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एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस महामारी को रोकने के लिए बेहद जरूरी है वन-हेल्थ एक्शन

जब तक इंसान और पशुओं के स्वास्थ्य, पर्यावरण, फसल, भोजन व दवा जैसे सेक्टरों के अग्रणी लोग आगे आकर कोई कदम नहीं उठाएंगे, तब तक दुनिया रोगाणुरोधी प्रतिरोध को रोक नहीं पाएगी

By Amit Khurana, Rajeshwari Sinha

On: Thursday 19 November 2020
 
Drug-resistant infections: The silent pandemic that we must tackle now. Photo: https://www.publicdomainpictures.net/

नोवेल कोरोनावायरस महामारी के दौरान दुनियाभर में मनाया जा रहा रोगाणुरोधी (एंटी माइक्रोबियल) जागरूकता सप्ताह सराहनीय है। इससे यह पता चलता है कि वैश्विक समुदाय महामारियों से होने वाले नुकसान को लेकर सचेत हो गया है और इसे गंभीरता से ले रहा है।

18 से 24 नवंबर तक का यह सप्ताह तैयारी रखने या कम से कम खुद को यह याद दिलाने का है कि हमें बेहतर तैयारी की जरूरत है।

दुनिया के तमाम देश अब भी इस बात से मुकर सकते हैं कि उन्हें तैयारी रखनी चाहिए और इस मामले में ढील दे सकते हैं, लेकिन ये हम सब देख रहे हैं और ये माना जा सकता है कि रोगाणुरोधी प्रतिरोध (एएमआर) पूरी तरह से विकसित और लम्बे समय तक टिकने वाली महामारी है- जो कई वर्षों से दुनियाभर के देशों में लोगों की जान ले रही है और आगे भी लेती रहेगी, जब तक हम कोई कदम नहीं उठाते।

इस बीमारी का दीर्घकालिक होना इसे ऐसी महामारी बनाता है जो चुपके से वार करती है। यही वजह है कि AMR के कारण होने वाले नुकसान को लेकर किसी तरह की हलचल या अशांति नहीं फैलती- ठीक वैसा जैसा अभी दुनिया में हो रहा है। लेकिन अगर इस नुकसान को करीब से देखा जाए तो समझ आता है कि इसके चलते लम्बे समय तक नुकसान होने की सम्भावना है।

एक अनुमान के मुताबिक, ऐसे संक्रमण जिनमें दवा भी असर नहीं करती, उनके चलते हर साल दुनियाभर में सात लाख लोगों की मौत होती है। अगर कोई कदम नहीं उठाया गया तो 2050 तक एक साल में मरने वालों की संख्या एक करोड़ तक पहुंच जाएगी। यानी अगर दुनिया अब भी नहीं सीखी तो 2050 तक हर दिन 27,400 (हर घंटे तकरीबन 1,140 ) लोगों की जान जाएगी। ये आंकड़े कोविड-19 से होने वाली मौतों से कहीं ज्यादा हैं।

ज्यादा खतरा यहां

इसी अनुमान के मुताबिक, कुल मौतों में से 90 फीसदी एशिया और अफ्रीका में होंगी। इससे संकेत मिलते हैं कि विकासशील देशों पर बहुत असर पड़ेगा और इसलिए इन देशों को अभी से सुधार कार्य में जुट जाने की जरूरत है। 

यह सबसे बुरी स्थिति होगी लेकिन इससे अंदाजा मिलता है कि एएमआर कितना खतरनाक हो सकता है।

इसकी वजह से सभी तरह के बैक्टीरियल इन्फेक्शन होने का खतरा बढ़ सकता है। ऐसा कोई भी संक्रमण जिसके इलाज के लिए असरदायक एंटीबायोटिक उपलब्ध न हो, वो जानलेवा हो सकता है। ये बड़ी चिंता का विषय है।

एक तरफ मौजूदा एंटीबायोटिक बेअसर हो रहे हैं और दूसरी तरफ नए एंटीबायोटिक बनाने की योजनाएं आगे नहीं बढ़ रही हैं।

यह समय इस बात पर ध्यान देने का भी है कि हम कहां खड़े हैं, खासतौर से पिछले पांच साल में हम कहां रहे हैं। 2015 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ग्लोबल एक्शन प्लान शुरू किया था जिसे बाद में संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन और विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन ने भी समर्थन दिया था। इस एक्शन प्लान ने AMR पर काबू पाने में सहयोग दिया है।  

