Agriculture

भू-जल संकट को बढ़ा सकते हैं अनियंत्रित इस्तेमाल वाले सोलर पंप

सीएसई की अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक सिंचाई के लिए इस्तेमाल होने वाले ऑफ ग्रिड सोलर पंप के जरिए देश में भू-जल संकट और बढ़ सकता है  

 
By Vivek Mishra
Last Updated: Wednesday 07 August 2019
Photo : Ankur Paliwal
Photo : Ankur Paliwal Photo : Ankur Paliwal

देश में अभी 24 हजार सिंचाई वाले सोलर पंप हैं। इनमें ज्यादातर ऑफ ग्रिड हैं। यानी जिनपर भू-जल निकासी के लिए किसी तरह की निगरानी और नियंत्रण नहीं है। चिंताजनक यह है कि बहुत जल्द ही इनकी संख्या दोगुनी हो सकती है। इससे खेती-किसानी के लिए न सिर्फ भू-जल पर निर्भरता और अधिक बढ़ सकती है बल्कि भू-जल का अनियंत्रित दोहन भी काफी बढ़ सकता है। प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाअभियान (पीएम कुसुम योजना) के जरिए ही 17 लाख 50 हजार ऑफ ग्रिड पंप और 10 लाख ग्रिड पंप लगाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके अलावा 10 गीगावाट छोटे सोलर पावर प्लांट भी लगाने का लक्ष्य रखा गया है। यह पंप लग जाएंगे लेकिन खतरे की घंटी बजा रहे भू-जल स्तर की निगरानी कैसे होगी, इसका कोई रोडमैप अभी तक नहीं है?

यह बातें सेंटर फॉर साइंस एंड एनवॉयरमेंट (सीएसई) की ताजा रिपोर्ट ‘सिल्वर बुलेट’ में कही गई हैं। रिपोर्ट में महाराष्ट्र के बुलधाना और उत्तर प्रदेश में पीलीभीत व आंध्र प्रदेश में विझियांग्राम के किसानों का सर्वे भी किया गया है। सिंचाई के लिए सबसे ज्यादा सोलर पंप इन्हीं तीन जिलों में अभी मौजूद हैं।

सीएसई में रीन्यूबल एनर्जी कार्यक्रम प्रबंधक मांडवी सिंह ने डाउन टू अर्थ से कहा कि पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में छूट (सब्सिडी) वाली बिजली के कारण भू-जल का जबरदस्त दोहन किया गया। इस बात के   पर्याप्त तथ्य हैं कि भू-जल संकट जैसे इसके भयानक दुष्परिणाम भी सामने आए। अगर ऑफ ग्रिड सोलर पंप की बात की जाए, जो कि संख्या में काफी ज्यादा हैं, न तो इनकी निगरानी और न ही इनके नियंत्रण का कोई प्रावधान किया गया है। ऐसे में यह भू-जल संकट के लिए बड़े कारक बन सकते हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक देश में 70 फीसदी सिंचित क्षेत्र के लिए करीब 90 फीसदी (228.3 अरब घन मीटर) भू-जल की निकासी की जाती है। वहीं, सिंचाई के लिए इस्तेमाल होने वाले कुल 70 फीसदी स्रोतों में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी ट्यूबवेल्स की है। इन ट्यूबवेल्स का इस्तेमाल इसलिए भी बढ़ा क्योंकि राज्यों में बिजली की दरें काफी छूट के साथ खेती-किसानी के लिए पहुंचाई गईं।

रिपोर्ट के मुताबिक खेती-किसानी के लिए कम दरों पर बिजली मुहैया कराने के कारण डिस्कॉम्स यानी बिजली वितरक कंपनियां घाटे में हैं। इनका घाटे का बोझ राज्यों को उठाना पड़ रहा है। यह प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। राज्यों पर सब्सिडी का बोझ बढ़ता जा रहा है। सब्सिडी का सबसे ज्यादा बोझ इस वक्त पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश पर है। जबकि इन राज्यों में कृषि राजस्व का हिस्सा बेहद कम है। अनुमान के मुताबिक प्रति वर्ष 50,000 करोड़ सब्सिडी का बोझ राज्यों को उठाना पड़ रहा है। हरियाणा और पंजाब सबसे ज्यादा राजस्व घाटे वाले राज्य हैं। इन दोनों राज्यों में सब्सिडी का बोझ सात हजार करोड़ रुपये प्रति वर्ष है।

रिपोर्ट के मुताबिक सिंचाई के लिए बढ़ती बिजली की मांग और बिजली की दर को कम रखने के लिए सब्सिडी के बोझ को देखते हुए सरकार सौर ऊर्जा वाले सिंचाई पंप के इस्तेमाल को प्रोत्साहित कर रही है ताकि कृषि क्षेत्र की ऊर्जा जरूरत को पूरा किया जा सके।

