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कोविड-19: पहले क्लिनिकल ट्रायल में “रेमडेसिवियर” का नहीं दिखा असर

लैंसेट के निष्कर्ष, गिलीड के नतीजों के उलट है। गिलिड ने रोगियों में सुधार का दावा किया था... 

By Banjot Kaur

On: Thursday 30 April 2020
 
Photo: Flickr
Photo: Flickr Photo: Flickr

 

नोवल कोरोनावायरस (कोविड-19) पॉजिटिव रोगियों पर एंटी-वायरल ड्रग रेमडेसिवियर के पहले कंट्रोल ट्रायल का कोई महत्वपूर्ण असर नहीं पाया गया है। इस अध्ययन के नतीजे लैंसेट द्वारा जारी किए गए थे। दवा बनाने वाली कंपनी गिलिड लाइफसाइंसेज ने इस दवा को ले कर जो दावे किए थे, लैंसेट के निष्कर्ष ने उसे गलत साबित कर दिया है। 

लैंसेट पेपर के शोधकर्ताओं ने कहा," हमारे परीक्षण में पाया गया कि प्लेसबो की तुलना में, इंट्रावेनस रेमडेसिवियर गंभीर कोविड​​-19 नैदानिक ​​सुधार, मृत्यु दर में कमी या रोगियों के शरीर से वायरस के निकलने के समय में काफी सुधार नहीं कर पाया। प्लेसबो, ट्रायल के लिए नामांकित रोगियों का वो समूह है, जिसमें दवा परिणामों की तुलना करने के लिए इस समूह को  दवा का इनएक्टिव (निष्क्रिय) रूप दिया गया था, जबकि दूसरे समूह को दवा का एक्टिव (सक्रिय) रूप दिया गया था। स्वास्थ्य क्षेत्र में इस तरह के ट्रायल को 'नियंत्रित परीक्षण' (कंट्रोल ट्रायल) कहा जाता है। इसे 'रैंडम' माना जाता है, क्योंकि कोविड-19 पॉजिटिव मरीज़ 18 साल से अधिक उम्र के थे, जिन्हें रैंडमली चुना गया था।

वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि उनके अध्ययन में शामिल मरीज, उनके पिछले अध्ययन (बिना ट्रायल के दवा उपयोग) की तुलना में कम बीमार थे। ये मरीज पहले से ही कहीं अपना इलाज करवा चुके थे। इसलिए, इस ट्रायल का नतीजा सकारात्मक होना चाहिए था, लेकिन जो हुआ वह उनकी उम्मीदों के विपरीत था। उन्होंने कहा, "हमारे परिणाम हमारी अपेक्षा को पूरा नहीं करते थे।” महामारी की स्थिति में किसी अन्य दवा की अनुपलब्धता की वजह से, बिना क्लिनिकल ट्रायल के ही दवा का इस्तेमाल “कंपैसनेट यूज ऑफ ड्रग” कहा जाता है। कोविड-19 रोगियों पर “कंपैसनेट यूज ऑफ ड्रग” ने सकारात्मक परिणाम दिए हैं। इसलिए, इस पहले क्लिनिकल ट्रायल का नतीजा काफी महत्वपूर्ण हो जाता हैं।

पेपर के मुताबिक,“ट्रायल में पाया गया कि रोगियों के दोनों  समूहों के बीच आवश्यक वेंटिलेशन अवधि में कोई महत्वपूर्ण अंतर नहीं था। इसी तरह, सक्रिय और निष्क्रिय दवा दिए गए समूहों के बीच भी आवश्यक ऑक्सीजन सपोर्ट की अवधि में कोई अंतर नहीं दिखा। मृत्यु दर अवधि भी अलग नहीं थी। दोनों समूहों के लिए समान 28-दिवसीय मृत्यु दर थी।

यह 237 रोगियों पर किया गया एक मल्टी-सेंटर ट्रायल था। 158 को रेमडेसिवियर और बाकी को प्लेसबो (दवा का इनएक्टिव रूप) दिया गया। यह ट्रायल महामारी के केन्द्र वुहान (चीन) के दस अस्पतालों में किया गया था। मरीजों को पहले दिन 200 मिलीग्राम रेमडेसिवियर का इंजेक्शन दिया गया और दूसरे से दसवें दिन तक दिन में एक बार 100 मिलीग्राम का डोज दिया गया। चाइनीज एकेडमी ऑफ मेडिकल साइंस ने इस प्रोजेक्ट का नेतृत्व किया था। चीन, ब्रिटेन और अमेरिका के 40 से अधिक शोधकर्ताओं ने इस ट्रायल पर काम किया।

