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महामारी से तब भी पीड़ित थे, अब भी पीड़ित हैं : कांचा इलैया

जब भी कोई महामारी होती है तो कम प्रतिरक्षा और अन्य कारणों से गरीब सबसे अधिक शिकार होते हैं।

By Kundan Pandey

On: Wednesday 08 April 2020
 

जाने-माने लेखक, राजनीतिक विश्लेषक और कार्यकर्ता कांचा इलैया शेपहर्ड के दादा-दादी 1897 के बुबोनिक प्लेग के शिकार हुए थे। इस महामारी ने अविभाजित भारत की करीब 6 प्रतिशत आबादी को लील लिया था। कांचा को इससे जुड़ी कहानियां विरासत में मिलीं। कुंदन पांडे के साथ बातचीत में वह उनके संघर्षों और जीवित रहने की रणनीतियों को याद कर रहे हैं। ये संघर्ष और रणनीतियां ठीक वैसी ही हैं जो वर्तमान में कोविड-19 के प्रकोप में देखी जा रही हैं, चाहे वह पलायन हो अथवा सामाजिक दूरी। उनसे बातचीत के संपादित अंश-

आप 1897 के प्लेग की यादों के साए में बड़े हुए हैं। आपके दादा-दादी इसके गवाह थे। वर्तमान में हम कोविड-19 महामारी के चलते लॉकडाउन हैं। सामाजिक बदलाव के एक कथाकार के रूप में, आप दोनों घटनाओं को किस रूप में देखते हैं?

जब भी कोई महामारी होती है तो कम प्रतिरक्षा और अन्य कारणों से गरीब सबसे अधिक शिकार होते हैं। 1897 में जब अविभाजित भारत की आबादी 18 से 20 करोड़ थी, तब बुबोनिक प्लेग में 1 करोड़ लोग मारे गए। इनमें अधिकांश गरीब और शहरी झुग्गियों में रहने वाले लोग थे। आंकड़ों के अनुसार, इस महामारी ने 70 प्रतिशत लोगों को प्रभावित किया, 14 प्रतिशत बहुत बीमार हो गए और 6 प्रतिशत लोगों की मृत्यु हो गई। अगर कोविड-19 जन-जन तक पहुंचता है तो सबसे बड़ी समस्याएं भारत, इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीका, बांग्लादेश, पाकिस्तान और ऐसे अन्य देशों में होंगी। दोनों मामलों में रोग की उत्पत्ति चीन में हुई। 1897 में यह मुंबई और कोलकाता के बंदरगाहों के माध्यम से भारत पहुंचा। इस बार यह हवाई जहाज में अत्यधिक संपन्न व घूमने-फिरने वाले लोगों के साथ यहां पहुंचा है।

अपने परिवार के अनुभवों के आधार पर बताएं कि 1897 में प्लेग का प्रकोप कैसा था?

1897 में मेरे दादा-दादी वारंगल शहर में रहते थे,जो वर्तमान में तेलंगाना राज्य में है। वे चरवाहे थे। प्लेग से सबसे ज्यादा प्रभावित वे क्षेत्र थे जहां मेरे दादा-दादी जैसे गरीब लोग रहते थे। उस समय में हैदराबाद निजाम के अधीन एक रियासत थी जहां स्वास्थ्य की बुनियादी सुविनाएं नहीं थीं। मेरे दादा प्लेग से मर गए। उस वक्त खाने की कमी थी। चरवाहे, मछली पकड़ने वाले समुदाय, पशु अर्थव्यवस्था पर निर्भर दलित और वनों पर आश्रित परिवार भाग गए। मेरी दादी कांचा लिंगम्मा और अपना पति खो चुकी उनकी बड़ी बहन एली ईरामम्मा हरी घास और जल संसाधनों की तलाश में भेड़ों के झुंडों के साथ घने जंगलों में चली गईं। वे उन क्षेत्रों में बस गए जहां नदी अथवा पानी के टैंक थे। मेरे नाना भी उनके साथ थे। उस समय प्लेग ने पूरे देश को चपेट में ले लिया और यह काफी उग्र हो चुका था लेकिन इसे फैलने में लंबा समय लगा क्योंकि तब मानव से मानव संपर्क सीमित था और मनुष्यों की आबादी भी दूर-दूर थी।

बचाव की नई रणनीति कैसे विकसित हुई?

प्रवासन ने रोग से दूरी बनाए रखने में मदद की, लेकिन लोग एक-दूसरे की मदद करने के लिए सामाजिक रूप जुड़े हुए थे। लोगों ने सामुदायिक संगठनों का गठन किया। धीरे-धीरे इसने नई बस्तियों को जन्म दिया। मेरा परिवार और अन्य लोग जो अपने मूल निवास स्थान से बच गए थे, वे मांस और दूध के सहारे जीवित रहे। लोगों ने अपनी भेड़ें और बकरियां मारकर खा लीं। दलित और आदिवासी मुख्य रूप से बीफ और वन भोजन पर जीवित रहे। उस समय सब्जी अर्थव्यवस्था विकसित नहीं हुई थी। महिलाएं बच्चों और मवेशियों के साथ पेड़ों के नीचे रहती थीं। वे वन भोजन पकाती थीं और जंगलों से एकत्र करती थीं। पुरुष मवेशियों को चराने के लिए जंगल में जाते थे। मछुआरे दूध और मांस के बदले मछलियों की आपूर्ति करते थे। धीरे-धीरे प्रवासी समुदायों ने प्रचुर मात्रा में उपलब्ध भूमि पर खेती शुरू कर दी। इस तरह से उनकी पहुंच खाद्यान्नों और दालों तक हुई। मेरी पीढ़ी के समय तक (कांचा का जन्म 1952 में हुआ) चरवाहा समुदाय छोटे गांवों में बस गया था। मेरा जन्म पापैयापेटा गांव में हुआ था। यह मेरी दादी के परिवार और दोस्तों द्वारा स्थापित किया गया था।

फिर भी उस समय महामारी से निपटने के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं कैसी थीं?

निजाम के शासनकाल में स्वास्थ्य का कोई बुनियादी ढांचा नहीं था। यहां तक ​​कि ब्रिटिश पूर्व भारत में भी संगठित चिकित्सा प्रणाली नहीं थी। गरीब लोगों को पतंजलि प्रणाली, आयुर्वेद या होम्योपैथी जैसी पारंपरिक चिकित्सीय उपचार कभी नहीं दिए गए। इन समुदायों के उपचार के लिए पौधे और तरल दवाओं जैसी स्थानीय परंपराएं थीं। अंग्रेजों ने 1897 में महामारी रोग अधिनियम लागू किया ताकि महामारी का संचरण रोका जा सके और लोगों को अलग थलग किया जा सके। इस अधिनियम का अब भी उसी तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। कलेक्टरों को अतिरिक्त अधिकार दिए गए। उन्होंने मेडिकल टीमों को भी तैनात किया। लेकिन औपनिवेशिक काल में ब्राह्मण डॉक्टर बनना पसंद नहीं करते थे क्योंकि डॉक्टरों को सभी जातियों के लोगों स्पर्श करना पड़ता था। अंग्रेजों का आधिकारिक आदेश था कि डॉक्टरों को सभी की सेवा करनी है। इसलिए हमें उपनिवेशवाद का धन्यवाद करना चाहिए जिसने भारत में दवाइयों को जाति के बंधन से मुक्त कर दिया।