बीते पांच वर्षों में सौर ऊर्जा वाले पंप की संख्या में दोगुना बढ़त हुई है। मार्च 2014 में सौर ऊर्जा पंपों की संख्या 11,626 थी जो कि मार्च, 2019 में बढ़कर 24 हजार तक पहुंच गई है। केंद्र और राज्य की ओर से मिलाकर इसके लिए करीब 90 फीसदी सब्सिडी दी जा रही है। वहीं, सौर क्षेत्र में हो रही ग्रोथ के कारण भी सौर पंप के दाम घटे हैं। मसलन ए 5 हॉर्स पावर (एचपी) सौर पंप की कीमत 56,000 रुपये है जिसकी कीमत एक दशक पहले 1.5 लाख रुपये थी। खासतौर से छत्तीसगढ़, राजस्थान और आंध्र प्रदेश में सौर पंप सबसे ज्यादा हैं। इन तीन राज्यों के सौर पंपों की कुल हिस्सेदारी 60 फीसदी है। छत्तीसगढ़ और राजस्थान में सौर पंपों का ज्यादा इस्तेमाल पेयजल के लिए वहीं, आंध्र प्रदेश में ज्यादा सौर ऊर्जा का इस्तेमाल सब्सिडी का बोझ कम करने के लिए किया गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक कुसुम योजना में कई खामियां हैं, जिन्हें दुरुस्त करना होगा। मसलन, जहां पर ग्रिड की व्यवस्था नहीं है वहां डीजल पंपों को हटाकर 7.5 हॉर्स पावर वाले 17 लाख 50 हजार ऑफ ग्रिड सौर पंप पर निवेश की योजना है। यह दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना (डीडीयूजीजेवाई) के गांवों में 100 फीसदी बिजली पहुंचाने की योजना के विरुद्ध भी है। कुसुम योजना के तहत ऑफ ग्रिड सोलर पंप अतिरिक्त ऊर्जा पैदा होने पर उसका इस्तेमाल अन्य कृषि संबंधी गतिविधियों के लिए तभी इस्तेमाल किया जा सकता है जब अतिरिक्त मूल्य पर यूनिवर्सल सोलर पंप कंट्रोलर (यूएसपीसी) लगाया जाए। जबकि सरप्लस बिजली के लिए मिनी ग्रिड जैसी कोई व्यवस्था नहीं है। 

सौर ऊर्जा के लिए लघु और सीमांत किसानों के चयन को लेकर भी स्पष्टता नहीं है। जबकि कृषि में देश की 85 फीसदी हिस्सेदारी लघु और सीमांत किसानों की है। ऐसे में अभी सौर ऊर्जा पंप का इस्तेमाल ज्यादातर बड़े किसान ही कर रहे हैं। इसी तरह योजना व लाभ की जानकारी का स्तर कम होने और भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं के कारण भी लक्षित किसान तक यह योजना नहीं पहुंच रही।

वित्तीय सहायता के लिए भी कुसुम योजना में कोई तंत्र नहीं है। इस योजना के तहत 40 फीसदी किसान और 30 फीसदी बैंक के जरिए वित्त की जरूरत होती है। जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में वित्तीय संस्थाएं बेहतर नहीं हैं। कुसुम योजना में भू-जल दोहन को लेकर फिक्र नहीं है। इसके अलावा डिस्कॉम की प्रभावी भागीदारी भी सुनिश्चित नहीं की गई है।

महाराष्ट्र का बुलधाना

महाराष्ट्र के बुलधाना में सौर पंप पर काफी जोर है। वहां किसानों पर किए गए सर्वे और अध्ययन में कई अहम बातें भी सामने आई हैं। रिपोर्ट के मुताबिक सिंचाई में डीजल और बिजली के खर्चे कम होने से किसानों की कुल लागत कम हुई। सिंचाई के लिए डीजल पर निर्भर किसान प्रति एकड़ सालाना करीब 9,800 रुपये और बिजली के जरिए प्रति एकड़ सिंचाई में उन्हें सालाना 3,800 रुपये खर्च करने पड़ रहे थे। ऐसे किसानों को डीजल पर खर्च कर सालाना आय में 5,200 और बिजली पर खर्च कर सालाना आय में 3,400 रुपये की बढ़त होती थी। अब सोलर पंप के बाद वर्षा आधारित किसानों को प्रति एकड़ करीब 7,500 रुपये सालाना तक का फायदा हुआ है। हालांकि, इसके नुकसान भी हुए हैं। जैसे न सिर्फ सिंचाई के घंटे सालाना 795 के बजाए 627 हो गए। कम सिंचाई मतलब, उत्पादन कम होना और इसका असर आय पर भी पड़ता है। दूसरा पिछले 15 से 20 वर्षों में जल स्तर 50-100 फीट से गिरकर 100-300 फीट पर पहुंच गया। ज्यादा पानी वाली फसलें जैसे कपास, सोया, दालें आदि बढ़ गईं। 

रिपोर्ट में खास सुझाव

रिपोर्ट में ऑफ ग्रिड के बजाए ऑन ग्रिड सौर ऊर्जा पंपों पर जोर देने और लाभार्थियों की पहचान को दुरुस्त करने व उन्हें वित्तीय मदद दिलाने के साथ ही भू-जल दोहन की निकासी पर जोर देने की सिफारिश की गई है।

 

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