भारतीय वैज्ञानिकों ने विसरल लीशमैनियासिस बीमारी के उपचार का तरीका खोजा

यह बीमारी हर साल लाखों लोगों को प्रभावित करती है, जिससे यह मलेरिया के बाद मच्छर से होने वाली दूसरी सबसे आम घातक बीमारी है।

By Dayanidhi

On: Tuesday 17 August 2021
 
भारतीय वैज्ञानिकों ने विसरल लीशमैनियासिस बीमारी के उपचार का तरीका खोजा
फोटो : विकिमीडिया कॉमन्स, विसरल लीशमैनियासिस  फोटो : विकिमीडिया कॉमन्स, विसरल लीशमैनियासिस

भारतीय वैज्ञानिक ने उष्णकटिबंधीय इलाकों में होने वाली बीमारी जिसे विसरल लीशमैनियासिस कहते है, इसके उपचार का तरीका खोज निकाला है। साथ ही यह तरीका किफायती और रोगी के अनुकूल बताया गया है।

बीमारी विसरल लीशमैनियासिस (वीएल) एक जटिल संक्रामक रोग है जो मादा फ्लेबोटोमाइन सैंडफ्लाइज़ के काटने से फैलता है। यह उष्णकटिबंधीय इलाकों में होने वाली बीमारी है, जिससे हर साल लाखों लोग प्रभावित होते हैं। जिससे यह मलेरिया के बाद दूसरा सबसे आम परजीवी हत्यारा बन जाता है।

वैज्ञानिकों ने बताया कि रोग से निपटने का यह तरीका आसान है, इसमें चीरे-टांके लगाने की जरूरत नहीं होती है। यह तरीका विटामिन बी12 के साथ लेपित नैनो से संबंधित दवाओं पर आधारित है। यह थेरेपी बहुत प्रभावी है, इसकी प्रभावशीलता 90 फीसदी से अधिक बताई जा रही है।

वीएल की पारंपरिक उपचार चिकित्सा मुख्य रूप से दर्दनाक अंतःस्रावी है, जो लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहने, अधिक लागत लगने और संक्रमण के उच्च जोखिम सहित कई उपचार जटिलताएं इसमें शामिल हैं।

मौखिक रूप से दवाएं देने की पद्धति में बड़े पैमाने पर लाभ होते हैं जो इन बाधाओं को दूर करने में मदद कर सकता है। लेकिन मुंह संबंधी मार्गों के साथ अन्य चुनौतियां भी हैं, क्योंकि 90 फीसदी से अधिक मुंह से ली जाने वाली चिकित्सीय दवाओं में 2 फीसदी से कम जैव उपलब्धता और संभावित रूप से उच्च यकृत और गुर्दे के विषाक्त दुष्प्रभाव भी शामिल हैं।

भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) की एक स्वायत्त संस्थान, नैनो विज्ञान और प्रौद्योगिकी संस्थान (आईएनएसटी) से डॉ. श्याम लाल के नेतृत्व में इस विधि को विकसित किया गया। उनकी टीम ने प्राकृतिक आंतरिक विटामिन बी12 मार्ग का उपयोग करते हुए एक स्मार्ट और तेज नैनोकेरियर विधि विकसित की है। यह मानव शरीर में स्थिरता की चुनौतियों और नशीली दवाओं से जुड़ी विषाक्तता को कम कर सकता है।

उन्होंने एक बायोकंपैटिबल यानी जीवित ऊतक के लिए जो हानिकारक नहीं है, लिपिड नैनोकेरियर के भीतर रोग की विषाक्तता को कुशलता से ठीक किया। वैज्ञानिकों नें इसके दुष्प्रभावों को कम किया, जबकि प्राकृतिक आंतरिक विटामिन बी12 मार्ग ने मौखिक जैव उपलब्धता और एंटीलेशमैनियल चिकित्सीय प्रभावकारिता को 90 फीसदी से अधिक बढ़ाया। जैसा कि संबंधित पशु अध्ययनों में दिखाया गया है। शोध को डीएसटी-एसईआरबी अर्ली करियर रिसर्च अवार्ड के तहत इसका समर्थन किया गया था और इसे सामग्री विज्ञान और इंजीनियरिंग सी में प्रकाशित किया गया था।

टीम ने गंभीर रूप से विटामिन बी12 (वीबी 12) लेपित ठोस लिपिड नैनोकणों की प्रभावकारिता और गुणों का मूल्यांकन किया और साइटोटोक्सिसिटी से बचने और स्थिरता को बढ़ाने में उनके बाद के संभावित प्रभाव का मूल्यांकन किया। यहां बताते चलें कि साइटोटोक्सिसिटी कोशिकाओं का विषाक्त होने का गुण है।

उन्होंने मौखिक रूप से प्रशासित नैनोकणों के भौतिक-रासायनिक गुणों को बढ़ाने के लिए एक सहज प्रतिरक्षा रक्षा तंत्र की अवधारणा रखी, जो प्राकृतिक रूप से मौजूद म्यूकस बैरियर से धोए बिना आसानी से जठरांत्र संबंधी मार्ग के माध्यम से इसे ठीक कर सकती है।

ठोस लिपिड नैनोकणों की सतह पर विटामिन बी12 की सतह ने खराब घुलनशील दवाओं की स्थिरता और लक्षित वितरण को बढ़ाया, लक्ष्य से दूर की क्रियाओं के खतरे को कम करके चिकित्सीय दक्षता को भी बढ़ाया है।

शोध से पता चला कि विटामिन बी12 एक आवश्यक जीवन रक्षक सूक्ष्म पोषक तत्व है। यह उष्णकटिबंधीय इलाकों में होने वाले रोगों से जुड़े विषाक्त दुष्प्रभावों में सुधार करके शरीर में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके उपचार और रोकथाम के लिए यह एक नई और लाभकारी पूरक या सप्लीमेंट के रूप में भी काम करता है।

यह न केवल संक्रमण के खतरे को कम करता है बल्कि व्यक्ति की प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाता है। इसके अलावा, यह प्राकृतिक आंतरिक विटामिन बी12 मार्ग का उपयोग करके जैव उपलब्धता और लक्षित वितरण में भी सुधार करता है, जो मानव शरीर में मौजूद है और इसलिए यह संक्रमण फैलने के खिलाफ प्रतिरोध विकसित करता रहा है।