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कोविड-19 के चार महीने बीते, अब आगे क्या होगा?

पिछले चार महीने में पूरी दुनिया का परिदृश्य बदल चुका है

By Richard Mahapatra

On: Friday 01 May 2020
 
Photo: Flickr
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वैश्विक महामारी नोवल कोरोनावायरस बीमारी (कोविड-19) के चार महीने बीतने के बाद दुनिया चौराहे पर है। रोजाना नई जगहों पर हजारों लोगों का सार्स-कोविड-2 वायरस से संक्रमित होते दिखना जारी है, जिसके चलते और ज्यादा देश अपना लॉकडाउन बढ़ा रहे हैं।

दूसरी तरफ, पहले से ही छह हफ्ते से ज्यादा समय से लॉकडाउन में रह रहे लोग, जल्द से जल्द इससे बाहर निकलकर, आर्थिक गतिविधियों को फिर से शुरू करने की उम्मीद कर रहे हैं, जिनमें लाखों लोग पहले ही आजीविका गंवा चुके हैं।

इसके अलावा दुनिया के सामने एक और चुनौती खड़ी हो रही है: आर्थिक रूप से गतिशील शहरी क्षेत्रों के लोग पहले से बदहाली में घिरे अपने गांवों की ओर अभूतपूर्व पलायन कर रहे हैं।

वे अपने साथ कोविड-19 का खतरा भी अब तक अछूते रहे क्षेत्रों में ले जा रहे हैं। यह वैश्विक महामारी मई में अपने दूसरा मारक चेहरा दिखाएगी।

स्पेन ने 26 अप्रैल को 14 साल से कम उम्र के बच्चों को कड़े दिशानिर्देशों के साथ बाहर निकलने की इजाजत दी है।

वे एक दिन में एक घंटे के लिए बाहर निकल सकते हैं; उन्हें हर हाल में माता-पिता या अभिभावक के साथ होना होगा; उन्हें अपने घर के एक किलोमीटर दायरे के भीतर रहना होगा; और उन्हें सोशल डिस्टेंसिंग (शारीरिक दूरी) की व्यवस्था का पालन करना होगा।

वे सिर्फ टहल सकेंगे क्योंकि पार्क और खेल के मैदान बंद हैं। फिर भी, जैसा कि टीवी चैनल ने दिखाया उनके चेहरे पर मुस्कान थी। जैसा कि एक अभिभावक ने कहा, 40 दिनों के लॉकडाउन के बाद, चेहरे पर ताजा हवा लगने जैसी मामूली चीजें भी नया जन्म लग रही थीं।

पर्यटन के लिए मशहूर देश स्पेन में 30 अप्रैल 2020 तक 24,543 मौतें और 2,39,639 संक्रमण के मामले सामने आ चुके हैं। आखिरकार यह देश अब सामान्य स्थिति में लौट रहा है।

2 मई से, वयस्कों को बाहर टहलने और एक्सरसाइज करने की भी इजाजत होगी। महामारी विज्ञान का कर्व (वक्र) स्पेन में फ्लैट (समतल) हो गया है, और विशेषज्ञों की मानें तो जल्द ही स्क्वैश (खत्म) हो जाएगा।

महामारी में चार महीने गुजारने के बाद, संक्रमण और इंसानी मृत्यु दर के मामले में शीर्ष के पांचों देश लॉकडाउन को ढीला करने की राह पर हैं।

चीन के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका, जर्मनी, इटली और स्पेन में लोगों के लिए अब सामान्य आवागमन की अनुमति देने की योजना है, हालांकि बहुत सावधानी के साथ। कोविड-19 के मामलों की सबसे ज्यादा संख्या वाले अमेरिका ने राज्यों के लिए लॉकडाउन खत्म करने की योजनाओं की घोषणा की है।

जर्मनी में सरकार ने लॉकडाउन खत्म करने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए विचारकों, वैज्ञानिकों, इतिहासकारों, धर्मशास्त्रियों और कानून विशेषज्ञों के 26 सदस्यीय समूह का गठन किया है। लेकिन वह एक झटके में ऐसा करने को लेकर सावधान है।

