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मलबे के ढेर में दबता देश-3: दोबारा इस्तेमाल से निकलेगी राह

दिल्ली सरकार ने नगर निगमों को एडवाइजरी जारी की है जिसमें उन्हें भवन निर्माण में 5 प्रतिशत पुनर्चक्रित मलबे का इस्तेमाल करने को कहा गया है

By Avikal Somvanshi

On: Thursday 08 August 2019
 
Photo: GettyImages
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अपशिष्ट प्रबंधन नियमावली 2016 में यह व्यवस्था है कि स्थानीय प्राधिकरणों और सरकार को अपनी इमारतों में 10 से 20 प्रतिशत पुनर्चक्रित कचरे का इस्तेमाल करना होगा। केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (सीपीडब्ल्यूडी) पहली ऐसी सरकारी एजेंसी थी जिसने इस नियम को अपनाया। उच्चतम न्यायालय की नई इमारत के निर्माण के दौरान सीपीडब्लयूडी ने एनडीएमसी के बुराड़ी स्थित पुनर्चक्रण संयंत्र से लाई गई 18 लाख ईंटों का इस्तेमाल किया जिन्हें कचरे के पुनर्चक्रण से बनाया गया था। इस परियोजना के मुख्य इंजीनियर बी.बी. मक्कड़ कहते हैं, “ज्यादा वजन न उठाने वाली सारी दीवारें पुनर्चक्रित मलबे की ईंटों से बनाई गई हैं।” इस परियोजना की सबसे बड़ी रुकावट पुनर्चक्रित कचरे पर लगने वाला कर थी जो नए सामान पर लगने वाले कर से ज्यादा था। मक्कड़ ने बताया, “हमने पुनर्चक्रित ईंटों पर 18 प्रतिशत जीएसटी का भुगतान किया है जबकि सामान्य ईंटों पर केवल 5 प्रतिशत जीएसटी लगता है।” यह हतोत्साहित करने वाली बात है लेकिन इससे कुल लागत में कमी आई है क्योंकि इससे मोर्टार और प्लास्टरिंग का इस्तेमाल घटा है। उन्होंने बताया, “दीवार की कुल चिनाई 7,500 रुपए प्रति क्यूबिक मीटर पड़ी है। सामान्य चिनाई 7,700 रुपए प्रति क्यूबिक मीटर होती।”

दिल्ली सरकार ने नगर निगमों को एडवाइजरी जारी की है जिसमें उन्हें भवन निर्माण में 5 प्रतिशत पुनर्चक्रित मलबे का इस्तेमाल करने को कहा गया है। लेकिन इस दिशा में कोई प्रगति नहीं हुई है। दिल्ली के पुनर्चक्रण संयंत्र पुनर्चक्रित उत्पादों से भरे पड़े हैं लेकिन इनकी बिक्री नहीं हो पा रही है। इसका बड़ा कारण कचरे से बनाए गए उत्पादों की गुणवत्ता को लेकर उपजी आशंका है। मक्कर कहते हैं, “बुराड़ी संयंत्र की ईंटों को लेकर हमारे मन में शंका है। यह हमारे गुणवत्ता नियंत्रण जांच में विफल रही हैं। लेकिन हमने अपने इंजीनियरों के साथ मिलकर ईंट बनाने में इस्तेमाल होने वाले कंक्रीट मिश्रण को अपने अनुसार बनाया है। इससे बनने वाली ईंटों बाजार में आमतौर पर उपलब्ध ईंटों से ज्यादा मजबूत होती हैं।”

इस्तेमाल करने वालों के बीच विश्वास पैदा करने के लिए अहमदाबाद स्थित पुनर्चक्रण सुविधा ने अपनी पुनर्चक्रित ईंटों और सड़क बनाने में इस्तेमाल होने वाली सामग्री को इंटीग्रेटिड हैबिटेड असेसमेंट के लिए इंडियन ग्रीन बिल्डिंग काउंसिल और ग्रीन रेटिंग से प्रमाणित करवाया है। गुजरात मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन अहमदाबाद मेट्रो के निर्माण के लिए पुनर्चक्रित कचरा खरीद रहा है।

