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दशक पर एक नजर: सौर ऊर्जा, क्या खोया-क्या पाया?

सौर ऊर्जा की क्षमता इतनी है कि वह 2035 तक कोयले और गैस को पछाड़ कर बिजली का सबसे बड़ा स्त्रोत बन सकती है

By DTE Staff

On: Tuesday 31 December 2019
 

Illustration: Ritika Bohra

2010 में भारत ने अपनी बढ़ती ऊर्जा मांग को पूरा करने के लिए सौर ऊर्जा का दोहन करने का निर्णय लिया। दशक के दौरान इस क्षेत्र में असफलताओं से ज्यादा सफलताएं हासिल की गई। दुनिया ने भी सौर ऊर्जा को अपनाने में महत्वपूर्ण प्रगति की। अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने अपने नवीनतम विश्व ऊर्जा आउटलुक में अनुमान लगाया है कि 2050 तक विश्व में सौर ऊर्जा से लगभग 3,142 गीगावॉट बिजली हासिल होगी, जो कि अभी 495 गीगावाट है।

सौर ऊर्जा की क्षमता इतनी है कि वह 2035 तक कोयले और गैस को पछाड़ कर बिजली का सबसे बड़ा स्त्रोत बन सकती है। देखें, हमने इसे कैसे कवर किया था-

न्यू गोल्ड रस

जवाहरलाल नेहरू नेशनल सोलर मिशन को 2022 तक तीन-चरण में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके तहत 22 हजार मेगावाट सौर ऊर्जा पैदा की जाएगी। पहले चरण के तहत 2012-13 तक, ग्रिड से जुड़े प्लांट से 1,000 मेगावाट, रूफटॉप और छोटे प्लांट से 100 मेगावाट और ऑफ-ग्रिड प्लांट 200 मेगावाट सौर ऊर्जा हासिल करनी होगी।

भारत में वर्तमान में 8-12 मेगावाट सौर ऊर्जा ही पैदा की जा रही है। ऐसे में, लक्ष्य को हासिल करने के लिए तेजी से प्रयास करने होंगे, लेकिन प्रौद्योगिकी, लागत और परिचालन संबंधी चुनौतियों से पार पाना आसान नहीं है। सौर मिशन के तहत इस महंगी ऊर्जा को हासिल करने के लिए एक वित्त मॉडल को विकसित करना होगा। सरकार ने नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन की सहायक कंपनी, राष्ट्रीय विद्युत व्यापार निगम को निर्देश दिया है कि वह महंगी सौर ऊर्जा को थर्मल पावर के सस्ते अनलोकेटेड कोटे से जोड़े। इस तरह लगभग 18 रुपए प्रति यूनिट वाली सौर ऊर्जा को 2 रुपए प्रति यूनिट वाली पारंपरिक ऊर्जा के साथ मिलाकर सप्लाई किया जाएगा और यह बिजली 5 रुपए प्रति यूनिट की दर से बिजली वितरण कंपनियों को दी जाएगी 

बहुत से लोगों ने सौर परियोजनाएं स्थापित करने के लिए आवेदन किया है। नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय का कहना है कि उसे दो चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। एक, नई सोला-तापीय परियोजनाओं को पहले से स्थापित फोटोवोल्टिक प्रौद्योगिकी के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए समान मैदान उपलब्ध कराना। हालांकि काफी विचार विमर्श के बाद इसका समाधान निकल गया। दूसरा, कतार में लगी इन परियोजनाओं को वित्तीय संस्थानों से बचाना। मंत्रालय ने तीन चरणों में परियोजनाओं के चयन का प्रस्ताव दिया है। पहले चरण में यह इस योजना के लिए मौजूदा परियोजनाओं के एक पोर्टफोलियो को 'माइग्रेट' करेगा। अगले चरण में यह 2010-11 तक केवल 150 मेगावाट का लक्ष्य रखेगा। मंत्रालय का कहना है कि मौजूदा सौर परियोजनाओं को स्थानांतरित करने से गति तेज होगी। अधिकारियों का कहना है कि माइग्रेट के लिए 700 मेगावाट से अधिक के प्रस्ताव मिले हैं और इस सूची को आठ से 10 परियोजनाओं तक सीमित कर दिया है, जो 100 मेगावाट तक बढ़ जाती है।

सरकार के पास बड़ी संख्या में आवेदन आ चुके हैं, जबकि आवंटन कम करना है। इसलिए अब रिवर्स ऑक्शन पर विचार किया जा रहा है, जिसमें आवेदकों से पूछा जाएगा कि वे कितनी कम से कम दर पर सौर ऊर्जा सप्लाई कर सकते हैं? हालांकि इस बात की आशंका जताई जा रही है कि इस खेल में बड़े खिलाड़ी ही आगे निकल जाएंगे और अव्यवहारिक परियोजनाओं को बढ़ावा मिलेगा।

 

दशक में और…

 

2012 >> 

चार दशक पुराने फोटोवोल्टिक विनिर्माण उद्योग के लिए सौर ऊर्जा अब एक अच्छा विचार नहीं है। इस उच्च क्षमता वाले अक्षय ऊर्जा क्षेत्र को दुनिया भर की तरह भारत में भी झटका लगा है।

2019 >>

भारत में कोल पावर स्टेशन की क्षमता वृद्धि में गिरावट देखी जा रही है। वित्तीय वर्ष 2012 और 2016 के बीच, हर साल 10-20 गीगावाट (GW) नई कोयला-बिजली स्टेशन की क्षमता को ग्रिड में जोड़ा गया। लेकिन, पिछले तीन वर्षों में, यह घटकर 5 गीगावॉट हो गया और आगे घट रहा है।