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87 घंटे के बाद भी दिल्ली में क्यों नहीं लागू हुई इमरजेंसी, क्या है सीपीसीबी का गणित

दिल्ली के लोगों को चार दिन से प्रदूषण के गंभीर स्तर का सामना करना पड़ रहा है, लेकिन अपने अजीबो-गरीब नियमों के कारण केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड आपातकाल घोषित नहीं कर रहा है। जानिए, क्यों?

By Raju Sajwan

On: Thursday 31 October 2019
 
Photo: @Tat_Tvam_Asi_/Twitter

दिवाली के बाद से दिल्ली-एनसीआर की हवा की गुणवत्ता में पीएम2.5 की मात्रा गंभीर (सीवियर) स्तर पर बनी हुई है, लेकिन केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) इसे पर्यावरणीय  आपातकाल (एनवायरमेंटल इमरजेंसी) की स्थिति नहीं मानता है, क्योंकि सीपीसीबी का अपना “गणित” है। इस गणित की वजह से अब तक दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण रोकने के लिए कड़े कदम नहीं उठाए जा सके हैं।

सीपीसीबी की वेबसाइट बताती है कि 28 अक्टूबर की सुबह 3 बजे दिल्ली एनसीआर की हवा में पीएम2.5 की मात्रा 250 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर से ऊपर पहुंच गई थी। इसे सीवियर कैटेगिरी माना जाता है। इस वेबसाइट पर इसके बाद से लगातार पीएम2.5 की मात्रा सीवियर बनी हुई है। बल्कि 31 अक्टूबर को शाम छह बजे यह स्तर 281.6 माइक्रोग्राम तक पहुंच गया। यानी कि लगभग 87 घंटे से दिल्ली-एनसीआर के लोग सीवियर कैटेगिरी के वायु प्रदूषण का शिकार हो रहे हैं। बावजूद इसके इमरजेंसी लागू नहीं की गई।

आइए, समझते हैं कि आखिर यह इमरमजेंसी क्या है और इससे वायु प्रदूषण पर क्या फर्क पड़ेगा। दरअसल, दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में एक कमेटी काम करती है, इसे एनवायरमेंट पोल्यूशन (प्रिवेंशन एंड कंट्रोल) अथॉरिटी (इप्का) कहा जाता है। सीपीसीबी के नियमों के मुताबिक, जब दिल्ली एनसीआर में पीएम2.5 की मात्रा 300 माइक्रोग्राम और पीएम10 की मात्रा 500 माइक्रोग्राम तक पहुंच जाती है तो उसकी जानकारी इप्का को दी जाती है और इप्का दिल्ली-एनसीआर में इमरजेंसी लागू कर देती है।

इमरजेंसी लागू होने के बाद दिल्ली में ट्रकों का प्रवेश रोक दिया जाता है। सभी कंस्ट्रक्शन की गतिविधियां भी रोक दी जाती हैं। ऑड-इवन स्कीम के तहत निजी गाड़ियों को चलाया जाता है। इतना ही नहीं, टास्क फोर्स की बैठक बुलाई जाती है, जिसमें कई कदम उठाए जा सकते हैं, जैसे कि स्कूलों या प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों-कारखानों को बंद कराया जा सकता है।

अब सवाल उठता है कि क्या सीपीसीबी का यह गणित सही है, जब दिल्ली दो दिन से गैस चैंबर जैसी हालत में है तो ये आपातकालीन कदम नहीं उठाए जाने चाहिए। दरअसल, पहले यह जान लेते हैं कि आखिर सीपीसीबी किस आधार पर तय करता है कि पीएम2.5 की मात्रा क्या है?

