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नदियों में खनन की सीमा 3 मीटर तक बढ़ाकर किसे फायदा पहुंचाना चाहती है सरकार?

उत्तराखंड सरकार ने उपखनिज नीति-2016 में संशोधन करते हुए, नदियों में खनन की सीमा 1.5 मीटर से बढ़ाकर 3 मीटर या भूजल स्तर तक करने की अनुमति दे दी है

By Varsha Singh

On: Monday 03 February 2020
 
उत्तराखंड के टिहरी क्षेत्र में चल रहा स्ट्रोन क्रेशर। फोटो: वर्षा सिंह
उत्तराखंड के टिहरी क्षेत्र में चल रहा स्ट्रोन क्रेशर। फोटो: वर्षा सिंह उत्तराखंड के टिहरी क्षेत्र में चल रहा स्ट्रोन क्रेशर। फोटो: वर्षा सिंह

उत्तराखंड सरकार ने उपखनिज नीति-2016 में संशोधन करते हुए, नदियों में खनन की सीमा 1.5 मीटर से बढ़ाकर 3 मीटर या भूजल स्तर तक करने की अनुमति दे दी है। उत्तराखंड कैबिनेट का ये फ़ैसला पर्यावरणविदों को अखर रहा है। उनके मुताबिक इसका असर नदियों के इको-सिस्टम और जलीय जीवों पर पड़ेगा। भू-जल स्तर भी इससे प्रभावित होगा।

वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के वैज्ञानिक और जलीय जीवों पर कार्य कर रहे डॉ के. शिव कुमार कहते हैं कि नदी के किनारे से डेढ़ मीटर तक भी रेत निकालना नदी की इकोलजी को प्रभावित करता है। खनन के लिए खुदाई की गहराई डेढ़ से बढ़ाकर तीन मीटर करने को वे नदी की सेहत के लिए नुकसानदेह मानते हैं। ज्यादा रेत निकालने का मतलब किनारों को कमज़ोर करना और कटाव को बढ़ाना है। इससे भूजल स्तर में भी गिरावट आएगी। डॉ शिव बताते हैं कि नदी किनारे की रेत बहुत से जलीय जीवों के जीवन के लिए जरूरी है। खनन से उनका हैबिटेट प्रभावित होता है। जलीय जीवों की फूड चेन पर असर पड़ता है।

खनन और कानून विशेषज्ञ रविंद्र परमार खनन पट्टे लीज़ पर देने की पड़ताल के लिए उत्तराखंड सरकार द्वारा अधिकृत व्यक्ति हैं। वह बताते हैं कि सरकार ने नीति में बदलाव अपनी रॉयल्टी बढ़ाने के लिए की है, इससे खनन कारोबारियों को बहुत फायदा नहीं होने वाला। उनके मुताबिक नदी के ज्यादातर किनारों पर डेढ़ मीटर तक ही ग्राउंड वाटर आ जाता है। राज्य में सिर्फ दस प्रतिशत खनन पट्टे ही ऐसे होंगे जहां तीन मीटर तक भूजल न आता हो। किसी लीज में खनन से एक लाख घन मीटर मात्रा निकलती है तो उसके दोगुना होने की बात कही जा रही है। इस आधार पर सरकार अपनी रॉयल्टी तो दोगुनी कर लेगी लेकिन भूजल की वजह से खनन संभव नहीं होगा।

उत्तराखंड की आर्थिकी में खनन का बड़ा योगदान है। राज्य में वर्ष 2017-18 में खनन से 440.13 करोड़ का राजस्व हासिल हुआ। जिसे वर्ष 2021-22 तक 900 करोड़ होने का अनुमान जताया गया है।  इसलिए समय-समय पर खनन संबंधी नियमों में बदलाव किए गए। उत्तर प्रदेश से अलग होने के बाद वर्ष 2001 में उत्तराखंड उपखनिज नीति लायी गई। इसके बाद वर्ष 2002, 2007, 2008 में इसमें संशोधन किए गए। वर्ष 2011 में नई खनिज नीति और 2015 में उपखनिज (रेत, बजरी, बोल्डर) नीति लायी गई। वर्ष 2016 में उपखनिज नीति में फिर बदलाव किया गया। इनमें रॉयल्टी दरें, खनन पट्टों में बदलाव, खनन पट्टों के लिए पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से पर्यावरणीय अनुमति लेने जैसे विषय शामिल किए गए।

वर्ष 2015 में राज्य को खनन के लिहाज से पर्वतीय, मध्य पर्वतीय और मैदानी क्षेत्रों में बांटा गया। पर्वतीय क्षेत्रों में नदी से उपखनिज निकालने के लिए एक मीटर या ग्राउंड वाटर लेवल तक, जो भी कम हो को मान्य किया गया। जबकि मैदानी क्षेत्रों में 1.5 मीटर तक गहराई या ग्राउंड वाटर लेवल, जो भी कम हो, तक किया गया।  इस नीति में जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण के दौरान टैंक, टनल या वाटर चैनल बनाने में इक्ट्ठा हुए मलबे के उठान को भी शामिल किया गया। लेकिन पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को लेकर बहुत स्पष्टता नहीं दिखी।