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चमोली आपदा: चिपको आंदोलन की पीढ़ी बेबस होकर गांवों से करना चाहती है पलायन

चमोली त्रासदी के बाद चिपको आंदोलन की पीढ़ी इन दिनों पहाड़ जैसे दुखों का सामना कर रही है। उसे लग रहा है कि हिमालयी पहाड़ में परियोजनाओं की आमद ने उनकी जिंदगी को सबसे ज्यादा जोखिम में डाला है।

By Ishan Kukreti, Vivek Mishra

On: Tuesday 23 February 2021
 
Photo : चमोली त्रासदी के बाद रैणी गांव में पीड़ित ग्रामीण : ईशान कुकरेती
Photo : चमोली त्रासदी के बाद रैणी गांव में पीड़ित ग्रामीण : ईशान कुकरेती   Photo : चमोली त्रासदी के बाद रैणी गांव में पीड़ित ग्रामीण : ईशान कुकरेती

“हमने पहले ही चेताया था कि करीब 3500 मीटर की ऊंचाई पर नंदादेवी राष्ट्रीय अभ्यारण्य के पास बांध (डैम) बनाना ठीक नहीं है। अदालतों और लगभग सभी समितियों के चक्कर लगाए गए, उन्हें भी चेताया गया। लेकिन किसी ने हमारी बातों पर ध्यान नहीं दिया। समिति पर समिति बनती रहीं और बांध का बनना भी जारी रहा। अब देखिए यह क्या हो गया।”   

उत्तराखंड के चमोली जिले में रैणी गांव के संग्राम सिंह बेहद गुस्से में लगभग चीखकर अपना दुख डाउन टू अर्थ से जताते हैं। 7 फरवरी, 2021 को ग्लेशियर का एक बड़ा टुकड़ा टूटने के बाद मलबे वाली भयावह बाढ़ जानलेवा बन गई। इस बाढ़ ने रैणी गांव को भी त्रासदी का शिकार बनाया जो 1974 के मशहूर ‘चिपको आंदोलन’ का जनक रहा है। इस आंदोलन में गौरा देवी की अगुवाई में 27 महिलाओं ने पेड़ों से चिपककर उन्हें जी-जान से बचाने की जुगत की थी। लेकिन अब गांव की तस्वीर उलट रही है। त्रासदियों से उगताकर यहां के ग्रामीण अब गांव छोड़कर कहीं और बसने की सोच रहे हैं।

चमोली त्रासदी के बाद रैणी गांव की तरफ जाने वाला मुख्य रास्ता इन दिनों काफी व्यस्त है। रास्ते में इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस (आईटीबीपी) के कम से कम 100 लोग, राष्ट्रीय आपदा राहत बल (एनडीआरएफ), राज्य आपदा राहत बल (एसडीआरएफ), स्थानीय पुलिस और सेना सब रेस्क्यू ऑपरेशन में लगे हैं। इसी रास्ते से करीब दो किलोमीटर ऊपर रैणी गांव में चिपको आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाली देवकी देवी राणा का घर है। डाउन टू अर्थ से बातचीत में उन्होंने कहा कि अब वह भी गांव को छोड़ देना चाहती हैं।

चमोली की रौद्र बाढ़ ने रास्ते में पड़ने वाले 13 मेगावाट की ऋषिगंगा पनबिजली परियोजना को पूरी तरह साफ कर दिया। परियोजना में काम करने वाले कई कर्मचारी अब भी गायब हैं। इनमें छह लोग रैणी गांव के ही थे और इनमें से एक देवकी देवी राणा का साला भी था। 1974 में चिपको आंदोलन के दौरान एक पेड़ को बचाने के लिए अपने जीवन को बिना सोचे दांव पर लगाने वाली देवकी अब 62 वर्ष की हैं और अपनी जिंदगी और परिवार की सुरक्षा को लेकर इतनी घबराई हुई हैं कि वह गांव छोड़ने को तैयार हैं।  

देवकी कहती हैं “मैंने ऐसी आपदा अपने जीवन में पहले कभी नहीं देखी। बाढ़ ने अपने रास्ते में आने वाली हर चीज को मिटा दिया। मैं बूढ़ी हो चुकी हैं और मेरे पास अब और समय नहीं है। बच्चों और पोतों के जीवन के लिए हम चाहते हैं कि सरकार हमारा पुनर्वास कर दे।“

इस तरह रैणी गांव में वह अकेली नहीं है। सिलसिलेवार कुछ घरों के बाद 68 वर्षीय आशा देवी राणा का भी घर है। पूरा दिन रोने और बिलखने के बाद उन्होंने डैम निर्माण के लिए अपनी जमीन बेचने का निर्णय लिया था। बाढ़ के बाद से उनकी छोटी बहन अमृता देवी भी लापता हैं।

आशा देवी डाउन टू अर्थ से कहती हैं “हम गरीब थे और हमें पैसों की जरुरत थी। लेकिन इस डैम के लिए हमने जो कीमत अदा की है वह बहुत ही ज्यादा है। इसने हमें कुछ नहीं दिया बल्कि इसने मेरी बहन को भी मुझसे छीन लिया। उन्होंने हमें बेवकूफ बनाया और कभी नहीं बताया कि इसमें हमें क्या मिलेगा।” वहीं, आशा के पति मेहताब सिंह राणा ने भी कहा कि अब यह गांव बिल्कुल महफूज नहीं रहा। पांच-छह महीने पहले डैम निर्माण के समय विस्फोट हुआ था जिससे मकान में दरारें आ गईं थीं और अब इस तरह की भयावह बाढ़ आई है। अगर हम यहां से नहीं गए तो यह गांव नदी में समा जाएगा और हम लोग भी इसके आगोश में चले जाएंगे।

चिपको आंदोलन की अगुवा रहीं गौरा देवी के बेटे चंद्र सिंह राणा ने कहा कि रैणी गांव अपने लालच की कीमत अदा कर रहा है। मेरी मां की पीढ़ी स्वार्थ रहित थी। हम उनकी तरह नहीं है। हम लालची हैं। हम पैसा और नौकरियां चाहते हैं। और आज हम इसके लिए हम यह भुगतान कर रहे हैं। हमारा गांव और ज्यादा रहने लायक नहीं रह गया है। हमारे अपने प्रियजन इसमें मर रहे हैं।

बहरहाल चमोली मे रेस्क्यू ऑपरेशन जारी हैं। अब तक 67 शव मिल चुके हैं। चमोली की डीएम स्वाति एस भदौरिया ने डाउन टू अर्थ से बताया कि रेस्क्यू ऑपरेशन कब तक चलेगा कह नहीं सकते। काफी जटिल मलबा एनटीपीसी के टनेल में है जिसे धीरे-धीरे निकाला जा रहा है।