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कागजों में बंद, जमीन पर चालू प्रदूषण फैलानी वाली इंडस्ट्री

हम बंद दरवाजे से मशीनों की स्पष्ट आवाज सुन सकते थे और नीली डाई को नाली में गिरते हुए भी देख सकते थे। लेकिन यह इकाई आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक बंद थी 

By Sunita Narain

On: Saturday 30 November 2019

तारिक अजीज / सीएसई

हाल ही में मैंने शिव विहार का दौरा किया। पूर्वी दिल्ली की वह तथाकथित अवैध कॉलोनी जहां अवैध जींस रंगाई की इकाइयां थीं, जिनके बारे में मैंने कई महीने पहले भी लिखा था। मेरी यात्रा “अवैध” कारखानों की स्थिति की जांच करने और यह देखने के लिए थी कि क्या हमें परीक्षण के लिए पानी के नमूने एकत्र करने की आवश्यकता है। आपको शायद याद हो कि मैंने समझाया था कि मास्टरप्लान के अनुसार “अनधिकृत/ नियमित या अनियमित कॉलोनियों” में औद्योगिक गतिविधियां प्रतिबंधित हैं। घरेलू उद्योगों की एक खास सूची है जिनके संचालन की अनुमति प्राप्त है। लेकिन कपड़ों की रंगाई के लिए रसायनों का उपयोग करना उस सूची में नहीं है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने पहले ही इन कारखानों पर शिकंजा कस दिया था। केंद्रीय जांच ब्यूरो को उन अधिकारियों की शिनाख्त करने का निर्देश दिया गया था, जिन्होंने इन्हें खोलने की अनुमति दी थी।

जैसा कि उम्मीद थी, इस कदम से परिणाम भी मिले थे। मुझे बताया तो गया ही था और मैंने स्वयं भी एक के बाद एक कारखाने (या एक के बाद एक घर) देखे, जिन्हें उन रंगाई इकाई के रूप में सूचीबद्ध किया गया था और जो वास्तव में बंद थे। कई दरवाजों पर सील लगी थी, जो एक आधिकारिक बंदी का संकेत था। मैंने सोचा सब अच्छा है। लेकिन फिर मैंने नीचे नाले में देखा। वह नीले रंग से भरा था, हमारी जींस की रंग जैसा। मैंने कहा, चलिए इस नाले का स्रोत पता करें। पता लगाएं कि रंग कहां से आ रहा है। इसलिए, हम आबादी से भरी संकरी गलियों से गुजरे। हम एक बंद दरवाजे पर आए जहां मशीनों की स्पष्ट आवाज सुन सकते थे और नीली डाई को नाली में गिरते हुए भी देख सकते थे। लेकिन यह इकाई आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक बंद थी।

मुझे बताया गया कि दिल्ली में कारखाना बंद था। ऐसी स्थिति में यह कचरा कहां से आ रहा है? यह उत्तर प्रदेश (यूपी) है। दोनों राज्यों की गलियां यहां मिलती हैं। फैक्ट्री का दरवाजा दिल्ली में खुलता था। अब फैक्ट्री अपने पिछले दरवाजे का उपयोग करती है और यह यूपी में खुलता है। फिर दूसरी फैक्ट्री देखी, फिर वही मामला। इसका राज उस समय खुला, जब अदालत ने शिकंजा कसा तो कारखाने आधिकारिक तौर पर बंद कर दिए गए और फिर उन्हें स्थानांतरित कर दिया गया। लेकिन ज्यादा दूर नहीं, बस पड़ोस में ही। लेकिन हां, वे दिल्ली से यूपी जरूर चले गए। एक दूसरा राज्य और दूसरे न्यायालय का क्षेत्राधिकार। लेकिन सच्चाई यह है कि कारखाने अब भी अपने अपशिष्ट को उसी नाले में प्रवाहित कर रहे हैं जो यमुना से जुड़ा हुआ है। यहां कोई बदलाव नहीं आया है। ये अपशिष्ट अब भी भूजल को दूषित करेंगे और आम जनजीवन को प्रभावित करेंगे।

