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एक ही परिवार के 6 लोगों की मौत की वजह बना आर्सेनिक

ग्राउंड रिपोर्ट: बिहार के कई इलाकों में आर्सेनिक का कहर है। इनमें से एक है, गंगा नदी के किनारे बसे सारण जिले का नवरसिया मोहल्ला

By Umesh Kumar Ray

On: Thursday 19 December 2019
 
बिहार के सारण जिले के नवरसिया मोहल्ले में आर्सेनिक की वजह से हुए कैंसर से गोलू के माता-पिता की मौत हो चुकी है। फोटो: उमेश कुमार राय
बिहार के सारण जिले के नवरसिया मोहल्ले में आर्सेनिक की वजह से हुए कैंसर से गोलू के माता-पिता की मौत हो चुकी है। फोटो: उमेश कुमार राय बिहार के सारण जिले के नवरसिया मोहल्ले में आर्सेनिक की वजह से हुए कैंसर से गोलू के माता-पिता की मौत हो चुकी है। फोटो: उमेश कुमार राय

गंगा नदी के किनारे बसे सारण जिले का नवरसिया मोहल्ला बिहार की राजधानी पटना से मुश्किल से 50 किलोमीटर भी दूर नहीं है, लेकिन बिहार सरकार इस बात से अनजान है कि इस मोहल्ले में आर्सेनिक ही यमराज बन कर आता है और उम्र से पहले लोगों की जिंदगी छीन लेता है। 

इसी मोहल्ले में 22 वर्षीय गोलू कुमार का पैतृक मकान है। गोलू के हाथ और पैर में छोटे-छोटे जख्म के निशान हैं। गोलू इन निशानों से वाकिफ हैं क्योंकि उनके पिता, मां, चाचा, चाची व अन्य रिश्तेदारों को भी ऐसे ही जख्म थे, जो बाद में कैंसर बन गए और उनकी मौत हो गई। 

गोलू जब 10 साल के थे, तभी उनके पैर में जख्म आना शुरू हो गया था। जख्म देख कर उन्हें मौत का डर सताने लगा था। वह कहते हैं, “चूंकि मेरे पिता और मां को भी ऐसे जख्म थे, तो मैं समझ गया था कि मुझे भी पानी के कारण ही ये रोग हुआ है। मेरे घर में कई लोगों की मौत आर्सेनिक के कैंसर से हुई थी, इसलिए मैं भी डर गया था।”

इस घर में आर्सेनिक के कैंसर से अब तक आधा दर्जन लोगों की मौत हो चुकी है। अभी घर में सबसे उम्रदराज सदस्य पिंटू कुमार हैं, जिनकी उम्र 29 साल है। उनके पिता गणेश राय की मौत वर्ष 2017 में महज 55 साल की उम्र में हो गई थी। वह कहते हैं, “पहले हमलोग नवरसिया में ही आधा किलोमीटर दक्षिण की तरफ रहते थे। 25 साल यहां आ गए। उसके बाद ही आर्सेनिक का असर बढ़ने लगा। पिताजी के हाथ पैर में बहुत जख्म थे। उन्हें हमलोग महावीर कैंसर अस्पताल ले गए, तो डॉक्टरों ने बताया कि आर्सेनिकयुक्त पानी पीने से उन्हें कैंसर हो गया है।”

इस परिवार में पहली मौत वर्ष 2001 में हुई थी। पिंटू कहते हैं, “ चूंकि उस वक्त हमलोगों को पता नहीं था कि पानी में आर्सेनिक होने से कैंसर होता है, इसलिए किसी को पता नहीं चला कि उनकी मौत कैसे हुई, लेकिन इसके बाद में हुई मौतों का कारण कैंसर बताया गया।”

इस घर में पिछले डेढ़ दशक में हुई मौतों को देखें, तो ज्यादातर की उम्र 50 के ऊपर नहीं पहुंची थी। पिंटू की मां चिंता देवी की मौत महज 40 साल की उम्र में हो गई थी। उनके शरीर में जख्म के गहरे निशान थे। उनकी चाची रामवती की मौत 9 साल पहले महज 40 साल की उम्र में हुई थी। उन्हें भी आर्सेनिक के कारण जानलेवा कैंसर हो गया था। पिंटू के चचेरे भाई राजकुमार राय की सांस आर्सेनिक ने 35 वर्ष की उम्र में ही छीन ली थी। उनकी एक अन्य चाची सरस्वती देवी की जब मौत हुई तो वह 45 साल की थीं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि इस मोहल्ले के अन्य घरों में भी आर्सेनिक के कैंसर से कई मौतें हो चुकी हैं, लेकिन सरकार की तरफ से न तो यहां पानी की जांच की गई न ही सरकार ने कोई डेटाबेस ही तैयार किया जिससे आर्सेनिक के असल प्रभाव का आकलन किया जाता। नतीजतन मौत के ये संगीन आंकड़े किसी सरकारी फाइल में दर्जन नहीं हो सके।

अलबत्ता, 14-15 साल पहले कुछ सरकारी डॉक्टर इस मोहल्ले में आए थे और उन्होंने बताया कि यहां का पानी पीने लायक नहीं है। लेकिन, सरकार की तरफ से साफ पानी मुहैया नहीं कराया गया। 

चूंकि यह परिवार खेती-बारी पर निर्भर है, इसलिए उनके लिए अपने बूते इलाज कराना और पानी खरीद कर पीना कठिन था। पिंटू कुमार ने कहा, “वर्ष 2017 में जब मेरे पिताजी की अकाल मौत हो गई, तब हमने तय कर लिया कि भले ही आर्थिक मुश्किल आए, लेकिन पानी खरीद कर ही पिएंगे।” वर्ष 2018 से एक साल तक पिंटू व उनके परिवार ने 7 किलोमीटर दूर पासवान चौक से मिनरल वाटर खरीद कर पिया। उन्होंने कहा, “पिछले 5-6 महीने से निजी कंपनी फिल्टर्ड वाटर पहुंचा रही है। इस पर हर महीने 900 रुपए खर्च हो रहे हैं। ये अतिरिक्त खर्च है, लेकिन अब आर्सेनिक का खौफ नहीं है।”