इसके साथ ही, उसकी रणनीति लंबी लॉकडाउन के सामाजिक व आर्थिक प्रभावों का आकलन करने और यह जानने की भी है कि लोग इसे कैसे सहन करेंगे। भारत ने कम कर्मचारियों की मौजूदगी के साथ कुछ व्यावसायिक गतिविधियों की अनुमति दी है और केंद्र सरकार ने अपने दफ्तर खोले हैं। अंतर-राज्य प्रवासी कामगारों और छात्रों को उनके संबंधित राज्यों में भेजने की इजाजत दी गई है।

लॉकडाउन विरोधी प्रदर्शन

वैश्विक महामारी के साथ हमारी सहनशीलता ने निश्चित रूप से एक नया स्तर हासिल किया है। हालांकि संक्रमण के सर्वोच्च शिखर पर पहुंच चुकने की अच्छी खबर के बाद सरकारें लॉकडाउन खोलने की योजनाओं पर बात कर रही हैं, लेकिन आखिरकार ऐसे घटनाक्रम भी मौजूद हैं जो संकेत दे रहे हैं कि लॉकडाउन के बाद की अवधि में स्थितियां कितनी चुनौतीपूर्ण होंगी।

लॉकडाउन के खिलाफ दुनिया भर में विरोध प्रदर्शन हुए, जिनकी एक जैसी मांग थी कि जिंदगियों को बचाने के लिए कारोबार को बहाल करें। भारत में गुजरात और महाराष्ट्र में फंसे हुए प्रवासी कामगार खाने और बुनियादी सुविधाओं की अनुपलब्धता का विरोध करते हुए और अपने राज्यों में वापसी की मांग को लेकर आंदोलन को सड़कों पर ले आए।

इस समय तक उत्तर प्रदेश, ओडिशा, राजस्थान, बिहार और झारखंड जैसे प्रमुख राज्य ना सिर्फ कामगारों को वापस लाने, बल्कि गांवों में घुसने से पहले उनके वास्ते क्वारंटाइन सेंटर बनाने के लिए पहले से ही व्यापक योजनाएं बना चुके हैं।

सत्तारूढ़ दल को छोड़कर, ज्यादातर दूसरे राजनीतिक दलों ने लॉकडाउन को उठाने और आर्थिक गतिविधियों की इजाजत देने का समर्थन किया, हालांकि संक्रमण को रोकने के लिए जरूरी पाबंदियों के साथ।

संयुक्त राज्य अमेरिका में, कई राज्यों में लॉकडाउन-विरोधी प्रदर्शन हुए। बताया जाता है कि इन विरोध प्रदर्शनों को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा बढ़ावा दिया गया था, जो खुद भी राष्ट्रीय लॉकडाउन के सख्त विरोधी हैं।

29 अप्रैल को पोलैंड-जर्मन सीमा पर सैक्सोनी में, दूरस्थ स्थानों से आने वाले कामगारों ने छह हफ्ते से ज्यादा लंबे लॉकडाउन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। एक अनुमान के मुताबिक रोजाना तकरीबन 10,000 पोलैंड वासी पड़ोसी जर्मन शहरों में काम के लिए जाते हैं, लेकिन लॉकडाउन के चलते उन्हें काम से दूर रखा गया है। एक प्रदर्शनकारी के बैनर पर लिखा था, “हमें काम करने दो, हमें घर दो।”

दक्षिण अफ्रीका में वेस्ट केप इलाके और जोहान्सबर्ग में खाने को लेकर दंगों की खबर है। पुलिस को लॉकडाउन-विरोधी प्रदर्शनकारियों पर गोली चलानी पड़ी। फूड स्टोर्स पर भी धावा बोला गया।