क्या यह हमारे वैश्वीकृत जीवन की कहानी नहीं है? दरअसल जैसे-जैसे पर्यावरणीय नियमों की लागत बढ़ी, उत्पादन की लागत भी लगातार बढ़ती गई क्योंकि दुनिया का एक हिस्सा समृद्ध हो चला था। यह समृद्ध दुनिया अपने पानी और हवा की गुणवत्ता की चिंता करने में सक्षम थी। इसकी स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं का समाधान जरूरी था। इसलिए सरकारों ने प्रदूषण पर नकेल कस दी। इसके साथ ही प्रदूषण ने जगह बदल ली। यह चीन, इंडोनेशिया, बांग्लादेश या भारत जैसे देशों में भेज दिया गया। हमारा तुलनात्मक लाभ यह था कि हम लागत को कम रख सकते थे, श्रम और पर्यावरण संबंधी चिंताओं को नजरअंदाज कर दिया गया था। इसके बाद वैश्विक उपभोक्ताओं ने तीसरी दुनिया के कारखानों का विरोध शुरू किया। श्रमिकों के साथ हो रहा दुर्व्यवहार उनकी सहनशक्ति से बाहर था। इसके साथ ही हमारे देश में भी इन पर शिकंजा कसा जहां कारखाने स्थानांतरित हुए थे और प्रदूषण फैलाना भी शुरू कर दिया था।

इस बार इस कदम के पीछे पर्यावरण सम्बन्धी चिंताएं शामिल थीं, शिव विहार के पूर्ववर्ती इलाकों की तरह। उदाहरण के लिए, दिल्ली में सर्वोच्च न्यायालय ने लगभग 10 साल पहले सभी प्रदूषणकारी उद्योगों पर प्रतिबंध लगा दिया था। इसके फलस्वरूप ये कारखाने भूमिगत हो गए। वे कानूनी क्षेत्रों से अवैध क्षेत्रों में चले गए, जैसे शिव विहार। इन क्षेत्रों में, प्रदूषण नियामक काम नहीं कर सकता है। तर्क सरल है। “ये कारखाने मौजूद नहीं हैं, क्योंकि वे अवैध हैं। अगर हम उन्हें नोटिस देते हैं तो हमें पहले उन्हें कानूनी रूप देना होगा, जो हम नहीं कर सकते। तर्क सही है, लेकिन प्रदूषण के लिए घातक। अब यहां से कहां जाएं हम? शिव विहार यूपी की एक अनधिकृत और अनियमित कॉलोनी, शांति नगर में जाकर मिल गया है। यहां से अदालत तो दूर है ही, नियामकों की नजर भी यहां नहीं पड़ती। कारखानों में मुझे गरीब प्रवासी मजदूर विकट परिस्थितियों में काम करते हुए मिले। नंगे हाथों से रसायनों को संभालना व किसी भी अन्य लोगों के मुकाबले अधिक समय तक विषाक्त पदार्थों के संपर्क में रहना। लेकिन वे गरीब हैं। वे ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि उनके पास कोई विकल्प नहीं है।

विकल्प हमारे पास है। हमें विनाश के इस चक्र को बदलना होगा, जहां हम अपनी खपत को उन गरीब क्षेत्रों में स्थानांतरित कर देते हैं, जहां प्रदूषण कोई मायने नहीं रखता है, लेकिन आजीविका मायने रखती है। जाहिर है, इसका उत्तर रोजगार के माध्यम से जीवनस्तर में सुधार करना है। लेकिन यह रोजगार लोगों को आजीविका और मृत्यु के बीच विकल्प प्रदान नहीं करता है। यह आगे का रास्ता नहीं हो सकता। मैं इन सवालों के उत्तर जानने के लिए और जानकारी लूंगी और इस विषय पर लिखना जारी रखूंगी। आपसे धैर्य रखने का अनुरोध है।