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देश में अभी भी हैं 66,692 मैनुअल स्केवेंजर्स, पिछले साल हादसों में गई 19 की जान

देश में सबसे ज्यादा मैनुअल स्केवेंजर्स उत्तर प्रदेश में हैं जहां इनकी संख्या 37,379 है| जबकि इसके बाद महाराष्ट्र (7,378) और फिर उत्तराखंड (6,170) का नंबर आता है

By Lalit Maurya

On: Wednesday 10 February 2021
 

देश में आज से 28 साल पहले हाथ से मैला ढोने की प्रथा को प्रतिबंधित कर दिया गया था| इसके बावजूद अभी भी देश में यह कुप्रथा जारी है| गौरतलब है कि 1993 में सफाई कर्मचारी नियोजन और शुष्क शौचालय सन्निर्माण (प्रतिषेध) अधिनियम, 1993 लागु किया गया था, जिसमें इस कुप्रथा पर रोक लगा दी गई थी| इसके बाद 6 दिसंबर, 2013 को प्रोहिबिशन ऑफ एम्प्लॉयमेंट एज मैनुअल स्केवेंजर्स एंड देयर रिहेबिलिटेशन एक्ट, 2013 लागू किया गया था जिसके बाद हाथ से सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के काम को प्रतिबंधित कर दिया था। इसके बावजूद आंकड़ें दिखाते हैं कि देश में आज भी 66,692 मैनुअल स्केवेंजर्स हैं| यह जानकारी राज्यसभा में दिनेश त्रिवेदी द्वारा पूछे गए एक प्रश्न के जवाब में सामने आई है|

आंकड़ों के अनुसार देश में सबसे ज्यादा हाथ से मैला उठाने वाले कर्मी उत्तर प्रदेश में हैं जहां इनकी संख्या 37,379 है| जबकि इसके बाद महाराष्ट्र (7,378), उत्तराखंड (6,170), असम (4,295), कर्नाटक (3,204), राजस्थान (2,880), आंध्रप्रदेश (2,061), पश्चिम बंगाल (741), केरल (600) और फिर मध्य प्रदेश का नंबर आता है, जहां 560 मैनुअल स्केवेंजर्स हैं|

स्वयं सेवी संस्था सफाई कर्मचारी आंदोलन के अनुसार यह कुप्रथा जारी है क्योंकि देश में अभी भी करीब 26 लाख शुष्क शौचालय हैं, जिनकी सफाई हाथों के जरिए करनी पड़ती है। कानून कहता है कि हाथ से मैला उठाने की व्यवस्था खत्म करने के लिए सभी स्थानीय प्राधिकरणों को सीवर और सेप्टिक टैंकों की सफाई हेतु आधुनिक तकनीकों को अपनाना होगा। लेकिन विडंबना यह है कि इसके बावजूद कई राज्यों में मैनुअल स्केवेंजिंग जारी है|

हालांकि पिछले कुछ दशकों में इनकी संख्या में कमी जरूर आई है| मिनिस्ट्री ऑफ़ सोशल जस्टिस एंड एम्पावरमेंट द्वारा 2002-03 के लिए जारी आंकड़ों के अनुसार देश में उस समय करीब 6.76 लाख मैनुअल स्केवेंजर्स थे| 

2016 से 2020 तक इन गैस चैम्बरों ने ली है 340 की जान

बिना जरुरी यंत्रों के सीवेज की सफाई के मामले में तल्ख टिप्पणी करते हुए 18 सितंबर, 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि देश में सीवर सीवर गैस चैंबर्स की तरह हैं, जहां मैनुअल स्कैवेंजरों को मरने के लिए भेजा जाता है| दुनिया के किसी भी देश में, लोगों को मरने के लिए गैस चैंबरों में नहीं भेजा जाता है।

सर्वोच्च न्यायलय की यह बात सही भी है क्योंकि देश में अभी भी इस काम को करते हुए हर साल कई कर्मचारी अपनी जान गंवा बैठते हैं| आंकड़ें दिखाते है कि 2016 से 31 दिसंबर 2020 तक देश में कुल 340 सफाई कर्मचारियों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था| अकेले 2020 में 19 कर्मचारियों की जान गई है, जिनमें से 4 की जान तो देश की राजधानी दिल्ली में ही गई थी| वहीं तमिलनाडु में 9, महाराष्ट्र में 4 और कर्नाटक में 2 कर्मचारियों की जान गई थी|

विडम्बना देखिए की अपनी जान पर खेलकर अपने परिवार का पेट भरने वाले इन सफाई कर्मचारियों को उनके काम और उनकी जान का पूरा मुआवजा तक नहीं मिलता| 2016 से जिन 340 सफाई कर्मचारियों की जान गई है, उनमें से 76 को अब तक कोई मुआवजा नहीं मिला है| ऐसे में क्या यह सरकार और समाज की जिम्मेदारी नहीं है कि वो इस कुप्रथा का अंत करने की दिशा में सार्थक कदम उठाए|