इस दवा ने सबसे अच्छा ये काम किया कि इसने रोगियों के सुधार समय (इम्प्रूवमेंट टाइम) को 5 दिन कम कर दिया। पेपर कहता है, "लक्षण आने के 10 दिनों के भीतर जिन रोगियों का इलाज किया गया था, उनमें रेमडेसिवियर ने कोई खास असर नहीं दिखाया, लेकिन क्लिनिकल इम्प्रूवमेंट के औसत समय में 5 दिनों की कमी जरूर आई।” लेकिन इस ट्रायल की एक सीमा थी। ये ट्रायल अपेक्षित परिणाम पाने के लिए आवश्यक रोगियों की संख्या नहीं जुटा सका। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि वुहान में कड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य उपाय अपनाए जा रहे थे। इस वजह से मार्च के मध्य में नए रोगी सामने नहीं आ सके। फिर अस्पताल में बिस्तर उपलब्धता पर प्रतिबंध के परिणामस्वरूप अधिकांश रोगी बहुत बाद में भर्ती हो सके थे। 

इसलिए शोधकर्ताओं का सुझाव है कि अभी चल रहे कंट्रोल्ड क्लिनिकल ट्रायल को इन निष्कर्षों की पुष्टि या खंडन करना चाहिए।

उपरोक्त दवा को इंजेक्ट करने का कोई महत्वपूर्ण प्रतिकूल प्रभाव नहीं दिखा। हालांकि, जिन रोगियों में रेमडेसिवियर इंजेक्शन लगाया गया, उनमें गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल लक्षण (एनोरेक्सिया, मितली और उल्टी) दिखे, उनमें बिलीरुबिन का स्तर बढ़ गया था और उनकी कार्डियोपल्मोनरी (हृदय और फेफडे) स्थिति प्रभावित हुई थी। एक्टिव ड्रग लेने वाले समूह के 66% मरीजों में प्रतिकूल प्रभाव दिखे जबकि दूसरे समूह में 64% मरीजों के साथ ऐसा हुआ। 

गौरतलब है कि रेमडेसिवियर का इबोला रोगियों में भी कैंपेसनेट यूज किया गया था।

महत्वपूर्ण बात ये है कि इस दवा ने प्रयोगशाला में वायरस (सार्स-सीओवी-2) पर सकारात्मक परिणाम दिखाए हैं। हालांकि, ये क्लिनिकल ट्रायल कोई नतीजा देने में असफल रहा है। यह भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) सहित तमाम एजेंसियों के लिए सतर्क होने का समय है, जिसने हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन की सिफारिश की है। इस मलेरिया-रोधी दवा ने लैब में वायरस (सार्स-सीओवी-2) पर सकारात्मक परिणाम तो दिए हैं, लेकिन अभी तक इस दवा का कंट्रोल्ड क्लिनिकल ट्रायल नहीं किया गया है।

गिलिड का दावा 

29 अप्रैल को जारी प्रेस विज्ञप्ति में इस बहुराष्ट्रीय दवा निर्माता ने कहा कि उन कोविड-19 रोगियों में महत्वपूर्ण सुधार हुए, जिन्हें ये दवा दी गई। “गिलिड ने आने वाले सप्ताहों में जर्नल में प्रकाशन के लिए पूरा डेटा जमा कराने की योजना बनाई है। अध्ययन में बताया गया है कि 5-दिवसीय उपचार लेने की तुलना में, रेमडेसिवियर का 10-दिवसीय उपचार लेने वाले रोगियों के क्लिनिकल स्टेट्स में भी समान सुधार हुआ है।

जयपुर के चार रोगियों को भी ये दवा दी गई थी और उन्होंने सकारात्मक परिणाम दिखाए थे। आईसीएमआर का कहना है कि यह वायरस के खिलाफ एक प्रभावी दवा हो सकती है।