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कोरोना महामारी: केंद्र ने डॉक्टरों के सुरक्षा उपकरणों में कमी की बात स्वीकारी, बताई यह वजह

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने लॉकडाउन देशों की सरकारों से परीक्षण की रफ्तार बढ़ाने का आग्रह किया...

By Banjot Kaur

On: Thursday 26 March 2020
 
Photo: flickr
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केंद्र सरकार ने पहली बार स्वीकार किया है कि नोवेल कोरोनोवायरस महामारी से मोर्चा ले रहे डॉक्टरों और अन्य स्वास्थ्य कर्मचारियों के लिए व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पीपीई) हासिल करने में समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

यह स्वीकारोक्ति विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा 30 जनवरी, 2020 को दी गई उस चेतावनी के बाद आई, जिसमें दुनिया भर की सरकारों को पीपीई, वेंटिलेटर और परीक्षण किट का उत्पादन को बढ़ाने के लिए कहा गया था।

25 मार्च को स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा, "उपलब्धता की ये समस्या आपूर्ति श्रृंखला में आए व्यावधान और कच्चे माल के आयात में आ रही चुनौतियों के कारण हैं।"

अग्रवाल ने कहा कि तैयारी बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाने में देरी हुई। उन्होंने कहा, “पहले महामारी का केंद्र वुहान था। अब ऐसा नहीं है। जैसे-जैसे दुनिया में महामारी की स्थिति बनी, हमने अपनी रणनीति बदली।“

उन्होंने बार-बार पूछे जाने पर भी देश में वेंटिलेटर और पीपीई की संख्या नहीं बताई। सूत्र के अनुसार, महामारी से निपटने के लिए वेंटिलेटर को मुक्त करने के लिए केन्द्र सरकार को बार-बार निर्देश जारी करना पड़ा था।

सूत्र ने बताया, "अगर जरूरत पड़ी तो हम अस्पतालों को कुछ समय के लिए अन्य वार्डों के वेंटिलेटर का भी इस्तेमाल करने के लिए कहेंगे।"

उन्होंने कहा कि जिस तरह के पीपीई का इस्तेमाल नोवेल कोरोना वायरस (सार्स-सीओवी-2) के संक्रमण से बचने के लिए किया जाना है, उसका विश्लेषण किया जा रहा है।

केंद्र ने 31 जनवरी को पीपीई और एन95 मास्क के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था। हालांकि, पीपीई निर्यात पर प्रतिबंध 9 फरवरी को हटा दिया गया था, लेकिन  19 मार्च को फिर से प्रतिबंध लगा दिया गया।

डाउन टू अर्थ ने अग्रवाल से जब पूछा कि 25 मार्च को केंद्र द्वारा घोषित 21 दिनों के राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन का क्या तर्क है और क्या इससे वायरस के प्रसार में कमी आएगी, तो उन्होंने कोई सीधा जवाब देने से बचते हुए बस इतना भर कहा,"ये प्रतिबंध सार्वजनिक हित में लगाया गया है।"

क्या डब्ल्यूएचओ के साथ केंद्र सरकार का तालमेल सही है?

25 मार्च को डब्ल्यूएचओ ने फिर से कहा कि लॉकडाउन के साथ-साथ सार्वजनिक स्वास्थ्य उपाय नहीं किए गए तो लॉकडाउन के नतीजे अच्छे नहीं होंगे।

जब पूर्ण लॉकडाउन का निर्णय लिया गया था तब भारत में 600 से कम मामले थे, जबकि ब्रिटेन में ये संख्या 8,000 से अधिक थी।

इन उपायों के साथ ही परीक्षण की गति तेज करने की आवश्यकता है।

जर्मनी में अब तक 400,000, अमेरिका में 67,000, इटली में 296,964 और ब्रिटेन में 83,945 नमूनों का परीक्षण किया गया है, जबकि भारत में परीक्षण की संख्या अभी तक सिर्फ 22038 है।

25 मार्च को भारतीय सरकारी अधिकारियों ने दावा किया कि देश के 118 सरकारी लैब में प्रति दिन 12,000 नमूनों का परीक्षण किया जा सकता है।

अग्रवाल ने कहा, 'हालांकि, हमें संख्या बढ़ाने की जरूरत नहीं है क्योंकि इससे अंधाधुंध परीक्षण हो सकता है।'

हालांकि, इसके विपरीत दक्षिण कोरिया और सिंगापुर में देखा गया था कि इन देशों ने लॉकडाउन करने की जगह ज्यादा से ज्यादा परीक्षण कर के संक्रमित व्यक्तियों का पता लगाया।

डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक टेड्रोस एढनोम घेबियस ने कहा कि लॉकडाउन महामारी को नहीं खत्म करेगा और उन्होंने पीडित देशों से "दूसरे उपायों" का इस्तेमाल करने को कहा। उन्होंने लॉकडाउन जैसे तथाकथित उपाय अपनाने वाले सभी देशों से अन्य उपायों का इस्तेमाल करने का आह्वान किया है।

उन्होंने निम्नलिखित उपायों के बारे में विस्तार से बताया:

  • स्वास्थ्य देखभाल और सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यबल का विस्तार, प्रशिक्षण और तैनाती
  • सामुदायिक स्तर पर हरेक संदिग्ध मामले को खोजने के लिए एक प्रणाली लागू करना
  • परीक्षण किट का उत्पादन, क्षमता और उपलब्धता को सुधारें
  • मरीजों को अलग रखने और इलाज करने के लिए सुविधाओं की पहचान और उपयोग
  • संक्रमितों के अन्य से संपर्क बाधित करने के लिए एक ठोस योजना और प्रक्रिया विकसित करें
  • कोविड-19 को दबाने और नियंत्रित करने पर सरकार पूरा ध्यान दें

उन्होंने कहा कि ये उपाय वायरस के प्रसार को दबाने और रोकने का सबसे अच्छा तरीका है, ताकि जब प्रतिबंध हटाए जाएं, तो वायरस फिर से न उभरे।