मलावी में, लोगों ने आजीविका पूरी तरह खत्म हो जाने का हवाला देते हुए प्रदर्शन किया तो सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय लॉकडाउन खत्म कर दिया। यह पहला अफ्रीकी देश है जहां न्यायपालिका ने लॉकडाउन खत्म करने के लिए दखल दिया।

इस बीच, अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) ने आजीविका के नुकसान पर अपना ताजा अनुमान पेश किया है। इसमें कहा गया है कि संसार के कर्मचारियों में से आधे, जो अनौपचारिक कामगार हैं, तात्कालिक रूप से आजीविका गंवा देंगे।

इसका मतलब है कि दुनिया के दूसरे सबसे बड़ी आबादी वाले देश भारत की आबादी से भी ज्यादा 1.6 अरब अनौपचारिक कामगार बिना नौकरियों के होंगे। मार्च में लगभग 2 अरब अनौपचारिक कामगारों ने अपनी कमाई का लगभग 60 फीसद गंवा दिया।

इतनी कम आमदनी के साथ जो चंद दिनों की बुनियादी जरूरतों के लिए भी पूरी नहीं हो सकती, अप्रैल में उन्हें काम के आसन्न खात्मे और शून्य आय की स्थिति का सामना करना पड़ा।

“लाखों कामगारों के लिए, कोई आय नहीं होने का मतलब है- खाना नहीं, सुरक्षा नहीं और भविष्य नहीं। आईएलओ के महानिदेशक गाय राइडर कहते हैं, “दुनिया भर में लाखों कारोबार मुश्किल से सांस ले पा रहे हैं।” उनके पास कोई बचत नहीं है, उन्हें कहीं से उधार नहीं मिलेगा।यही कामकाजी दुनिया के असली चेहरे हैं। अगर हम अभी उनकी मदद नहीं करेंगे, तो वे पूरी तरह बर्बाद हो जाएंगे।

अफ्रीका और भारत 

एशिया और अफ्रीका में, कई देश पहले से ही आर्थिक मंदी से गुजर रहे थे या अन्य संकटों से अभी उबर ही रहे थे।

जैसे कि भारत में, आर्थिक विकास दर 11 वर्षों में सबसे कम थी, जबकि अनौपचारिक कामगारों में बेरोजगारी बहुत ज्यादा थी। अफ्रीका के मामले में, हालांकि यह महाद्वीप अपेक्षाकृत बेहतर आर्थिक विकास दर्ज कर रहा था, लेकिन इसके कई देश दबाव की हालत में थे।

पश्चिम अफ्रीकी देशों बर्कीनो फासो, माली और नाइजर के मामले को देखें। खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) ने चेतावनी दी है कि इन देशों में कम से कम 53 लाख लोगों को भूख के गंभीर संकट का सामना करना पड़ेगा।

चिंताजनक आंतरिक संघर्षों, असुरक्षा और खेती-किसानी की गतिविधियों को प्रभावित करने वाले कमजोर मॉनसून को इन देशों में अभूतपूर्व विस्थापन और खाद्य असुरक्षा के लिए जिम्मेदार माना जाता है।

पिछले हफ्ते जारी ग्लोबल फूड क्राइसिस रिपोर्ट में हिंसा, विस्थापन और कृषि व व्यापार में रुकावट की वजह से इन देशों में बड़े पैमाने पर खाद्य असुरक्षा की चेतावनी दी गई है। इन देशों में आंतरिक संघर्ष और हिंसा से लगभग 12 लाख लोग पहले ही विस्थापित हो चुके हैं।

संयुक्त राष्ट्र की इस संस्था ने भविष्यवाणी की है कि अगर असुरक्षा का मौजूदा स्तर कायम रहता है तो अगले तीन महीनों में और अधिक विस्थापन की आशंका है।

लेकिन समस्या सिर्फ इतनी ही नहीं है। ये तीनों देश भी कोविड-19 की चपेट में हैं। महामारी को रोकने के लिए इन्होंने सीमाओं को बंद करने और बाजारों में पाबंदी लगाने जैसे उपायों को अपनाया है।

