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कोहरे में भी स्पष्ट चित्र लेना हुआ मुमकिन, भारतीय वैज्ञानिकों ने खोजा बेहतर तरीका

अब कोहरे में भी स्पष्ट चित्र लेना मुमकिन है| इसके लिए भारतीय वैज्ञानिकों ने इमेजिंग का बेहतर तरीका खोज निकाला है 

By Lalit Maurya

On: Wednesday 16 June 2021
 

अब कोहरे में भी स्पष्ट चित्र लेना मुमकिन हो जाएगा, इसके लिए भारतीय वैज्ञानिकों ने इमेजिंग का बेहतर तरीका खोज निकाला है। यह तकनीक प्रकाश के मॉड्यूलेशन-डिमॉड्यूलेशन पर आधारित है। इस तकनीक में प्रकाश के स्रोत को संशोधित करने के बाद उसे फोटो लेने वाले के पास फिर से कंप्यूटर एल्गोरिदम की मदद से डिमॉड्युलेट कर लिया जाता है। 

यह तकनीक इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसकी मदद से वायुयान, रेल, समुद्री जहाज और सड़क पर चलने वाले वाहन जो कोहरे की वजह से साफ तौर पर नहीं देख पाते थे, जिससे एक्सीडेंट की सम्भावना बनी रहती थी, वो इस तकनीक की मदद से काफी कम हो सकती है। 

लम्बे समय से वैज्ञानिक इसपर काम कर रहे हैं| इसके लिए वो फोटो लेने के पश्चात जो आंकड़ें प्राप्त होते हैं उन्हें प्रोसेस करने का प्रयास कर रहे थे जिससे फोटो की गुणवत्ता में सुधार किया जा सके| इसके लिए उन्होंने प्रकाश बिखराव के पीछे के विज्ञान को समझने की कोशिश की है, जिसमें उन्होंने कंप्यूटर एल्गोरिदम की भी मदद ली है| हालांकि कुछ मामलों में उन्हें उतने बेहतर परिणाम नहीं मिले हैं| यदि कंप्यूटर एल्गोरिदम की बात करें तो उसके लिए बड़ी मात्रा में आंकड़ों को प्रोसेस (संसाधित) करने की जरुरत पड़ती है, जिसके लिए पर्याप्त मात्रा में आंकड़ों को स्टोर करने के लिए जगह और समय की जरुरत रहती है| 

इसके लिए भारत और फ्रांस के शोधकर्ताओं की एक टीम ने भारी गणनाओं के बिना छवि गुणवत्ता में सुधार के लिए एक समाधान की खोज की है। जिसे विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के एक स्वायत्त संस्थान, रमन अनुसंधान संस्थान (आरआरआई), बेंगलुरु की टीम; अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन, अहमदाबाद; शिव नादर विश्वविद्यालय, गौतम बुद्ध नगर और यूनिवर्सिटी रीन्स एवं यूनिवर्सिटी पेरिस -सैक़ले, सीएन आरएस, फ़्रांस द्वारा ढूंढा गया है| इस तकनीक में प्रकाश स्रोत को संशोधित करके और अधिक स्पष्ट चित्रों को प्राप्त करने के बाद उन्हें डिमोड्युलेट करके पर्यवेक्षक के पास भेजा था। इससे जुड़ा शोध जर्नल 'ओएसए कॉन्टिनम' में प्रकाशित हुआ है।

कैसे काम करती है यह तकनीक

यह तकनीक कैसे काम करती है इसे समझाने के लिए शोधकर्ताओं ने शिव नादर विश्वविद्यालय, उत्तर प्रदेश में सर्दियों के मौसम को चुना था| जहां उन्होंने एक धुंध वाली सुबह में इस प्रौद्योगिकी के व्यापक प्रयोग का प्रदर्शन किया है। उन्होंने प्रकाश के स्रोत के रूप में दस लाल एलईडी लाइटों को प्रयोग किया था, फिर उन एलईडी के लिए प्रयुक्त होने वाली विद्युत् धारा को लगभग 15 चक्र प्रति सेकंड की दर से प्रवाहित करके और आवृत्ति में बदलाव कर प्रकाश के इस स्रोत को संशोधित किया था।

