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लॉकडाउन में फंसे पुरुष तो महिलाओं ने संभाली कमान

छत्तीसगढ़ की ग्रामीण व वनोपज की अर्थव्यवस्था लगभग 2100 करोड़ की है, जिसे इन दिनों महिलाएं बखूबी संभाल रही हैं

By Manish Chandra Mishra

On: Tuesday 21 April 2020
 
छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले में संग्रहण से लेकर खरीदी तक के काम में महिलाओं की भागीदारी। फोटो: मनीष चंद्र मिश्र
छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले में संग्रहण से लेकर खरीदी तक के काम में महिलाओं की भागीदारी। फोटो: मनीष चंद्र मिश्र छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले में संग्रहण से लेकर खरीदी तक के काम में महिलाओं की भागीदारी। फोटो: मनीष चंद्र मिश्र

कांकेर जिले के पखांजूर तहसील स्थित मरोड़ा गांव की रुसी नवगो की सुबह आजकल जल्दी होती है। तड़के पांच बजे जगकर अपनी सहेली बारोबाई नवगो के साथ वह हाथ में टोकनी लिए हुए जंगल की तरफ निकल जाती है। देखते-देखते गांव की कई महिलाएं जंगल की तरफ निकलने लगती है। इसी तरह राजनांदगांव जिले के मानपुर तहसील की हलोरा ग्राम की सीमा मिस्त्री, मिचगांव की सकुन्ती और झारसाय सहित छत्तीसगढ़ के लगभग हर जंगल के गांवों में लोगों का अधिक समय वन में ही बीतता है। इसकी वजह है ताजे टपके महुए के फूलों की खुशबू में नहाया जंगल इस समय महुआ, चार, चरोटा, तेंदू, आवला, हर्रा, बहेड़ा, शहद, धवईफूल, रंगीनी लाख, कुसुमी लाख, बेल गुदा, जामुन बीज, ईमली, आम से भरा हुआ है और यह मौसम वनवासियों के लिए नकदी वनोपज एकत्र करने का है। 

कोविद-19 और इसकी वजह से लगे लॉकडाउन ने शहर की अर्थव्यवस्था लगभग ठप कर दी है, लेकिन ग्रामीण महिलाओं ने गांव की अर्थव्यवस्था को रुकने नहीं दिया है। आमतौर पर वनोपज संग्रहण में महिलाओं की सक्रियता पुरुषों के मुकाबले अधिक होती है। हालांकि, कई गांवों में मजदूरी करने पलायन कर शहर गए पुरुष लॉकडाउन की वजह से वापस भी नहीं आ पाए, जिस वजह से संगहण की पूरी जिम्मेदारी महिलाओं के ऊपर है। कोविद-19 से बचाव के लिए वनोपज संग्रहण करने वाली महिलाएं सरकार के निर्देश के मुताबिक आपस में 3 मीटर की दूरी और मुंह पर कपड़ा बांधकर काम कर रही हैं।

राजनांदगांव जिले के हलोरा गांव की समैतिन बताती हैं, “हम सभी 5 बजे सुबह से उठकर महुआ बीनने जाते हैं और धूप तेज होने तक वापस लौट आते हैं। सूखने के बाद महुआ 30 रुपए किलो बिक रहा है और एक दिन में इकट्ठा महुआ सूखकर 3 से 4 किलो तक बचता है।“ समैतिन इसबार महुए का लड्डू और अचार भी बना रही है। गांव के कुछ लोग इमली भी इकट्ठा कर रहे हैं जिसकी कीमत 54 रुपए प्रति किलो है।

छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा जंगल के उत्पादों से आता है। छत्तीसगढ़ सरकार के आंकड़ों के मुताबिक राज्य के 44 फीसदी हिस्से में जंगल फैला हुआ है और इन जंगलों से एक सीजन में राज्य में लगभग 2100 करोड़ रुपए का लघु वनोपज (लकड़ी के अलावा) का उत्पादन होता है। इसमें से 1350 करोड़ रुपए का सिर्फ तेंदू पत्ता का बाजार है। छत्तीसगढ़ में मुख्यतः 22 प्रकार के वनोपज संकलित होते हैं। इनमें साल बीज, हर्रा, इमली, चिरौंजी गुठली, महुआ बीज, कुसुमी लाख, रंगीनी लाख, काल मेघ, बहेड़ा, नागरमोथा, कुल्लूगोंद, पुवाड़, बेलगुदा, शहद तथा फूल झाड़ू, महुआ फूल, जामुन बीज, कौंच बीज, धवई फूल, करंज बीज, बायबडिंग और आंवला शामिल है। इन्हें व्यापारियों के अलावा सरकार भी खरीदती है, जिसे ऑनलाइन टेंडर के माध्यम से कंपनियों को बेचा जाता है। कई इलाकों में 70 फीसदी से अधिक वनवासियों के आय का बड़ा जरिया वनोपज संग्रहण होता है।

संग्रहण से खरीदी तक महिलाएं आगे

कोविद-19 की वजह से वनोपज संग्रहण के समय ही लॉकडाउन की घोषणा हो गई जिससे ग्रामीणों में वनोपज संग्रहण को लेकर असमंजस की स्थिति बन गई। स्थानीय बाजार बंद होने की वजह से उन्हें इसे बेचने में भी परेशानी आने लगी। हालांकि, सरकार ने इसका उपाय किया और महिलाओं के स्व-सहायता समूहों को खरीदी के काम में लगाया। वन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक पिछले कुछ दिनों में पूरे छत्तीसगढ़ के 3,500 गावों से 5,500 महिला स्वयं सहायता समूहों ने 15 करोड़ रुपए के  50 हजार क्विंटल वनोपज की खरीदी की है। राज्य में 253 करोड़ रूपए से 8,46,920 क्विंटल लघु वनोपजों के संग्रहण का लक्ष्य है।