अंतर्राष्ट्रीय वित्त निगम क्यों नहीं चाहता कि फेडरल बैंक कोयला कंपनियों को कर्ज दे?

अंतरराष्ट्रीय संस्था ने जुलाई 2021 में मांग की थी कि भारत के 7वें सबसे बड़े कॉमर्शियल बैंक को कोयले के वित्तपोषण पर रोक लगा देनी चाहिए

By Soundaram Ramanathan

On: Tuesday 12 October 2021
 

सात अक्टूबर 2021 को जारी एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के 7वें सबसे बड़े कॉमर्शियल बैंक, फेडरल बैंक लिमिटेड ने अंतरराष्ट्रीय वित्त निगम यानी आईएफसी का निर्देश मानकर कोयले के वित्तपोषण पर रोक लगा दी है। इस रिपोर्ट को सेंटर फॉर फाइनेंशियल एकाउंटेबिलिटी इंडिया यानी सीएफए और स्वतंत्र निगरानी संस्था रिकोर्स ने जारी किया था।

फेडरल बैंक लिमिटेड, जिंदल स्टील वर्क्स एनर्जी लिमिटेड और अडानी पॉवर राजस्थान लिमिटेड जैसी कंपनियों को कर्ज देने वाला प्रमुख बैंक है। बैंक की नीति में यह बदलाव विश्व बैंक की प्राईवेट शाखा आईएफसी के उस कदम की प्रतिक्रिया में आया है, जिसमें आईएफसी ने उसे कोयला कंपनियों को कर्ज न देने के बारे में कहा था। आईएफसी ने फेडरल बैंक में 126 मिलियन डालर यानी 942 करोड़ रुपये का निवेश कर रखा है। उसने इसी साल जुलाई में मांग की थी कि वित्तीय संस्थानों को कोयले के वित्तपोषण पर रोक लगा देनी चाहिए।

कोयला कंपनियों और उनके फाइनेंसरों का डेटाबेस रखने वाली संस्था ग्लोबल कोल एक्जिट लिस्ट के मुताबिक, फेडरल बैंक ने पिछले तीन सालों में जिंदल स्टील वर्क्स एनर्जी लिमिटेड को 14 मिलियन डालर का कर्ज दिया है। जिंदल स्टील वर्क्स एनर्जी लिमिटेड कोयले के प्लांट चलाने के साथ ही इंडोनेशिया और दक्षिण-अफ्रीका से कोयले का आयात करता है। उसके पास भारत और दक्षिण-अफ्रीका में कोयले और भूरे कोयले की खदानों के शेयर भी हैं।

भारत को निर्माण कार्यों के लिए 209,412 मेगावाट और 32,285 मेगावाट क्षमता के थर्मल पॉवर स्टेशनों के संचालन के अलावा इसमें 150,000 मेगावाट कोयला आधारित तापीय क्षमता जोड़ने की आवश्यकता होगी।  अगर नई क्षमता वृद्धि की लागत 5 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट मानी जाए तो इस क्षमता वृद्धि का मतलब इस क्षेत्र में 7.5 लाख करोड़ रुपये का निवेश है। पिछले कुछ सालों में कोयले से चलने वाली ताप विद्युत क्षमता वृद्धि में कमी आई है। 2012 और 2016 के बीच हर साल इसमें लगभग 20,000 मेगावाट की वृद्धि, जो अब घटकर 4,000 मेगावाट प्रति वर्ष से कम हो गई है।

इस क्षेत्र के विशेषज्ञों के अनुसार, भारत की सबसे बड़ी बिजली कंपनी नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (एनटीपीसी) ने पिछले पांच सालों में किसी भी नई कोयला आधारित थर्मल पावर स्टेशन परियोजना के बारे में विचार नहीं किया है। हालांकि, पहले एक और 17,570 मेगावाट थर्मल पावर स्टेशन परियोजना की संकल्पना की गई थी और जरूरत पड़ने पर इसे आसानी से बनाया जा सकता है। मांग बढ़ने पर इन परियोजनाओं के निर्माण के लिए सात अलग-अलग कंपनियां तैयार हैं।

नए कोयला पॉवर स्टेशन, जिनकी संकल्पना की गई
कंपनी                क्षमता,मेगावाट में     नए प्रोजेक्टों की संख्या
महाजेनको                4870               4
डीवीसी                   3580               3
एनटीपीसी                3000               2
अडानी                    3200               2
एचपीजीसीएल            1600               2
यूपीआरवीयूएनएल         660               1
डब्ल्यूबीपीडीसीएल        660                1
 कुल                    17570              15
 स्त्रोत: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट, 2021

अगर इसी तरह की प्रवृत्ति जारी रहती है तो कोयले के नए थर्मल पॉवर स्टेशनों की योजना पटरी से उतर सकती है। आईएफसी के नए प्रोजक्ट प्रपत्र में फेडरल बैंक से कहा गया हे कि अगर आईएफसी बैंक में साझीदार बनता है तो उसे कोयले से संबंधित किसी भी पंूजी को वित्तीय सहायता देना बंद करना होगा। इसमें कोयले के नए थर्मल पॉवर स्टेशन भी शामिल होंगे।

फेडरल बैंक की अपनी पर्यावरण और सामाजिक प्रबंधन प्रणाली ने भी इस कदम की पुष्टि की। उसने बताया कि उसकी बहिष्करण सूची में नई थर्मल कोयला खदानों, नए कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्र या मौजूदा खानों और संयंत्रों का महत्वपूर्ण विस्तार शामिल है।

सीएफए और रिकोर्स ने फेडरल बैंक के कोयले में नए निवेश बंद करने के इस फैसले का स्वागत किया। उसने बैंक से आग्रह किया कि वह देखे कि उसके कोयला कंपनियों की मदद के चलते कितना सामाजिक और पर्यावरणीय नुकसान हुआ है।

यह रिपोर्ट पिछले 15 सालों में फेडरल बैंक के कोयले को प्रभावी मदद के खतरे को सूचीबद्ध करती है। आईएफसी ने 2006 से फेडरल बैंक को दो सौ मिलियन डालर से ज्यादा कर्ज दिया है। यह वही दौर था, जब बैंक कोयले की खदानों और पॉवर प्लांटों के विस्तार को समर्थन दे रहा था। उसकी इस नीति की प्रतिध्वनि और आईएफसी की प्रतिबद्धताओं का पालन जमीन पर महसूस किया जा सकता है।

जिंदल स्टील वर्क्स लिमिटेड जो बैंक के कर्जदारों में प्रमुख हैं, उसके मुख्य सतर्कता अधिकारी प्रबोध आचार्य के मुताबिक, ‘हमारी कंपनी जल्द से जल्द कोयले का व्यापार छोड़कर उर्जा के नवकरणीय स्रोतों पर ध्यान केंद्रित करेगी।’