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कोरोनावायरस की उत्पत्ति के बारे में क्या कहती है डब्लूएचओ की रिपोर्ट: क्या होगा जांच का अगला चरण

अगले चरण की जांच का मुख्य बिंदु यह देखना होगा कि क्या दिसंबर 2019 पहले भी यह वायरस चीन के साथ-साथ दुनिया के अन्य देशों में फैल चुका था

By Dominic Dwyer, Lalit Maurya

On: Thursday 01 April 2021
 

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने हाल ही में कोरोनोवायरस की उत्पत्ति से जुड़ी अपनी जांच रिपोर्ट जारी कर दी है। चीन के वुहान शहर गए डब्ल्यूएचओ के हालिया मिशन का मैं भी सदस्य के रूप में हिस्सा था। जिसने इस रिपोर्ट में भी योगदान दिया है।

यह रिपोर्ट हमारे निष्कर्षों को रेखांकित करती है: जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सार्स-कोव-2 वायरस, जो कोविड -19 का कारण बनता है, उसकी सबसे ज्यादा संभावना है कि वो चमगादड़ में पैदा हुआ था और फिर अभी तक अज्ञात मध्यस्थ जानवर के माध्यम से मनुष्यों में फैल गया। हमारे पास अब तक के मौजूदा सबूत बताते हैं कि यह वायरस संभवतः नवंबर 2019 के मध्य में चीन में फैल रहा था। साथ ही इस वायरस के प्रयोगशाला से फैलने की सम्भावना बहुत कम है।

हालांकि, इस रिपोर्ट के जारी होने से अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया और अन्य देशों की सरकारों ने इस बाबत अपनी चिंता व्यक्त की है कि क्या जांचकर्ताओं के पास सारे डेटा तक पहुंच थी। साथ ही इसपर उनके द्वारा एक साझा बयान भी जारी किया था जिसमें वर्तमान और भविष्य में जांच करते समय अधिक पारदर्शिता की बात कही थी।

क्या होगा आगे?

हमारी रिपोर्ट ने यह भी सिफारिश की है कि इस वायरस की उत्पत्ति के विषय में सम्पूर्ण जानकारी को सामने लाने के लिए क्या शोध करने की जरुरत है।

जांच के अगले चरण का मुख्य फोकस इस बात पर होगा कि जब दिसंबर 2019 में यह समस्या पहली बार सामने आई तो क्या उससे पहले भी न केवल चीन बल्कि अन्य देशों जैसे इटली और ईरान में भी क्या हुआ था। इससे इस बात का भी पूरी तरह पता चल सकता है कि क्या दिसंबर 2019 से पहले भी यह वायरस सार्स-कोव-2 फैल रहा था।

अभी के लिए यदि हम सिर्फ चीन को ही देखें तो 2019 के अंत में वुहान शहर में इन्फ्लूएंजा जैसी सांस की बीमारी फैली हुई थी। हमने डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के लिए 76,000 से अधिक मामलों में यह जानने का प्रयास किया था कि क्या यह जो बीमारी थी वो कोविड-19 ही थी। विभिन्न तकनीकों का उपयोग करके उन आंकड़ों का फिर से विश्लेषण करने के लिए पहले ही काम चल रहा है। यह देखने के लिए कि क्या हम पहले के किसी भी मामले में चूक तो नहीं गए हैं।

साथ ही यह देखने के लिए भी वार्ता चल रही है कि क्या 2019 में चीन में किए गए रक्तदान का विश्लेषण, यह देखने के लिए किया जा सकता है कि उनमें सार्स-कोव-2 के एंटीबॉडी मौजूद हैं या नहीं। इससे हमें पता चलेगा कि जिन लोगों ने रक्तदान किया था, क्या वे वायरस से संक्रमित थे। हालांकि इस प्रकार की जांच में समय लगता है।

फिर हम आणविक महामारी विज्ञान से क्या सीख सकते हैं, जो वायरस के आनुवंशिक बनावट और इसके प्रसार के बारे में बता सकता है। उदाहरण के लिए, अगर हमें सार्स-कोव-2 के शुरुआती नमूनों के आनुवांशिक अनुक्रम में बहुत भिन्नता मिलती है, तो यह बताता है कि यह कुछ समय पहले ही फैल चुका था। क्योंकि वायरस तब तक म्युटेंट नहीं होता है जब तक वो फैलता और संक्रमित नहीं करता है। हम मॉडलिंग का उपयोग यह जानने के लिए कर सकते हैं कि तीन या अधिक सप्ताह पहले तक क्या हुआ होगा।

