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कोरोना काल में बदली संवाद की भाषा

लॉकडाउन खुलने के बाद धीरे-धीरे सभी भय से उबर रहे हैं, लेकिन संवाद एवं बातचीत के मायने बदल रहे हैं

By Swasti Pachauri

On: Tuesday 30 June 2020
 
राजधानी दिल्ली में दवा की दुकान के बाहर सामाजिक दूरी का ख्याल रखते लोग। फोटो: विकास चौधरी
राजधानी दिल्ली में दवा की दुकान के बाहर सामाजिक दूरी का ख्याल रखते लोग। फोटो: विकास चौधरी राजधानी दिल्ली में दवा की दुकान के बाहर सामाजिक दूरी का ख्याल रखते लोग। फोटो: विकास चौधरी

आजकल कांटेक्टलेस होम डिलीवरी का जमाना है। जैसे- जैसे हालात सामान्य हो रहे हैं, वैसे- वैसे आदमी अपनी मायूसी से उबर रहा है, परंतु दृश्यों में अभी वो पहले वाली सहजता नहीं आयी है पूरी तरह से। जैसे पहले तो लोग एक-दूसरे को शाम हो या सुबह, नमस्कार करते दिख जाते थे। बड़े बुज़ुर्ग एक दूसरे का हालचाल पूछते हुए निकलते थे। सुबह जब कभी-कभी जिम जाती थी, तो करेला का जूस बेचते एक भैय्या के पास भीड़ का जमावड़ा लगा होता था। उसी प्रकार चाहे नारियल पानी का ठेला हो या फिर घर के पास के एक मंदिर का चबूतरा– छोटे- बड़े सभी लोग किसी भी विषय पर चर्चा करते मिल जाते थे।

उसी तरह कॉलोनी के चौकीदार भैय्या के कमरे के पास कभी बच्चे खेलते हुए मिल जाते थे, तो कुछ लोग अख़बार पढ़ते। और अक्सर चौकीदार भैय्या बच्चों को मेन गेट से बाहर जाने से रोकते, डांट दिया करते थे। कितनी ही बार किसी बिल्ली को बिस्कुट खिलाते दिखते। हमारे चौकीदारों की दिनचर्या सुरक्षा प्रदान करने के अलावा इन्हीं छोटे -छोटे संवादों के बीच गुज़रती है। आखिर भरी दोपहर हो, या कड़ाके की ठंड उनको तो अपनी ड्यूटी पर आना ही है न।

लेकिन आजकल कोरोना काल में संवाद की भाषा बदल गयी है। हालांकि धीरे-धीरे सभी भय से उबर रहे हैं, लेकिन संवाद एवं बातचीत के मायने बदल रहे हैं। खासतौर पर बात यदि कांटेक्टलेस डिलीवरी की हो। लॉकडाउन के चंद दिन पहले कुछ सामान जब मैंने मंगवाया, तो उसकी डिलीवरी देने के लिए एक महिला को आये देख मुझे प्रसन्नता हुई। वह इसलिए कि अब तक साल दर साल इकॉनमी में 'जेंडर डाइवर्सिटी' के अभाव की बात सुनते आए थे। लेकिन लगा कि अब वह दूर हो रही है।  उसी तरह पहले सामान मंगवाते समय न तो किसी चीज़ का कभी भय हुआ करता था, जिसकी वजह से बिना किसी ख्याल के दरवाजा खोल दिया करते थे और लायी गयी वस्तु को रख लेते थे।

कई वर्ष पहले जब मैं बहुत छोटी थी, तो एक पोस्टमैन अंकल अपनी खाकी पोशाक पहने अपनी साइकिल पर चिट्ठियां देने आते थे। यह वह जमाना था, जब न तो कोई मोबाइल फ़ोन होते थे और न ही कोई कूरियर कंपनी जो हमारी सुविधा के लिए हमें घर पर ही सभी सहूलियत उपलब्ध करवा देती। यह वो जमाना था, जब शायद हर शुक्रवार रात 9 बजे घर में प्रणय रॉय के 'वर्ल्ड दिस वीक' को हम सब देखा करते थे। मैं तो बहुत छोटी थी, लेकिन पापा और माँ की 'लिबरलआइज़ेशन' पर बातें सुनते हुए बड़ी हुई थी। आज भी वह दृश्य याद है, जब केबल टीवी में बस लगना चालू हुआ था। कितनी बेबाकी और विश्वास से केबल का तार उन भैय्या ने तीन मंज़िला छत पर चढ़ कर लगा दिया था। कितनी ही बार पोस्टमैन अंकल माँ- पापा की कोई महत्वपूर्ण चिट्ठी या कोई आवश्यक चैक भरी दोपहरी में घर देने आते थे।