इन उपायों ने पश्चिम अफ्रीका के चरागाह क्षेत्रों के साथ-साथ साथ, व्यवस्था बहाली की संयोजक के तौर काम करने वाली कूम्बा सो और खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) की गतिविधियों पर भी असर डाला है। अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को बंद करने से चरवाहों और मवेशियों की गतिविधियां भी सीमित हो गई हैं।

पिछले महीने की शुरुआत में फूड क्राइसिस प्रिवेंशन नेटवर्क ने कोविड-19 से जुड़े जोखिमों- जैसे कि खाद्य फसल उत्पादन के गिरने, चरवाहों पर असर और खाद्यान्न उपलब्धता की कमी के बारे में चिंता जताई थी।

भारत में 25 मार्च को राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन लागू होने के फौरन बाद, हमने हताश प्रवासी कामगारों को घर लौटते देखा था। अब, कम से कम 10 राज्यों ने अंदाजन 1.1 करोड़ प्रवासी कामगारों को वापस गांव लाने के लिए व्यापक रणनीति तैयार की है।

केंद्र सरकार और कई राज्यों ने राहत उपायों से लोगों को खाना खिलाया है, कुछ महीनों के लिए आजीविका की सुरक्षा सुनिश्चित की है और बहुत जरूरी होने पर तत्काल स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराई है।

भारत में रोजगार के लिए अंतर-राज्यीय प्रवासन बहुत महत्वपूर्ण है, यह कुल कार्य-संबंधी ग्रामीण-से-शहरी प्रवासन का 43 प्रतिशत हिस्सा है। अब ये प्रवासी कामगार एक से दूसरे राज्य के अलावा गांवों में भी जा रहे हैं। लेकिन, इन्हें उत्पादक आजीविका के लिए किस तरह समाहित किया जाएगा?

यह रबी फसल की कटाई और नई फसल की बुवाई का समय है। दोनों में ही ज्यादा मानव श्रम और ज्यादा पूंजी लगती है। लेकिन पहले से ही रोजगार सृजन और आमदनी के मामले में खेती बहुत दबाव में है।

मॉनसून के दौरान निर्माण क्षेत्र में आमतौर पर गतिविधियां सीमित में हो जाती हैं, जिस कारण यह रोजगार चाहने वाले ज्यादा लोगों को समाहित करने में सक्षम नहीं होता है। इसका मतलब यह है कि गांवों में काम की तलाश करने वाले ज्यादा लोग हैं, लेकिन उन्हें काम मिलने की ज्यादा उम्मीद नहीं है।

यह भारत के लिए एकदम अनोखा नजारा है, और इसी महामारी के कारण कई विकासशील देशों में जो लाखों लोग परेशानी के कारण गांव छोड़ गए थे, एक और परेशानी के कारण वापस लौट रहे हैं।

बीते दशकों में आए आर्थिक उछाल से पैदा हुई दौलत के बंटवारे और विकास में असमानता, दोनों ही हालात ने आर्थिक रूप से संकटग्रस्त लाखों लोगों को और गहरे संकट में धकेल दिया है।

इस महामारी में, दुनिया ने बहुत महंगी कीमत पर दो सबक सीखे हैं। पहली बात, हमने वैश्विक महामारी का अंदाजा लगा लिया, लेकिन इसे खत्म करने के लिए जरूरी स्तर की तैयारी करने की जहमत नहीं उठाई।

दूसरी बात, पहले कभी नहीं आई एक हेल्थ इमरजेंसी का सिर्फ डॉक्टरी नजरिये से सामना नहीं किया जा सकता। महामारी अब विकास की एक वैश्विक चुनौती है जिससे निपटने को भविष्य की रणनीति बनाने के लिए अभी इसका आकलन करना बाकी है।

इन दोनों सबक में, एक हकीकत छिपी है: विकास में असमानता एक बहुत बड़ा कारक है, जो किसी हेल्थ इमरजेंसी को दीर्घकालिक समस्या बना देने की ताकत रखता है।