दरअसल, सीपीसीबी ने दिल्ली-एनसीआर में कुल 70 मॉनिटरिंग स्टेशन बनाए हुए हैं, जहां से रियल टाइम प्रदूषण का स्तर मॉनिटर होता है और यह डाटा सीपीसीबी के कंट्रोल रूम में पहुंच जाता है। यह कंट्रोल रूम एक औसत निकाल कर अपनी वेबसाइट पर पीएम2.5 और पीएम10 का डाटा हर घंटे में अपलोड किया जाता है और इस कंट्रोल रूम से 24 घंटे का औसत निकाल कर सीपीसीबी को भेजा जाता है। जहां से शाम चार बजे सीपीसीबी द्वारा दिन भर का एक्यूआई यानी एयर क्वालिटी इंडेक्स जारी किया जाता है।

लेकिन क्या इस तरह से औसत निकाल कर डाटा जारी करना सही है? इस बारे में सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) के प्रोग्राम मैनेजर अविकल सोमवंशी बताते हैं कि प्रदूषण स्तर का औसत निकाल कर डाटा जारी करने की प्रणाली कई देशों में है, लेकिन सीपीसीबी जो डाटा जारी करता है, उसमें यह नहीं बताया गया है कि इसमें कितने मॉनिटरिंग स्टेशनों को शामिल किया गया है। जैसे कि, एनसीआर में दिल्ली से दूर के कई ऐसे शहर भी आते हैं, जहां हवा की गुणवत्ता बेहतर रहती है, जबकि कई ऐसे इलाके शामिल हैं, जहां हवा की गुणवत्ता सामान्य से कई गुणा अधिक खराब रहती है। यदि इन सभी स्टेशनों का रियल टाइम डाटा को इकट्ठा कर औसत निकाल जाता है तो पूरी तरह सही नहीं होगा।

अविकल समझाते हुए कहते हैं कि अमेरिका में यूनाइटेड स्टेट एनवायरमेंटल प्रोटेक्शन एजेंसी (यूएसईपीए) द्वारा जो डाटा जारी किया जाता है, उसमें उस इलाके को आधार बनाया जाता है, जहां सबसे अधिक प्रदूषण होता है और जो भी फैसले लिए जाते हैं, उसी आंकड़े के आधार पर लिए जाते हैं। यूएसईपीए के नियमों में यह कहा जाता है कि यदि अलग-अलग इलाकों को मिलाकर एक औसत डाटा निकाला जाता है तो उस इलाके के साथ नाइंसाफी होगी, जहां तत्काल प्रदूषण रोके जाने की जरूरत है। वैसे भी, प्रदूषण का स्तर जिन इलाकों में अधिक होता है, वह ज्यादातर उपेक्षित क्षेत्र होते हैं और वहां रहने वाले लोग आर्थिक तौर पर कमजोर होते हैं।

अविकल कहते हैं कि सीपीसीबी के मॉनिटरिंग स्टेशन की लोकेशन भी सही नहीं है। जैसे कि, औद्योगिक शहर और घनी आबादी वाले शहर फरीदाबाद में एक स्टेशन है। इसी तरह पूर्वी दिल्ली में केवल चार स्टेशन हैं, जबकि लोधी रोड और जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम  में अलग-अलग स्टेशन हैं, जो कि मात्र दो किलोमीटर के दायरे में हैं।  ऐसे में, इन स्टेशनों से मिलने वाले प्रदूषण स्तर के आधार पर एक औसत निकालना ठीक नहीं है।  कई स्टेशन ऐसे हैं, जहां प्रदूषण का स्तर आपातकाल की स्थिति में पहुंच चुका है, लेकिन वहां आपातकालीन कदम इसलिए नहीं उठाए गए, क्योंकि सीपीसीबी के औसत आंकड़ों के मुताबिक अभी आपातकाल की स्थिति नहीं आई है।

अविकल कहते हैं कि इसके अलावा सीपीसीबी को इस पर भी पुनर्विचार करना चाहिए कि जब पीएम2.5 का स्तर लगातार कई घंटे तक सीवियर लेवल पर है, लेकिन 300 माइक्रोग्राम तक नहीं पहुंच रहा है तो भी एक निर्धारित समय के बाद आपातकाल की घोषणा कर देनी चाहिए।