भैय्या और मैं घर में इन चिट्ठियों को ले लिया करते थे, जब माँ और पापा दोनों ही काम से बाहर होते थे। पोस्टमैन अंकल भी बहुत संवेदनशील थे - उन्हें पता था कि घर में हम दो बच्चे अकेले होते थे, तो वे दरवाज़े के नीचे से ही चिट्ठी सरका देते थे - कॉन्टैक्टलेस होम डिलीवरी तो तब भी थी। बस भय एवं संदेह के बिना ! एक बार  बहुत गर्मी थी, तो भैय्या ने पोस्टमैन अंकल को घर के अंदर बुलाया एवं पानी पिलाया। धूप में पसीने से नहाए वह भी घर के अंदर की शीतलता को महसूस करते चले गए थे।

उसी तरह राजू भैय्या का हमारे घर हर रविवार आना होता था। वे कॉलोनी के घरों से कपड़े धोने के लिए ले जाते थे। उनकी आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण माँ जरूरत न होने पर भी उन्हें अन्य चीज़ें जैसे पायदान या बंदनवार भी धोने को दे दिया करती थीं।

एक इतवार, शाम की बात है। बहुत बारिश हो रही थी। राजू भैय्या हमारे घर पहुंचते- पहुंचते भीग गए। शायद उन्हें बुखार आ गया था। माँ ने उन्हें तुरंत दवाई दी और अदरक, काली मिर्च की चाय बना कर पिलाई। यह शायद 1991 रिफार्म के कोई पांच- एक साल बाद की ही बात है, जब लोगों के प्रति हमारा विश्वास होता था। जब टेक्नोलॉजी ने हमें पूरी तरह 'कोलोनॉइज' नहीं किया था। तब हम एक- दूसरे से बहुत अलग नहीं थे। तब 'गेटेड कम्युनिटी' का जमाना नहीं था। और समाज शास्त्र में जिसको हम 'सोशल कैपिटल' कहते हैं उसकी नींव बहुत मज़बूत होती थी।

आज इस कोरोना काल में मानव संवाद के भीतर इतनी दीवारें खड़ी हो गयी हैं, जो शायद ही कभी हमेशा के लिए टूट सकें। जो 'नया नॉर्मल ' बनता जा रहा है, उसको हम कैसे पलटेंगे? शायद चंद महीने पहले 'गेटेड कम्युनिटी' कॉलोनी के मेन गेट से शुरू होताी थी, और वो भी सुरक्षा की गतिविधियों के कारण। लेकिन आज उस 'गेटेड कम्युनिटी' का दायरा हमारे घर के पायदान पर आकर खड़ा हो गया है। क्योंकि आजकल हम दरवाज़ा नहीं खोलते। जो कोई भी सामान लेकर आता है, उसको झट से ऑनलाइन पेमेंट करते हैं, और कहते है 'सामान बाहर रख दो, हम बाद में उठा लेंगे'।

फिर चाहे वो कितनी ही धूप में अपनी मोटरसाइकिल पर वे चीज़ें रख के लाया या लायी हो। पानी पूछना तो बहुत दूर की बात है, हम में से कितने लोग तुरंत सेनेटाइज़र स्प्रे लेकर उस सामान पर छिड़कना शुरू कर देते हैं।कितनी बार हाल ही में अखबार वाले भैय्या को मायूस देखा है। क्योंकि लोग अखबार अब अपने फ़ोन एवं अपने कंप्यूटर पर पढ़ते हैं। पढ़ने की भी कोई ज़रूरत नहीं, क्योंकि आजकल ट्विटर पर तो सभी जानकारी मिल ही जाती है। समाजशास्त्री एडिटोरियल पढ़ने की किसे आवश्यकता है?


इस कांटेक्टलेस काल में न जाने कितने ही बहुमूल्य जीवन के अंश न चाहते हुए भी हमसे दूर होते जा रहे हैं। न जाने उन सभी डिलीवरी देने आये युवक- युवतियों पर क्या बीतती होगी? यह सत्य है कि कोरोना काल में दवाई के अभाव में फिजिकल एवं सोशल डिस्टेंन्सिंग आवश्यक है। लेकिन उससे कड़वा सत्य यह है कि इस दौरान सबसे ज़्यादा हमें मानवीय संवाद एवं संवेदनशीलताओं की ज़रूरत है। हर कोई अपनी व्यथा, एक मानसिक भय, एवं अकेलापन एक- दूसरे से बांटना चाहता है।

खासतौर से वे लोग जो अपना जीवन जोखिम में डाल कर हमें हमारे घरों तक सामान पहुंचा रहे । क्योंकि 'वर्क फ्रॉम होम' उनके लिए नहीं है। असल में वे हैं, तो हमारा 'वर्क फ्रॉम होम' है। उनकी रीढ़ की हड्डी के कारण ही हम कांटेक्टलेस हो सकते हैं।