हमें उन आणविक महामारी विज्ञान डेटा को वास्तविक नैदानिक डेटा से भी जोड़ना होगा। अब तक जिन आंकड़ों को अनुसंधान या विश्वविद्यालय प्रयोगशालाओं में और इलाज के समय रोगियों के आंकड़ों से काफी हद तक अलग कर लिया गया है। इससे हमें उन कनेक्शनों को जानने की जरुरत है, जो बता सके कि कौन से संक्रमण उससे संबंधित थे, और वो कितने समय में वापस चले गए।

इसके साथ ही न केवल वुहान बल्कि दुनिया के अन्य देशों में भी प्रयोगशालाओं में ऐसे बायोलॉजिकल नमूने हैं जिनके विश्लेषण की जरुरत है। इसलिए हमें कुछ जासूसी का काम भी करना होगा, जिससे हम उन्हें खोज सके और बीमारी के पैटर्न को समझ सके जो इसके मूल की गुत्थी को सुलझा सकता है। इन नमूनों के विषय में कोई सेंट्रल डेटाबेस नहीं है, जिससे यह पता चल सके कि इनमें कौन सी एंटीबॉडी या आनुवंशिक सामग्री हो सकती है।

अभी के लिए इतना पता है कि अमेरिका, फ्रांस और इटली में सार्स-कोव-2 से पॉजिटिव ब्लड डोनेशन के मामले सामने आए हैं। इसके अलावा स्पेन में सीवेज के परीक्षण में भी इसकी मौजूदगी का पता चला है। ये सांस की बीमारियों के शुरुआती प्रकोप वाले स्थान हैं जो हमें यह पता लगाने में मदद कर सकते हैं कि क्या सार्स-कोव-2 हमारी सोच से पहले ही फैल चुका था।

इसके साथ ही हमें वायरस को फैलने में फ्रोजन फूड की भूमिका पर भी और अधिक अध्ययन करने की जरुरत है। हमें यह लगता है कि इस वायरस को फैलने में 'कोल्ड चेन' का भी हाथ था। लेकिन इस बारे में अभी जानना है कि वायरस के फैलने में इसकी भूमिका कितनी बड़ी थी।

अंत में सार्स-कोव-2 या उससे संबंधित वायरस के बारे में जानने के लिए जानवरों और पर्यावरण की भी जांच की जा रही है। क्या हम उस पहले जानवर और वायरस के बारे में जान सकते हैं जिससे पहली बार यह वायरस म्युटेंट होकर सामने आया था। इसके लिए हमें चमगादड़ों को देखना होगा जो गुफाओं में रहते हैं यह दक्षिण पूर्व एशिया, मध्य एशिया और यूरोप में भी हो सकते हैं। इस तरह की जांच में उम्र लग सकती है।

क्या हम इंसान और चमगादड़ के बीच की उस कड़ी के रूप में जो जानवर था उसके बारे में जान सकते हैं। यदि हां तो वो कौन सा जानवर था और कहां होगा यह जानना एक मुश्किल काम है।

जरुरी है आपसी सहयोग

हमें इस काम के लिए आपसी सहयोग की जरुरत है। साथ ही इस बात से भी बचना है कि इस पूरे अभियान का राजनैतिकरण न हो। सरकारों को दोष देने के बजाय, हमें जांचकर्ताओं और देशों के बीच सहयोग और विश्वास को बढ़ावा देना चाहिए। यह न केवल इस महामारी के दौरान हमारी मदद करेगा साथ ही यह भविष्य में सामने आने वाली महामारियों से निपटने में भी सहायता करेगा। हम आपस में जितना अधिक सहयोग करेंगे, उतने ही अच्छे परिणाम प्राप्त होने की संभावना बढ़ेगी। हमें यह देखना होगा कि राजनीति इस सब के ऊपर हावी न हो।

डोमिनिक डायर, निदेशक, पब्लिक हेल्थ पैथोलॉजी, एनएसडब्ल्यू हेल्थ पैथोलॉजी, वेस्टमेड हॉस्पिटल और सिडनी विश्वविद्यालय 

यह लेख क्रिएटिव काॅमेंस लाइसेंस के तहत द कंवर्सेशन से लिया गया है