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समुद्री जीवन को नुकसान पहुंचा रहा है इंसानी कोलाहल

इंसान शोर न केवल समुद्रों में ध्वनि प्रदूषण कर रहा है, साथ ही उसकी वजह से प्राकृतिक ध्वनियां भी गुम होती जा रही हैं| जो समुद्री जीवों को खतरे में डाल रही हैं

By Lalit Maurya

On: Friday 05 February 2021
 

समुद्रों में बढ़ते इंसानी शोर से जीवों के जीवन पर व्यापक असर पड़ रहा है। इस शोर से उनकी भोजन, प्रजनन और शिकारियों से बचने की क्षमता पर असर पड़ रहा है। कहते हैं हवा की तुलना में शोर पानी में बहुत तेजी से दूर तक जाता है। यह बात समुद्री जीवन के लिए खतरा बन गई है। समुद्र में रहने वाले कई जीवों का विकास इस तरह से हुआ है कि वो अपने जीवन के कई पहलुओं के लिए अपने और अपने आसपास की ध्वनि पर निर्भर करते हैं, पर जिस तरह से समुद्री वातावरण में इंसानी शोर और कोलाहल घुल गया है, उसमें इन जीवों की आवाज गुम होती जा रही है जो उन जीवों के जीवन को खतरे में डाल रहा है।

अंतराष्ट्रीय जर्नल साइंस में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार इंसानों के कारण समुद्र में ध्वनि प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। उसके शोर से प्राकृतिक ध्वनियों गुम होती जा रही हैं। जिसका असर छोटी झींगा से लेकर हजारों किलो वजनी व्हेल पर भी पड़ रहा है। इसे समझने के लिए इस शोध में 500 से भी ज्यादा शोधपत्रों का विश्लेषण किया गया है। जलवायु परिवर्तन और बढ़ता प्रदूषण वैसे भी समुद्रों और वहां रहने वाले जीवों पर व्यापक असर डाल रहा है

इंसानी शोर के लिए बढ़ते जहाज, समुद्रों में तेल और गैस के लिए बढ़ती गतिविधियां और भूकंपीय सर्वेक्षण के लिए किया विस्फोट शामिल हैं। इन सभी ने मिलकर पानी के नीचे की आवाज को बहुत हद तक बदल दिया है। इसका असर व्हेल्स, डॉलफिन जैसे जीवों पर पड़ रहा है। कई बार यह जीव इस शोर से बहरे तक हो जाते हैं। यह जीव अपना पथ ढूंढने के लिए ध्वनि पर भरोसा करते हैं ऐसे में इसके चलते यह अपने पथ से भी भटक जाते हैं।

यह उनके लिए कितनी महत्वपूर्ण है इस बात का पता आप इस बात से लगा सकते है कि कई मछलियां और समुद्री जीव एक दूसरे से बात करने के लिए ध्वनि की मदद लेते हैं। इसकी मदद से वो अपने लिए भोजन और प्रजनन के बेहतर स्थानों का पता लगाते हैं। इसके साथ ही ध्वनि की मदद से वो शिकारियों और आने वाले खतरे का पता लगाते हैं।  

क्या है इसका समाधान

इस शोध से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता और किंग अब्दुल्ला यूनिवर्सिटी से सम्बन्ध रखने वाले कार्लोस दुआर्ते के अनुसार ध्रुवीय महासागरों में ग्लेशियर के टूटने और समुद्र की सतह पर गिरने वाली बूंदों की आवाजों को समुद्र के नीचे काफी गहराई तक सुना जा सकता है। जलवायु परिवर्तन भी इन भौतिक प्रक्रियाओं जैसे हवाएं, लहरों और पिघलती बर्फ को प्रभावित करते हैं, जो समुद्री आवाजों को आकार देती हैं। ऐसे में इंसानी शोर और समुद्री जीवों विशेष रूप से समुद्री कछुओं, सरीसृपों, समुद्री पक्षियों, सील, वालरस आदि पर पड़ते प्रभाव पर नीति निर्माताओं को विशेष ध्यान देने की जरुरत है। जिससे इन जीवों को बचाया जा सके। इसके लिए अंतराष्ट्रीय शोधकर्ताओं की टीम ने समुद्री शोर को मापने और उसके प्रबंधन के लिए वैश्विक नियम बनाने की बात कही है।

दुआर्ते के अनुसार अधिकतर इंसानी शोर को कम करना इतना मुश्किल भी नहीं है। उदाहरण के लिए जहाज के प्रोपेलर को कम आवाज करने वाला बनाया जा सकता है। ड्रिलिंग के लिए ऐसी तकनीक का उपयोग किया जा सकता है जिससे कम से कम कम्पन हो और पानी में बुलबुले न बनें। इस तरह ध्वनि प्रदूषण को करीब आधा किया जा सकता है। इसी तरह रिन्यूएबल एनर्जी के उपयोग को बढ़ावा देने से तेल और गैस के लिए ड्रिलिंग करने की जरुरत कम हो जाएगी।