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भारत क्यों है गरीब-8: बिहार के इस जिले की प्रति व्यक्ति आय जानकर चौंक जाएंगे आप

बिहार का जिला शिवहर यूं तो छोटा है और लोगों ने लड़ाई लड़ कर इसे अलग जिला बनवाया, लेकिन आमदनी के मामले में गांव वालों की हालत देखने लायक है

By Pushya Mitra

On: Tuesday 28 January 2020
 
यह है बिहार के जिला शिवहर के तरियानी छपरा गांव में बंद पड़ा सरकारी अस्पताल। फोटो: पुष्यमित्र
यह है बिहार के जिला शिवहर के तरियानी छपरा गांव में बंद पड़ा सरकारी अस्पताल। फोटो: पुष्यमित्र यह है बिहार के जिला शिवहर के तरियानी छपरा गांव में बंद पड़ा सरकारी अस्पताल। फोटो: पुष्यमित्र

शिवहर बिहार का सबसे छोटा और सबसे नया जिला है, मगर प्रति व्यक्ति आय के हिसाब से देखें तो यह बिहार का ही नहीं देश का सबसे पिछड़ा जिला मालूम होता है। 2011-12 के आंकड़ों के हिसाब से इस जिले की प्रति व्यक्ति आय सिर्फ ₹6055 हैं। इसका आशय है कि इस जिले में एक व्यक्ति की एक दिन की औसत आय लगभग 17 रुपए होती है। 

जबकि इस अवधि में बिहार राज्य के लोगों की प्रति व्यक्ति आय ₹24572 थी। ठीक उसी दौर में भारत की प्रति व्यक्ति आय 54,835 रुपये थी।

1994 में यहाँ के कद्दावर नेता रघुनाथ झा ने बड़े शौक से लड़ झगड़ का इसे जिला बनवाया था कि छोटा जिला होने की वजह से इसका विकास तेजी से होगा। मगर आखिर 26 साल बीतने पर भी यह जिला विकास की दौड़ से सबसे पीछे क्यों है?

इस जिले के पिछड़ेपन की हालत यह है कि महज दो साल पहले किसी तरह जिले का पहला डिग्री कॉलेज खोला गया, वह भी एक हाई स्कूल के भवन में महज नाम के लिये संचालित हो रहा है। हाल तक यहां सदर अस्पताल भी नहीं था, फिर एक रेफरल अस्पताल को अपग्रेड करके सदर अस्पताल की मान्यता दे दी। यहां की साक्षरता दर सिर्फ 53.78 फीसदी है।

पूरे जिले में कहीं से भी रेलवे की पटरी नहीं गुजरती, बस स्टैंड भी नहीं है। बिहार की राजधानी पटना के लिये सीधी बस मिलना मुश्किल होता है।

यहां के पिछड़ेपन की वजह बताते हुए सामाजिक कार्यकर्ता नागेंद्र प्रसाद सिंह कहते हैं कि सबसे बड़ी वजह सरकार की उपेक्षा और सरकारी योजनाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार है। वैसे लोग बागमती नदी से हर साल आने वाली बाढ़ को भी इसकी एक वजह बताते हैं, मगर बाढ़ से शिवहर के लोगों को नुकसान से अधिक लाभ ही होता है। बाढ़ के बाद जमीन की उर्वरता बढ़ जाती है।

वे कहते हैं, इंदिरा गांधी के जमाने से इस इलाके में गरीबी उन्मूलन की योजनाएं चलती रहीं। पहले जो बीस सूत्री कार्यक्रम था उसमें भी कुछ नहीं हुआ और फिर पिछड़ा क्षेत्र विकास फंड जो 2004 से आया वह भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया। उन पैसों से गरीब के घर की हालत नहीं सुधरी।

शिवहर के ही रहने वाले लेखक, घुमक्कड़ और सामाजिक कार्यकर्ता राइडर राकेश कहते हैं, यहां की गरीबी की सबसे बड़ी वजह है असमानता। यहां जमीन का वितरण आसमान है इसीलिए बागमती के किनारे बसी यह उपजाऊ मिट्टी अपने सभी निवासियों का पेट भर नहीं पाती। एक तो वैसे ही बिहार में 65 फीसदी आबादी भूमिहीनों की है, शिवहर में यह आबादी बढ़ जाती है। जाहिर सी बात है कि भूमिहीनता ने लोगों को अकुशल मजदूर में बदल दिया। फिर उसकी वजह से यहां नक्सलवाद ने जड़ जमा लिया, जिसकी वजह से और जो भी काम होना था हुआ नहीं।

वे कहते हैं, यहाँ ढंग के आईटीआई कॉलेज तक नहीं हैं, जहां भूमिहीन गरीब का बच्चा कोई हुनर सीख सके। ले देकर पलायन ही विकल्प बचता है। सरकार भी स्थिति सुधारने की बहुत कोशिश नहीं करती। पिछले दिनों इस छोटे से महज एक अनुमंडल और 5 प्रखंड वाले जिले के 190 से अधिक स्कूल बंद कर दिए गए।

हालांकि दिलचस्प जानकारी यह है कि इस जिले को सबसे प्रॉमिसिंग जिले का अवार्ड भी मिल चुका है। वह इसलिये कि 2004-5 के मुकाबले 2011-12 में जिले की प्रति व्यक्ति आय सबसे तेजी से बढ़ी। मगर आंकड़े में देखें तो खोखला पन जाहिर हो जाता है। यह वृद्धि 4361 रुपये से बढ़ कर 6055 रुपये हुई है। वहीं 2004-5 में यहां का प्रति व्यक्ति बैंक डिपॉजिट 1002 रुपये था, जो बढ़ कर 2011-12 में 4290 रुपये हो गया।

इन मसलों पर बात करने के लिये जिले के नवनियुक्त जिलाधिकारी तो नहीं मिल पाए, मगर पिछले पौने दो साल से जिला की पुलिस व्यवस्था को संभाल रहे एसपी संतोष कुमार कहते हैं कि यह सच है कि जिला कई वजहों से पिछड़ा रह गया था, मगर अब चीजें तेजी से बदल रही हैं।

हमने नक्सलवाद को लगभग खत्म कर दिया। पहले इसकी वजह से निर्माण कार्य अधूरा रह जाता था और प्रशासन के लोग भी हर जगह नहीं पहुंच पाते थे। पहले कई जगह जाने के लिये नदी को नाव से पार करना पड़ता था, अब हर जगह पुल बन गए हैं। कॉलेज, पॉलिटेक्निक, नर्सिंग कॉलेज आदि खुल रहे हैं। काम बड़ा है, लेकिन सरकार कोशिश कर रही है।