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कोविड 19 : क्या भारत के पास है लॉकडाउन से निकलने की योजना?

 पीएम ने सभी मुख्यमंत्रियों को एक आम एग्जिट रणनीति तैयार करने का निर्देश दिया है 

By Vibha Varshney

On: Wednesday 08 April 2020
 
दिल्ली की बंद पड़ी जनपथ मार्केट। फोटो: विकास चौधरी
दिल्ली की बंद पड़ी जनपथ मार्केट। फोटो: विकास चौधरी दिल्ली की बंद पड़ी जनपथ मार्केट। फोटो: विकास चौधरी

अभी समय साफ-साफ बोलने का है। भारत सरकार ने नॉवेल कोरोनोवायरस के प्रसार को रोकने के लिए 21 दिन का लॉकडाउन लगाया था। जैसे-जैसे इस लॉकडाउन का अंत नजदीक आता जा रहा है, लोग सरकार की रणनीति का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। 

दुर्भाग्यवश , इस पर बहुत अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। 2 अप्रैल, 2020 को प्रधानमंत्री ने सभी मुख्यमंत्रियों से मुलाकात की और उन्हें मुख्यधारा में लौटने की योजना तैयार करने के लिए कहा। महामारी से निपटने में मदद के लिए गठित विशेषाधिकार प्राप्त समितियों को इसके समाधान के बारे में सोचने के लिए कहा गया है।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार ऐसा ही एक समूह 6 अप्रैल को मिला। “एम्पावर्ड ग्रुप ऑन स्ट्रटीजिक इशूज रिलेटेड टु लॉकडाउन “ नामक इस समूह में भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ (फिक्की ) एवं कॉन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री जैसे उद्योग संगठनों के प्रतिनिधि हैं। 

लेकिन यहीं से समस्या शुरू होती है। क्या इस समूह की दिलचस्पी आम आदमी की जरूरतों में होगी? लॉकडाउन खत्म होने का हम सभी बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं पर क्या हम इसके लिए तैयार हैं? समस्या यह है कि किसी को पता नहीं है कि करना क्या है। हालत ऐसे हैं कि चीन एवं यूके जैसे देश भी अभी तक प्रयोग ही कर रहे हैं। दुर्भाग्यवश यह एक ऐसा मामला है जहां विज्ञान भी बहुत मददगार साबित नहीं हुआ है। 

अधिकांश देश सोशल डिस्टेंसिंग और हाथ की सफाई के माध्यम से "वक्र को समतल" करने या संक्रमण की संख्या को कम करने की कोशिश कर रहे हैं। भारत इस मोर्चे पर कार्रवाई करने वाले पहले कुछ देशों में से एक था। 17 जनवरी को पहला मामला सामने आने से पहले ही भारत ने यात्रा सुरक्षा को लेकर एक एडवाइजरी जारी की और चीन से आने वाले यात्रियों की स्क्रीनिंग शुरू की।

इस अभूतपूर्व लॉकडाउन के बावजूद, हम महामारी को नियंत्रित करने में सफल नहीं हो पाए हैं। वर्तमान में रीप्रोडक्शन नंबर आर-1.81 के स्तर पर है। यदि संक्रमण का प्रसार नियंत्रण में होता तो यह संख्या 1 से कम होती। 

यदि आर-1 से अधिक है तो संक्रमण तब तक बढ़ता है जब तक महामारी अपने चरम पर न पहुंच जाए। उसके बाद जैसे-जैसे जनता में हार्ड इम्यूनिटी आती है, वैसे-वैसे संक्रमण घटता जाता है। जिस हिसाब से मामलों की संख्या बढ़ती जा रही है, यह स्पष्ट है कि यह महामारी अभी अपने चरम पर नहीं पहुंची है। 

स्वप्निल मिश्रा इंपीरियल कॉलेज लंदन के स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ में शोध सहयोगी के रूप में कार्यरत हैं। वह कहते हैं, “महामारी कब खत्म होगी इसका कोई वास्तविक अनुमान नहीं है। लेकिन उन देशों में, जहां यह महामारी अपने उन्नत चरण में पहुंच गई थी, वहां अब वक्र समतल होता नजर या रहा है। ऐसा कई प्रकार के सरकारी हस्तक्षेपों की बदौलत ही संभव हो सका है। हम यह नहीं कह सकते कि कौन सा हस्तक्षेप अधिक प्रभावी है, लेकिन सामूहिक रूप से वे महामारी को नियंत्रित करने में मदद कर रहे हैं।” 

मिश्रा 11 यूरोपीय देशों पर बनी एक रिपोर्ट, जिसे 30 मार्च को एमआरसी सेंटर फॉर ग्लोबल इंफेक्शियस डिजीज एनालिसिस द्वारा प्रकाशित किया गया था, के प्रमुख लेखक हैं। उन्होंने कहा कि "प्रतिबंधों को थोड़ी और देर के लिए जारी रखना होगा क्योंकि रीप्रोडक्शन नंबर एक से अधिक है"।