यह सराहना की बात है कि वैश्विक समुदाय, स्टेकहोल्डर्स और कई देश इस सप्ताह जागरूकता बढ़ाने के लिए नए आकलन और प्रमाण जुटा रहे हैं। लेकिन यह समय पीछे मुड़कर यह देखने का भी है कि जो तय किया गया था उसकी तुलना में दुनिया कहां पहुंची है। 

रास्ते की रुकावटें

विकासशील देशों के मामले में सबसे अहम मसला ये है कि राष्ट्रीय एएमआर एक्शन प्लान योजनाबद्ध तरीके से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं।

राष्ट्रीय स्टेकहोल्डर्स की तरफ से योजनाओं, नीति और दिशानिर्देशों के मामले में विकास नजर आता है, लेकिन कार्य योजनाओं को लागू करने में बड़ी चुनौतियां सामने आ जाती हैं। इसके पीछे कई कारण हैं।

पहला ये कि एएमआर का मुद्दा अब भी मुख्य तौर पर स्वास्थ्यसेवा मंत्रालयों और इस सेक्टर के प्रमुख हितग्राहियों के द्वारा संचालित हो रहा है। उत्पादकता पर जोर देने वाले पशु क्षेत्र के स्टेकहोल्डर्स से उलट इस क्षेत्र के स्टेकहोल्डर्स का मुख्य एजेंडा इंसानी स्वास्थ्य को बचाने का है जो एएमआर एजेंडा के साथ तालमेल में है। इसके चलते वे एएमआर से लड़ने के लिए प्रशिक्षण प्राप्त अधिक मानव संसाधन को जुटा सकते हैं, लेकिन ये पशु और पर्यावरण क्षेत्र के लिए बाधा है।

इसके साथ ही, विश्व स्वास्थ्य संगठन की समूचे देश में मौजूदगी इस त्रिदल और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण प्रोग्राम से ज्यादा मजबूत और सक्रिय है।

इस दिशा में कुछ प्रयास होने के बाद भी एएमआर अब तक इंसानी स्वास्थ्य से जुड़ा एजेंडा बना हुआ है, यह वन-हेल्थ एजेंडा नहीं बन पाया है। पशु स्वास्थ्य और पर्यावरण प्रबंधन जैसे सेक्टरों से मिलने वाली सीमित मदद इस बात को प्रमाणित करती है।

इस धीमी प्रगति के पीछे एक बड़ा कारण ये भी है कि एएमआर की दिशा में देशों की सरकारें पर्याप्त बजट का आवंटन नहीं कर रही हैं, जिसके चलते डोनेशन देने वाली एजेंसियों पर निर्भरता बढ़ गई है। इससे साफ जाहिर होता है एएमआर को लेकर सभी राजनीतिक प्रतिबद्धताएं अभी सिर्फ कागज तक सीमित हैं।

क्यों है ये आशंका

एक बड़ा मसला ये भी है कि राष्ट्रीय पशु व खाद्य क्षेत्र के स्टेकहोल्डर एंटीबायोटिक दवाओं के बिना भोजन उगाने के प्रति शंकावान रहते हैं। उनका भरोसा बना हुआ है कि गहन खाद्य उत्पादन प्रणाली ही खाद्य सुरक्षा को लेकर होने वाली सभी चिंताओं का समाधान है।

वे विकल्पों का प्रयोग करके, बेहतर बायोसिक्योरिटी और पशुपालन की अच्छी तकनीकें अपनाकर बिना रसायनों (बिना एंटीबायोटिक) के भोजन के उत्पादन के लिए व्यवस्थित ढंग से चर्चा करने को अभी साथ नहीं आये हैं।

वे लंबे समय से ये समझने में संघर्ष करते आये हैं कि मौजूदा पद्धतियों में से कितनी ऐसी हैं जो किसानों की खराब आदतों या अज्ञान के चलते हैं और कितनी व्यावसायिक रूप से चलन में हैं।  

