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उत्तराखंड की आबोहवा भी हो रही प्रदूषित

बढ़ते वाहनों और स्थानीय कारणों ने उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य की हवा को भी दूषित कर दिया है

By Varsha Singh

On: Saturday 30 November 2019
 

हिमालयी राज्यों के लिए भी वायु प्रदूषण चिंता की वजह बनते जा रहे हैं। उत्तराखंड के मैदानी जिलों की आबोहवा वाहनों से निकलने वाले धुएं की वजह से खराब हो रही है तो पर्वतीय जिलों में कूड़ा जलाने और जंगल की आग जैसी चिंताएं हैं, जो हवा में कार्बन और अन्य जहरीली गैसों की मात्रा बढ़ा रही हैं। इसके साथ ही पर्वतीय घाटियों की घुमावदार संरचना भी वायु प्रदूषण के दुष्प्रभाव को बढ़ा देती है।

 उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने वायु प्रदूषण को लेकर इस वर्ष अप्रैल तक के आंकड़े जारी किये हैं। हवा की गुणवत्ता की जांच के लिए बोर्ड के पास देहरादून, ऋषिकेश, हरिद्वार, हल्द्वानी, काशीपुर और रुद्रपुर में ही मॉनीटरिंग की व्यवस्था है। पर्वतीय जिलों में हवा की गुणवत्ता की जांच की अब तक कोई व्यवस्था ही नहीं है। बोर्ड के मुताबिक देहरादून के घंटाघर क्षेत्र में पीएम-10 का स्तर जनवरी में 165.25, फरवरी में 182.59, मार्च में 159.28 और अप्रैल के महीने में 171.59 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर रिकॉर्ड किया गया। जो कि एयर क्वालिटी इंडेक्स के मुताबिक सेहत के लिए हानिकारक है। देहरादून के ही आईएसबीटी क्षेत्र में पीएम-10 की मात्रा जनवरी में सबसे अधिक 243.12 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर रिकॉर्ड की गई। इंडेक्स के मुताबिक ये सेहत के लिए अति हानिकार की श्रेणी में आती है।

प्रदूषण के मामले में देहरादून राज्य का सबसे प्रदूषित जिला है। इसके बाद उधमसिंहनगर के रुद्रपुर और काशीपुर का स्थान है। रुद्रपुर में सरकारी अस्पताल के पास अप्रैल महीने में पीएम-10 का स्तर 126.69 था तो एसपीएम का स्तर 224.97 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर रिकॉर्ड किया गया। जबकि एयर क्वालिटी इंडेक्स कहता है कि हवा में 0-50 तक ही पीएम-10 के स्तर को अच्छा कहा जा सकता है। इस लिहाज से देहरादून की हवा पांच गुना अधिक खराब है। जबकि सेंट्रल पल्यूशन कंट्रोल बोर्ड ने दिल्ली के आनंदविहार क्षेत्र में हवा में पीएम 10 की मात्रा औसतन 177 और अधिकतम 284 आंकी है। इस लिहाज से उत्तराखंड के मैदानी जिलों में हवा की स्थिति भी दिल्ली के नजदीक पहुंच रही है। जो वायु प्रदूषण से बुरी तरह प्रभावित है।

राज्य के मैदानी जिलों में बढ़ते प्रदूषण के पीछे सबसे अधिक जिम्मेदार सड़कों पर बढ़ती गाड़ियों को माना जा रहा है। राज्य परिवहन विभाग के मुताबिक वर्ष 2000-01 के बीच राज्य में 27,396 पंजीकृत दो-पहिया वाहन थे और 4,274 कार-जीप श्रेणी के वाहन पंजीकृत थे। वर्ष 2011-12 तक दो पहिया वाहनों की संख्या 9,81,828 हो गई और कार-जीप श्रेणी के वाहन की संख्या 2,05,745 हो गई। इससे आगे दिसंबर 2017 तक राज्य में ऑन रोड वाहनों की संख्या 24.52 लाख हो गई थी। ऑन रोड वाहनों में90 फीसद से ज्यादा निजी वाहन हैं।