बेंगलुरु में, कर्नाटक खनन और भू-विज्ञान विभान ने दावा किया है कि रॉक क्रिस्टल द्वारा बनाया गया अंतिम उत्पाद रेत है इसलिए उसे रॉयल्टी देनी होगी। अदालत में दी गई दलीलों से यह साबित हुआ कि मलबे का पुनर्चक्रण पत्थरों को तोड़ने के समान नहीं है और इसलिए रॉयल्टी के भुगतान की जिम्मेदारी नहीं बनती। लेकिन अन्य राज्यों में ऐसा नहीं हुआ है और इसलिए वहां पुनर्चक्रित अपशिष्ट उत्पादों का बाजार खतरे में पड़ सकता है।

अनियमित क्षेत्र में पुनर्चक्रण अलाभकारी सौदा है। इसका कारण यह है कि यह बड़े पैमाने पर होने वाला कारोबार है। महिला सशक्तिकरण, बच्चों की शिक्षा और बाल मजदूरी के अलावा अपशिष्ट प्रबंधन और पर्यावरण संबंधी मुद्दों से जुड़े मुंबई स्थित संगठन स्त्री मुक्ति संगठन की अध्यक्ष ज्योति महापसेकर कहती हैं, “यदि प्रौद्योगिकी छोटे रूप में उपलब्ध हो तो कचरे का प्रबंधन स्थानीय स्तर पर हो सकता है।” पुणे में अपशिष्ट प्रबंधन सेवाएं उपलब्ध कराने वाले गैर-लाभकारी संगठन एसडब्ल्यूएसीएच से जुड़े आर्किटेक्ट सार्थक तपस्वी कहते हैं, “अनियमित पुनर्चक्रण क्षेत्र बहुत उद्यमशील है। अगर इसके बदले पैसा मिलने की संभावना होगी तो यह क्षेत्र इसका फायदा उठा चुका होगा।”

कई अच्छी प्रक्रियाएं हैं जिनका पालन किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, मुंबई की झोपड़पट्टी में काम करने वाले आर्किटेक्ट और योजना बनाने वालों के समूह उरबज के राहुल श्रीवास्तव कहते हैं, धारावी में कोई भी इमारत बनने या टूटने का मलबा नहीं मिलता। वह कहते हैं, “तोड़फोड़ से जो मलबा इकट्ठा होता है उसे हम इमारत बनाने में दोबारा इस्तेमाल करते हैं और जिसका इस्तेमाल नहीं हो सकता उसे जमीन की भराई के काम में लाया जाता है।’ उरबज मिस्रियों और ठेकेदारों को जगह के बेहतर इस्तेमाल और सामान के बेहतर इस्तेमाल के लिए प्रशिक्षण देता है और वित्त प्राप्त करने में भी मदद करता है।

तोड़फोड़ से इकट्ठा हुए कचरे का दोबारा इस्तेमाल कैलाश कॉलोनी में भी किया जा रहा है जहां कुमार एक इमारत का पुनर्विकास कर रहे हें। इस मकान को तोड़ दिया गया था और इसकी हर ईंट, खिड़की और दरवाजे को मशक्कत से इकट्ठा करके एक जगह इसका ढेर लगाया गया है ताकि इसे बेचा जा सके। कोनों और फर्श से निकले कंक्रीट का दोबारा इस्तेमाल नहीं किया जा सका था। इसे कचरे के निपटान वाली जगहों पर भेजना पड़ा। कुमार के नजरिए से तोड़फोड़ की इस प्रक्रिया में ज्यादा वक्त नहीं लगा लेकिन इसमें काफी अधिक कौशल की जरूरत पड़ी है। इस मकान के मालिक को सारा कचरा किसी गैर-कानूनी जगह पर भेजने के लिए पैसा खर्च नहीं करना पड़ा बल्कि टूटे हुए मकान से मिला सामान बेचकर उन्होंने पैसा कमाया। इस दिशा में और काम करने तथा मलबे के अंबार से छुटकारा पाने की सख्त जरूरत है।