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उत्तरप्रदेश के हमीरपुर, बांदा, महोबा और चित्रकूट में 174 स्टोन क्रेशर अवैध

एनजीटी ने 12 जुलाई 2019 को उत्तरप्रदेश के चार जिलों में अवैध स्टोन क्रेशर बंद करने को कहा था, लेकिन ये क्रेशर अब तक चल रहे हैं

By Bishan Papola

On: Tuesday 04 February 2020
 
Photo: Meeta Ahlawat
Photo: Meeta Ahlawat Photo: Meeta Ahlawat

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के आदेश के बाद उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने एक शपथ-पत्र देकर यह जानकारी दी है कि उत्तर-प्रदेश के चार जिलों हमीरपुर, बांदा, महोबा और चित्रकूट में 380 स्टोन क्रेशर हैं, जिनमें 206 स्टोन क्रेशर ही वैध रूप से चल रहे हैं। शेष 174 अवैध रूप से चल रहे हैं। जिनमें से कुछ बंद हो चुके हैं और कुछ को बंद करने के निर्देश दिए गए हैं। इन्हीं में से 68 इकाइयों को पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति के लिए नोटिस जारी किए गए हैं। एनजीटी ने सोसाइटी फॅार प्रोटेक्शन ऑफ इंन्वॉयरमेंट एंड बॉयोडायवरसिटी की याचिका पर सुनवाई के बाद उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को इस संबंध शपथ-पत्र दाखिल करने का आदेश दिया था। सोसाइटी फॅार प्रोटेक्शन ऑफ इंन्वॉयरमेंट एंड बॉयोडायवरसिटी ने अपनी याचिका में कहा था कि चारों जिलों में 100 से भी अधिक स्टोन क्रेशर अवैध रूप से चल रहे हैं, जिससे पर्यावरण को काफी नुकसान पहुंच रहा है। और प्लांटों के आसपास रहने वाले लोग सांस की गंभीर बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। 

 मानकों का पालन जरूरी

 पर्यावरण संरक्षण अधियिमम 1986 के तहत स्टोन क्रेशर प्लांट परिसर के मध्य स्थापित होना चाहिए और प्लांट के चारों तरफ कम-से-कम 15 फिट ऊंची दीवार होनी चाहिए। धूल के कणों को रोकने के लिए डस्ट एक्सट्रेक्टर्स और वॉटर स्प्रिकल्स विधि का पालन भी किया जा रहा हो। धूल न उड़े, इसके लिए प्लांट के अंदर पानी का छिड़काव करवाते रहना भी जरूरी होता है। ध्वनि प्रदूषण को रोकने के लिए स्टोन क्रेसिंग संयंत्र को बंद दीवारों वाले चैंबर में स्थापित किया जाना और प्लांट परिसर के अंदर 7 से 10 मीटर चौड़ी तीन कतार में चारों तरफ धूल के कण रोकने वाली पेड़ों की हरित पट्टी भी विकसित करना पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के तहत जरूरी होता है। याचिकाकर्ता के वकील सनी एंथनी के अनुसार इन चारों जिलों में चल रहे अवैध स्टोन क्रेशर मालिक इन मानकों को पूरा नहीं कर रहे थे। उन्होंने बताया कि याचिकाकर्ता ने इसकी शिकायत चारों जिलों के प्रशासन से की थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई, जिसकी वजह से एनजीटी में याचिका दाखिल की गई। 

 छह महीने के बाद भी बंद नहीं हुए सभी अवैध स्टोन क्रेशर

याचिका पर सुनवाई के बाद एनजीटी ने चारों जिलों के जिलाधिकारियों को 12 जुलाई 2019 को आदेश दिया था कि अवैध स्टोन क्रेशरों के खिलाफ कार्रवाई कर उन्हें बंद कराया जाए, लेकिन छह महीने बाद भी सभी अवैध स्टोन क्रेशर बंद नहीं हो पाए हैं। चारों जिलों के प्रशासन की इस कार्रवाई की जानकारी लेने के लिए ही एनजीटी ने 22 अगस्त 2019 को उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को वैध और अवैध रूप से चल रहे स्टोन क्रेशर की जानकारी देने का आदेश दिया था। अब बोर्ड ने इस जानकारी से संबंधित शपथ-पत्र एनजीटी में दाखिल किया है। जस्टिस राघवेंद्र एस राठौर ने इस शपथ-पत्र के आधार पर एक बार फिर चारों जिलों के जिलाधिकारियों को यह सुनिश्चित करने का आदेश दिया है कि इन जिलों में कोई भी अवैध स्टोन क्रेशर न चले। और बोर्ड की टीम समय-समय पर निरीक्षण करे, जिससे अवैध स्टोन क्रेशर के खिलाफ जमीनी सच्चाई मिलती रहे। और जिन स्टोन क्रेशर मालिकों को पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति का आदेश जारी किया गया है, उनसे निर्धारित समय में क्षतिपूर्ति की धनराशि जमा करवाई जाए, ऐसा नहीं करने पर क्षतिपूर्ति की धनराशि को भूमि राजस्व के बकाया के रूप में वसूलने का आदेश दिया है।