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कोरोना से जंग: बिहार में डॉक्टरों की कमी, स्वास्थ्य सेवाओं का अकाल

बिहार में प्राइमरी हेल्थ सेंटरों की संख्या 1,900 के करीब है जबकि आबादी के हिसाब इनकी संख्या 3,470 होनी चाहिए

By Umesh Kumar Ray

On: Tuesday 31 March 2020
 

स्वास्थ्य सूचकांकों में बिहार कई मामलों में निचले पायदान पर है। यहां डॉक्टर और मरीजों का अनुपात दयनीय है। फोटो : उमेश कुमार राय

कोरोनावायरस का संक्रमण बिहार में दूसरे चरण में है। महज 9 दिनों में कोरोनावायरस से संक्रमित मरीजों की संख्या 15 पर पहुंच चुकी है। कई इलाकों को अतिसंवेदनशील मानते हुए उनकी घेराबंदी कर दी गई है और माना जा रहा है कि आने वाले दो हफ्ते बेहद अहम होने वाले हैं। ऐसे मे ये जान लेना भी जरूरी होगा कि दुनिया के शक्तिशाली देशों को घुटनों पर ला देने वाले इस वायरस से बचने के लिए बिहार की सरकार कितनी तैयार है।

स्वास्थ्य सूचकांकों में बिहार कई मामलों में निचले पायदान पर है। यहां डॉक्टर और मरीजों का अनुपात दयनीय है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) कहता है कि 1 हजार मरीजों पर एक डॉक्टर होना चाहिए। इस लिहाज से बिहार में डॉक्टरों की संख्या एक लाख से ज्यादा होनी चाहिए, लेकिन अभी बिहार में महज 6,830 डॉक्टर उपलब्ध हैं। वहीं, अस्पतालों की बात करें, तो बिहार में प्राइमरी हेल्थ सेंटरों की संख्या 1,900 के करीब है जबकि आबादी के हिसाब इनकी संख्या 3,470 होनी चाहिए। इसी तरह कम्युनिटी हेल्थ सेंटरों की संख्या 867 होनी चाहिए, जबकि अभी 150 ही है। पूरे राज्य में महज 9 मेडिकल कॉलेज हैं।

सूबे की राजधानी पटना में ही कोरोना से लड़ने की तैयारी का जायजा ले लें, तो साफ हो जाएगा कि सरकारी व्यवस्था से कितना आश्वस्त होना चाहिए। यहां आइसोलेशन बेड जरूरत के मुकाबले बहुत कम है। पटना के मेडिकल कॉलेजों, प्राइमरी हेल्थ सेंटर व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को मिलाकर 1,000 से कुछ ज्यादा बेड हैं। सोमवार से इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (आईजीआईएमएस), पटना को कोरोना के इलाज से मुक्त कर दिया गया है। यानी वहां कोरोना से संक्रमित किसी भी मरीज का इलाज नहीं होगा।

कोरोनावायरस का अटैक फेफड़े पर सबसे ज्यादा होता है, जिससे सांस लेने में तकलीफ होती है। ऐसे में वेंटिलेटर अनिवार्य हो जाता है। लेकिन, 20.5 लाख आबादी वाले पटना में फिलवक्त महज 100 वेंटिलेटर मौजूद है। कोरोनावायरस से संक्रमित आधा दर्जन मरीज पटना में ही मिले हैं और चूंकि पटना राजधानी भी है, तो अन्य जिलों के कोरोना मरीज भी आपातकालीन स्थिति में पटना ही लाए जाते हैं। कोरोना मरीजों की बढ़ती संख्या और इसे समुदायों में फैलने की आशंका को देखते हुए इतने वेंटिलेटर नाकाफी हैं।

स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी ने कहा कि सरकारी अस्पतालों में 100 वेंटिलेटर के अलावा निजी अस्पतालों में 250 वेंटिलेटर हैं, आपातकालीन स्थिति में हम लोग निजी अस्पतालों के वेंटिलेटर का इस्तेमाल कर लेंगे। पटना के सिविल सर्जन राज किशोर चौधरी ने डाउन टू अर्थ को बताया कि बिहार सरकार ने 1,000 वेंटिलेटर मंगवाने का फैसला किया है।

ये वेंटिलेटर हर जिले में दिए जाएंगे। उम्मीद है कि पटना को भी कुछ वेंटिलेटर मिलेंगे। बिहार में कोरोनावायरस से संक्रमित व्यक्तियों के सैंपल की जांच के लिए भी एक ही सेंटर है, जहां अब तक लगभग 800 सैंपलों की जांच हुई है। आईजीआईएमएस, पीएमसीएच और दरभंगा मेडिकल कॉलेजों में भी टेस्ट लैब खोलने की योजना है, लेकिन इस योजना को अब तक अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका है।

राज्य के तमाम सरकारी अस्पतालों में कोरोना से संक्रमित मरीजों का इलाज करने वाले डॉक्टरों के लिए एन-95 मास्क और पीपीई किट उपलब्ध नहीं था। भागलपुर के जवाहर लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज व नालंदा मेडिकल कॉलेज व अस्पताल के जूनियर डॉक्टरों ने इसको लेकर अस्पताल प्रबंधन को पत्र भी लिखा था। पत्र लिखे जाने के हफ्ते भर बाद सरकार ने 12,000 पीपीई किट मंगाए हैं।

स्वास्थ्य विभाग के मुख्य सचिव संजय कुमार ने इसकी जानकारी देते हुए कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर पीपीई और एन-95 मास्क की सप्लाई कम हो रही है, इसलिए हमने मेडिकल कॉलेजों को कहा है कि इनका इस्तेमाल सावधानीपूर्वक करें।