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134 मीटर पहुंचा सरदार सरोवर बांध का जलस्तर, मेधा का अनशन जारी

सरदार सरोवर बांध में जल स्तर बढ़ने के बावजूद गुजरात सरकार पानी नहीं छोड़ रही है, जिससे 192 गांव व 1 नगर के डूबने का खतरा बन गया है 

By DTE Staff

On: Wednesday 28 August 2019
 
मध्यप्रदेश के बड़वानी जिले का बागुड गांव, जहां पानी पूरी तरह से भर गया है। फोटो: एनबीए
मध्यप्रदेश के बड़वानी जिले का बागुड गांव, जहां पानी पूरी तरह से भर गया है। फोटो: एनबीए मध्यप्रदेश के बड़वानी जिले का बागुड गांव, जहां पानी पूरी तरह से भर गया है। फोटो: एनबीए

सरदार सरोवर बांध का जल स्तर 134 मीटर तक पहुंचने के बाद डूब क्षेत्र के कई गावों में पानी भर गया है। वहीं, नर्मदा किनारे छोटा बड़दा में नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेधा पाटकर का अनिश्चितकालीन अनशन चौथे दिन भी जारी है। उनके साथ पांच महिलाएं क्रमिक अनशन पर हैं। बडवानी  जिले के  अपर कलेक्टर, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक  व अंजड़ तहसीलदार ने अनशन स्थल पर पहुंच कर मेधा पाटकर से अनशन समाप्त करने की अपील की, लेकिन उन्होंने मानने से इंकार कर दिया।

नर्मदा बचाओ आंदोलन की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि  केंद्र व गुजरात सरकार 192 गांव और एक नगर के  लगभग 32 हजार लोगों का बिना पुनर्वास किए डूबने के लिए छोड़ दिया गया है। सरदार सरोवर बांध का पानी लगातार बढ़ रहा है, लेकिन गुजरात सरकार पानी नहीं छोड़ रही है। जैसे ही बांध की अधिकतम सीमा 138.68 मीटर तक पानी पहुंच जाएगा तो इन लोगों का डूबना तय है।

बयान के मुताबिक, बुधवार तक बांध में 134 मीटर पानी भरने से कई गांव जलमग्न हो गये हैं हजारों हेक्टर जमीन डूब गई  है, जिनका अभी सर्वोच्च अदालत के फैसले के अनुसार 60 लाख रुपये मिलना बाकी है।

छोटा बडदा के कोली समाज के मोहल्ले में जहां अभी-अभी 5 लोगों की रेत खनन में मौत हुई है, अभी तक उनको भरपाई भी नहीं मिली है। उसी मोहल्ले का अनवर ने बताया कि हमारे मोहल्ले को अभी डूब से बाहर कर दिया गया है, हमने इसके लिए आवेदन भी दिया, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई है आज हमारे मोहल्ले के करीब पानी आ गया है।

आंदोलनकारियों ने आरोप लगाया कि 15 साल निकल गए, लेकिन सरकार ने सर्वेक्षण तक नहीं किया है। आज भी गांव-गांव की जो मांगे लंबित है, उन्हें पूरा नहीं किया गया तो हजारों हेक्टेयर खेती डूब जाएगी या टापू बन जाएगी, जिसकी भरपाई तक नहीं की जाएगी। खेत डूबने से लोगों की आजीविका का रास्ता बंद हो जाएगा। बाजार भी डूब जाएंगे।

आरोप है कि कई लोगों को वैकल्पिक भूखंड तो दे दिया गया, लेकिन घर बनाने के लिए मुआवजे की राशि नहीं मिली, बल्कि भूखंड आवंटन के मामलों में करोड़ों रुपए का गोलमोल किया। किसी को तो एक भी भूखंड नहीं मिला तो किसी को दो-दो भूखंड दे दिए गए।

आंदोलनकारियों ने मध्य प्रदेश की पिछली सरकार पर आरोप लगाया कि 2008 से लगातार अदालत को शपथ पत्र दिया जा रहा है कि सभी लोगों को मुआवजा दे दिया गया है और नर्मदा घाटी को खाली करा लिया गया है, जबकि आज की सरकार ने माना की नर्मदा घाटी में 6000 परिवार रह रहे हैं, हालांकि इनकी संख्या 32 हजार से अधिक है। लेकिन आज भी वही स्थिति है। पूर्व की सरकार ने जो भी किया उसे सामने लाकर मध्यप्रदेश सरकार को गुजरात और केंद्र सरकार से कड़ा सामना करते हुए बांध के गेट खुलवाना चाहिए और पुनर्वास का काम तत्काल करना चाहिए |

बयान में बताया गया है कि हजारों परिवारों का सम्पूर्ण पुनर्वास भी मध्य प्रदेश में अधूरा है, पुनर्वास स्थलों पर कानूनन सुविधाएं नही है। ऐसे में विस्थापित अपने मूल गांव में खेती, आजीविका डूबते देख संघर्ष कर रहे है। ऐसे में आज की मध्य प्रदेश सरकार लोगों का साथ नही छोड़ सकती। मध्यप्रदेश के मुख्य सचिव द्वारा नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण को भेजे गये 27.05.2019 के पत्र अनुसार 76 गांवों में 6000 परिवार डूब क्षेत्र में निवासरत है, जबकि 8500 अर्जियां तथा 2952 खेती या 60 लाख की पात्रता के लिए अर्जियाँ लंबित है।