इसके साथ ही, हर रोज सैंकड़ों की संख्या में पर्यटक राज्य में चारधाम यात्रा समेत अन्य पर्यटक स्थलों पर आते हैं। पर्यटक जिन गाड़ियों में पर्वतीय अंचलों की यात्रा पर आते हैं, उनसे निकलने वाले धुएं का भी हिमालय पर असर पड़ रहा है। इस वर्ष चार धाम यात्रा के लिए 27 मई तक 7,78,459 श्रद्धालु आ चुके हैं।

राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से साइंटिफिक ऑफिसर पद से सेवानिवृत्त हुए वीके जोशी कहते हैं राज्य में गाड़ियों से निकलने वाला धुआं ही हवा को प्रदूषित करने के लिहाज से सबसे अधिक जिम्मेदार है। इसके अलावा पर्वतीय घाटियों की भौगोलिक स्थितियां भी प्रदूषण की मुश्किल को बढ़ा देती हैं। जैसे दून घाटी टैक्टॉनिक वैली है, जो थर्मल इनवर्जन सेक्टर होता है। दून घाटी से उपर मसूरी की पहाड़ियां हवा की ठंडी सतह बनाती हैं, जबकि नीचे की सतह गर्म होती है। ठंडी लेयर नीचे के धुएं और धूल-धक्कड़ को निकलने नहीं देती और वो हवा में सर्कुलेट होती रहती है, जिससे वायु प्रदूषण का दुष्प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। इसी को थर्मल इनवर्जन सेक्टर कहते हैं।

देहरादून में गति फाउंडेशन के अनूप नौटियाल कहते हैं कि वायु प्रदूषण से निपटने के लिए हमें सार्वजनिक परिवहन को बेहतर बनाने की आवश्यकता है। हमें सार्वजनिक परिवहन बेहतर बनाने के उपाय करने होंगे। इसके साथ ही वे कचरा जलाए जाने पर अंकुश लगाने पर भी जोर देते हैं। पहाड़ों में अब भी कूड़े को जलाने की परंपरा है। अनूप के मुताबिक प्रदूषित हवा की तीसरी बड़ी वजह कन्सट्रक्शन से जुड़ी है। लगातार निर्माण कार्य के चलते हवा में धूल की मात्रा बढ़ जाती है। जो हवा और लोगों की सेहत को नुकसान पहुंचाती है।

इसके अलावा पहाड़ों में जंगल की आग के चलते उठने वाला धुआं भी वायु प्रदूषण की बड़ी वजहों में से एक है। हालांकि फायर सीजन के दौरान मुख्यत: फरवरी से जून के बीच ही जंगल की आग का खतरा रहता है। लेकिन इस आग से हवा में घुलता कार्बन लोगों की सांसों में भी उतरता है। जंगल के नजदीक रहने वाले लोगों को सांस लेने में दिक्कत होती है। स्थिति ऐसी हो जाती है कि धुएं के चलते पहाड़ तक दिखाई नहीं देते। इस वर्ष फायर सीजन में 2607.38 हेक्टेयर जंगल आग से प्रभावित हुए। जिससे करीब 48 लाख रुपये का नुकसान हुआ। इसके साथ ही कल्पना की जा सकती है कि इतने बड़े क्षेत्र में लगी आग और उससे उठे धुएं ने पर्यावरण को कितना नुकसान पहुंचाया होगा।

हेस्को संस्था के संस्थापक अनिल जोशी कहते हैं कि हमें विकास का ग्रीम रोड मैप बनाना होगा। इकोनॉमी को इकोलॉजी से भी जोड़ना होगा, तभी हम धरती-हवा-पानी की सेहत सुधार सकेंगे।