थतंत्र के लिये 'आबकारी' व्यवस्था का व्यवस्थित और सजीव हो जाना किसके लिए कितना फ़लदायी होगा यह समझने के लिये जानना होगा कि आबकारी से प्राप्त राजस्व का उपयोग आखिर कब, कहां और कैसे होता है। राज्य सरकारों के वित्तीय रिपोर्ट बताते हैं कि औसतन 20 फीसदी राजस्व, शराब की  खरीद-बिक्री से आता है, लेकिन यहां सवाल आमदनी का नहीं, बल्कि अर्जित राजस्व के सार्थक  उपयोग का होना चाहिए। क्या राज्यतंत्र को मिलने वाले राजस्व का उपयोग, ग्रामीण विकास अथवा आदिवासी और दलितों के उत्थान अथवा किसानों की भलाई अथवा महिलाओं को और अधिक सशक्त बनाने के लिये किया जाता है? इसका औसत उत्तर है नहीं। 

शराब से प्राप्त राजस्व का एक बड़ा हिस्सा शासन के वैतनिक कर्मचारियों के लिए सुरक्षित माना जाता है। इसीलिए शराब भले ही लोगों के स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है, लेकिन राजसत्ता ने यह स्वीकार कर लिया है कि राजतंत्र के सेहत के लिए यह स्वास्थ्यवर्धक है। वर्तमान में कहना कठिन है कि यह सत्य, राज्यतंत्र के लिये कितना प्रासंगिक है, लेकिन यह मान लेने के लिए पर्याप्त कारण हैं कि महात्मा गांधी के सन्देश राज्यतंत्र के लिए अब उतने प्रासंगिक नहीं रहे।    

एक अनुमान के मुताबिक विगत 45 दिनों के लॉकडाउन में शराब से होने वाले लगभग 30 हजार करोड़ रुपए का तथाकथित आर्थिक नुकसान हुआ।  लेकिन इस सत्य का कोई अनुमान नहीं है कि जो 14 करोड़ मज़दूरों की दिहाड़ी  छिन गई, आखिर उनकी मुट्ठीभर कमाई कितने करोड़ लोगों का पेट भरती? क्या उनके दाना-पानी की प्राथमिकताएं, शराब के तथाकथित राजस्व के नशे से कहीं अधिक हैं? और फिर क्या शराब बेचकर राजस्व कमा लेने भर से मजदूरों की भूख प्यास का इलाज हो जाएगा ?

अर्थतंत्र की नई परिभाषा में मजदूरों द्वारा खून पसीना बहाकर की गई मुट्ठीभर कमाई को 'राजस्व' नहीं माना गया है। उनकी भलाई के नाम पर की गई घोषणाएं किसी सरकारी नियोजन का हिस्सा नहीं है। राज्य के विकास में उनके सहयोग के तर्क, पलायन की वास्तविकता से कब के खारिज हो चुके हैं। इसीलिये हजारों फूलो बाईयों की आवाजें विगत सात दशकों से अनसुनी हैं और शायद अनसुनी ही रह जाएंगी।

इस देश में शराब की आपूर्ति को पानी के अधिकार से अधिक महत्वपूर्ण मान लिया गया हो, वहां शराबबंदी महज एक (राज) नैतिक नारा ही रह गया है। एक ऐसा नारा, जिसे लगाते हुए हम इतने अधिक नाउम्मीद  हो चुके हैं कि उसके टूट जाने की वास्तविकता अब हमें शोकग्रस्त नहीं करतीं। ग्लोबल हंगर इंडेक्स के मुताबिक भारत में हर रोज लगभग 20 करोड़ लोग भूखे सोते हैं। जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट (2018) कहती है कि भारत में हर बरस लगभग 2.6 लाख शराब की वज़ह से बेमौत मारे जाते हैं। क्या ये आंकड़े देश के भाग्य विधाताओं की आंखें खोल देने के लिए पर्याप्त नहीं हैं ?

यह मान लेने में हम 70 बरस गंवा चुके हैं कि भूख की कीमत, नशे की कमाई से कहीं अधिक बड़ी त्रासदी  है। कम से कम अब तो हममें - शराब से होने वाली मौतों का, भूख प्यास से होने वाली अकालमृत्यु से  तुलना करने का साहस होना ही चाहिए। और फिर यदि  निष्कर्ष तक पहुंचने का माद्दा  हो तो यह भी गणना करें कि दोनों मे से कौन सी मौत अधिक कीमती रहीं। यदि इन सवालों का जवाब किसी अर्थतंत्र के पास है तो हमें इसका शोक मनाना होगा, किन्तु यदि इन प्रश्नों का उत्तर किसी राज्यतंत्र के पास नहीं है तो यह स्वीकार कर लेना होगा कि 'राजस्व' मौतों से अधिक क़ीमती हैं।

महात्मा गाँधी के अनुयायियों ने उनके 150 बरस के अवसर पर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि देने का नेक अवसर गंवा दिया। ये और बात है कि विगत सत्तर बरस ऐसे ही अवसरों का अंत हो चुका शेष इतिहास है।

लेखक एकता परिषद के राष्ट्रीय समन्वयक हैं