इस प्रयोग में शोधकर्ताओं ने एक कैमरा, एलईडी से करीब 150 मीटर की दूरी पर रखा था। कैमरे ने इन चित्रों को खींचने के बाद उन्हें एक डेस्कटॉप कंप्यूटर पर भेज दिया| फिर, कंप्यूटर एल्गोरिदम ने स्रोत की विशेषताओं को जानने के लिए मॉड्यूलेशन आवृत्ति से सम्बन्धित जानकारी का उपयोग किया। इस प्रक्रिया को 'डिमॉड्यूलेशन' कहा जाता है। छवि का डिमॉड्यूलेशन उस दर पर किया जाना था, जो एक स्पष्ट छवि प्राप्त करने के लिए प्रकाश के स्रोत के मॉड्यूलेशन की दर के बराबर थी।

शोधकर्ताओं ने मॉड्यूलेशन-डिमॉड्यूलेशन तकनीक का उपयोग करके प्राप्त चित्रों की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार किया है। इस प्रक्रिया में कंप्यूटर को प्रोसेस करने में कितना समय लगेगा यह छवि (फोटो) के आकार पर निर्भर करता है। आरआरआई से जुड़े और इस अध्ययन के सह-लेखक बापन देबनाथ के अनुसार, "2160×2160" चित्रों के लिए, गणना का (कम्प्यूटेशनल) समय लगभग 20 मिलीसेकंड था।" मोटे तौर पर  यह एलईडी वाली छवि का आकार है। उनके सहयोगियों ने 2016 में इस दर का अनुमान लगाया था।

शोधकर्ताओं ने इस प्रयोग को कई बार दोहराया था और उन्हें हर बार इसमें सुधार देखने को मिला था। हालांकि एक बार जब परीक्षण के दौरान कोहरे की तीव्रता में अंतर था, तब उन्हें चित्रों की गुणवत्ता में कोई खास सुधार देखने को नहीं मिला था। ऐसे ही एक प्रयोग में, जब तेज हवा चल रही थी, और उन्होंने पूरे दृश्य में कोहरे के निशान देखे थे। समय बीतने के साथ हवा में पानी की बूंदों का घनत्व बदल गया, जिससे मॉड्यूलेशन-डिमॉड्यूलेशन की तकनीक उतनी प्रभावी नहीं रह गई थी। 

इसके बाद, शोधकर्ताओं ने अपने प्रयोग का सेटअप को बदल दिया। उन्होंने एक गत्ते के टुकड़े (कार्डबोर्ड) की मदद ली, उसे एलईडी से 20 सेंटीमीटर की दूरी पर इस तरह रखा गया था, ताकि कैमरे की रोशनी को परावर्तित किया जा सके। कार्डबोर्ड और कैमरे के बीच की दूरी 75 मीटर थी। कार्डबोर्ड से परावर्तित मॉड्युलेटेड प्रकाश कोहरे के माध्यम से यात्रा करता है और फिर कैमरे द्वारा उसको कैप्चर किया जाता है। यहां उन्होंने दिखाया कि कैसे उनकी तकनीक से अभी भी अंतिम रूप से प्राप्त चित्रों की गुणवत्ता में काफी सुधार हुआ है।

फिर उन्होंने इस प्रयोग को साफ मौसम में जब धूप निकली थी उसे दोहराया था, जिसमें उन्होंने पाया कि स्रोत का डिमोड्यूलेशन करने के बाद, छवि की गुणवत्ता इतनी अधिक थी कि एलईडी को दृढ़ता से परावर्तित सूर्य के प्रकाश से अलग किया जा सके।

इस शोध को विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग, विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा आंशिक रूप से वित्त पोषित किया गया है। इस तकनीक की एक सबसे बड़ी विशेषता इसकी कम लागत है| इसके लिए केवल कुछ एलईडी और एक एक साधारण डेस्कटॉप कंप्यूटर की आवश्यकता होती है, जो एक सेकंड से भी कम समय में परिणाम दे सकता है|