लिहाजा, ये जानते हुए भी कि कई पद्धतियां स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए अच्छी नहीं हैं, अब तक इनका कोई विकल्प नहीं ढूंढा गया है। दुनिया के कई कोनों में बेहतर पद्धतियों के उदाहरण मौजूद हैं, जिन्हें अपनाया जा सकता है।

भोजन के लिए बिना एंटीबायोटिक के खेती करने या जानवर पालने की प्रक्रिया को साबित करने के ज़्यादा मौके नहीं मिले हैं और दूसरे समाधानों पर फिलहाल किसी का ध्यान नहीं है।

नतीजतन एक पद्धति से दूसरी पद्धति पर जाने में होने वाले जोखिमों को कम करने की योजनाएं नहीं हैं, विकल्पों को प्रोत्साहित नहीं किया जा रहा। प्रोत्साहन के तौर पर किसी उपहार या इनाम का निर्धारण नहीं किया गया है। सबसे अहम बात ये है कि किसानों और उत्पादकों के बीच इस बात को लेकर जागरूकता नहीं फैलाई गई है कि बिना एंटीबायोटिक के भोजन कैसे उगाना है।

किसान अब तक उत्पादन बढ़ाने के लिए दवाओं का प्रयोग करते हैं और देश रोगों का प्रसार रोकने के लिए एंटीबायोटिक का इस्तेमाल करने की अनुमति देते रहते हैं।

बहुत जरूरी एंटीबायोटिक का इस्तेमाल किया जाना अब भी आम प्रक्रिया है और एंटीबायोटिक अब भी बिना प्रिस्क्रिप्शन के मिल जाते हैं और खेतों से निकलने वाले कचरे का वैसा प्रबंधन नहीं किया जाता जैसा किया जाना चाहिए।

कृषि क्षेत्र के स्टेकहोल्डर्स के लिए भी यही परिस्थिति है जो अब तक फसल में एंटीबायोटिक के जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल को रोकने के लिए ठोस कदम नहीं उठा पाए हैं।  

पर्यावरण सबसे कमजोर कड़ी

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण योजना (यूएनईपी) कुछ वर्ष पहले लागू की गई थी, लेकिन इसकी भूमिका और योगदान अब तक साफ नहीं है। 

कचरे और पर्यावरण से आने वाले एएमआर को रोकने के लिए बमुश्किल कोई तकनीकी मार्गदर्शन है। कचरे में एंटीबायोटिक की डिस्चार्ज लिमिट कैसे तय करनी है, खेतों, फैक्ट्रियों, स्वास्थ्य सेवा केंद्रों और घरों सहित अन्य स्रोतों से आने वाले कचरे का प्रबंध कैसे करना है, इस संबंध में तकनीकी मार्गदर्शन नहीं है।   

एएमआर और पर्यावरण एक जटिल और एक-दूसरे के क्षेत्र में दखल देने वाला मुद्दा है। वैज्ञानिक समुदाय अब तक एएमआर के संचारण का तरीका समझने की कोशिशों में लगा है।

हालांकि पर्यावरण के राष्ट्रीय हितधारकों को शायद अब समस्या दिखाई देने लगी है और वे उस पर चर्चा करने को भी तैयार दिखाई देते हैं। यह इसलिए भी हो सकता है क्योंकि खाद्य और पशु स्वास्थ्य क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा को लेकर कोई रुचि नहीं है। कचरे में मौजूद रसायनों को पर्यावरण में शामिल न होने देने की उनकी प्रतिबद्धता एंटीबायोटिक के मामले में भी काम आती है।

लेकिन ये कोशिशें भी कई चुनौतियों के आगे कम पड़ जाती हैं, जैसे क्या करना है और कैसे करना है, इसकी जानकारी न होना। पर्यावरण में एंटीबायोटिक की जांच करने के काम में संसाधन जुटाने के लिए फंड की कमी के साथ-साथ कम क्षमता होना भी एक समस्या है।

जो एक बात पूरी तरह साफ है वह यह है कि दुनिया तब तक एएमआर को नहीं रोक पायेगी जब तक मानव स्वास्थ्य, पशु, पर्यावरण, कृषि, भोजन व दवा के क्षेत्र से सभी स्टेकहोल्डर्स आगे आकर कोई कदम न उठाएं। एक असल वन-हेल्थ दृष्टिकोण के नाम पर उन्हें अभी इसी समय कदम उठाने की जरूरत हैं।