हालांकि मिश्रा ने यह नहीं बताया कि "थोड़ी देर" होने का क्या मतलब हो सकता है, लेकिन कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा प्रस्तावित एक मॉडल ने भारत के लिए दो विकल्प सुझाए। पहले वाले ने 21 दिनों का लॉकडाउन सुझाया, उसके बाद 28 दिनों का और फिर 18 दिनों का। हर लॉकडाउन के बीच पांच दिनों की छूट दी गई। इसे 10 जून, 2020 तक जारी रखना होगा। दूसरे ने 13 मई, 2020 तक 49 दिनों के लगातार लॉकडाउन का सुझाव दिया।

कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में गणित विभाग में कार्यरत रॉनजॉय अधिकारी ने कहा, “जब तक हम हार्ड इम्यूनिटी नहीं प्राप्त कर लेते हैं, तब तक महामारी जारी रहेगी, जिसका अर्थ है कि यह तभी रुकेगी जब अधिकांश आबादी संक्रमित हो चुकी हो। या फिर जब तक हमें कोई वैक्सीन नहीं मिल जाती।”

वह कहते हैं, "यदि हम भारत में महामारी को बिना किसी प्रतिरोध के फैलने देते हैं, तो यह अगस्त के अंत तक खत्म हो जाएगी। लेकिन मरनेवालों की संख्या भयावह होगी। यदि हम निरंतर सोशल डिस्टेंसिंग से महामारी को नियंत्रित करते हैं, तो हमें टीका बन जाने तक इंतजार करना होगा, जिसमें कम से कम एक वर्ष का समय लगेगा।” उन्होंने कहा कि देश को सामान्य स्थिति में आने में कम से कम एक वर्ष का समय लगेगा।

उपर्युक्त अध्ययन पियर रिव्यूड नहीं  है। हालांकि जब वर्तमान लॉकडाउन समाप्त होने पर है, ऐसे में यह सरकार को सोच विचार करने के लिए कुछ सामग्री प्रदान कर सकता है। अधिकारी ने जोर देकर कहा कि ऐसे कई लॉकडाउन प्रोटोकॉल हैं जो संक्रमण को अलग-अलग स्तर तक ले जा सकते हैं। लेकिन उनकी व्यवहार्यता का गणितीय रूप से पता नहीं लगाया जा सकता है, क्योंकि आर्थिक, चिकित्सा, सामाजिक और नैतिक कारकों को ध्यान में रखने की आवश्यकता है ।

मॉडल सिर्फ मॉडल हैं और उनकी अपनी अपनी खामियां हैं। 6 अप्रैल को प्रीप्रिंट सर्वर पर प्रकाशित एक नए मॉडल के मुताबिक मौजूदा मॉडलों में गड़बड़ है। यूनाइटेड किंगडम के ईस्ट एंग्लिया विश्वविद्यालय में प्रोफेसर एलस्टेयर ग्रांट द्वारा विकसित किए गए नए मॉडल की तुलना वुहान में हुए कोविड-19 के एक प्रकाशित मॉडल से की। यह मॉडल तब का था जब वुहान में सोशल डिस्टेंसिंग एवं आइसोलेशन लागू नहीं किया गया था। इस तुलना से यह पता लगा कि पहले वाले मॉडल ने संक्रमण के चरम स्तर को तीन गुना कम करके आंका। 

इसके अलावा इस मॉडल ने चरम के बाद महामारी के जारी रहने के समय को भी बढ़ाकर आंका। अगर हम इसे फेस वैल्यू पर लें तो यह एक अच्छी खबर है। यह पूछे जाने पर कि क्या भारत वक्र को समतल करने के लिए पर्याप्त कोशिशें कर रहा है, मिश्रा ने कहा कि इस पर टिप्पणी करना मुश्किल है, कम से कम अभी के लिए। उन्होंने विश्वसनीय आंकड़ों की कमी के लिए अनिश्चितता को जिम्मेदार ठहराया। इसके साथ ही उन्होंने इस ओर भी इशारा किया कि प्रतिबंधों का कड़ाई से पालन नहीं किया जाता है।

हालांकि, उन्होंने कहा कि अगर भारत में मुंबई में धारावी और दिल्ली में निजामुद्दीन जैसे क्षेत्रों से सामुदायिक संक्रमण शुरू हो गया है, तो "वक्र को समतल करने के लिए प्रतिबंधों को जारी रखने की आवश्यकता है।” अधिकारी मानते हैं कि हम टेस्टों की संख्या बढ़ाकर अपने आंकड़ों की विश्वसनीयता को सुधार सकते हैं। हम जितने अधिक परीक्षण करेंगे, हमें संक्रमण के प्रसार के बारे में उतनी ही अधिक जानकारी मिलेगी। 

ये सारी चीजें एक मजबूत स्वास्थ्य संरचना के साथ मिलकर अवश्य ही वक्र समतल करने में मदद करेंगी। यरुशलम के हिब्रू विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने ऐसे गणितीय मॉडल विकसित किए हैं जो देशों को यह तय करने में मदद करेंगे कि क्या उनका स्वास्थ्य का बुनियादी ढांचा संक्रमण के मामलों में अचानक वृद्धि का भार उठा सकता है। अतः अपने बुनियादी ढांचे में सुधार करना भारत के लिए इस लॉकडाउन से निकालने का एक अच्छा विकल्प हो सकता है ।