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पानी को शुद्ध करने के लिए वैज्ञानिकों ने बनाया एक सस्ता भाप जेनरेटर

सीधे पानी का वाष्पीकरण करने की तुलना में भाप बनाकर पानी में बदलने की दर 4-5 गुना अधिक है, जिसका अर्थ है कि हम अधिक पानी शुद्ध कर सकते हैं

By Dayanidhi

On: Thursday 23 April 2020
 
Photo: wallpaper flare
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अध्ययन के अनुसार 2040 तक दुनिया के एक चौथाई लोग उन क्षेत्रों में रहेंगे जहां साफ और पीने योग्य पानी की कमी होगी। पीने के पानी की इस समस्या से निपटने के दो संभावित तरीके हैं - समुद्री जल का डीसैलिनैशन और अपशिष्ट जल को शुद्ध करके। अब स्वीडन की लिंकोपिंग विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने सूर्य के प्रकाश का उपयोग करके पानी को शुद्ध करने के लिए एक सस्ता और पर्यावरण के अनुकूल भाप जेनरेटर विकसित किया है।

कार्बनिक नैनोइलेक्ट्रॉनिक समूह के प्रमुख सहायक प्रोफेसर सिमोन फैबियानो कहते हैं, सीधे पानी का वाष्पीकरण करने की तुलना में भाप बनाकर पानी में बदलने की दर 4-5 गुना अधिक है, जिसका अर्थ है कि हम अधिक पानी को शुद्ध कर सकते हैं। यह शोध जर्नल एडवांस्ड सस्टेनेबल सिस्टम्स में प्रकाशित हुआ है।

वाष्प बनाने वाले यंत्र में एक एरोजेल होता है जिसमें कार्बनिक संयुग्मित पॉलिमर पिडिओट: पीओएसएस: से युक्त सेलूलोज़-आधारित संरचना होती है। पॉलिमर में सूरज की रोशनी में ऊर्जा को अवशोषित करने की क्षमता होती है। इससे जुड़े एरोजेल में एक छिद्रयुक्त नैनोस्टेक्चर होता है, जिसका अर्थ है कि यह बड़ी मात्रा में पानी अपने छिद्रों में अवशोषित कर सकता है।  

सिमोन फैबियानो बताते हैं इस सामग्री में एक 2 मिमी की परत होती है, जो सूरज से 99% ऊर्जा को अवशोषित कर सकती है।

एक छिद्रयुक्त और इन्सुलेट तैरने वाली फोम भी पानी और वायुमार्ग के बीच में होती है, जो भाप जनरेटर को बचाए रखती है। सूरज से निकलने वाली गर्मी पानी को वाष्पित कर देती है, जबकि नमक और अन्य सामग्री पीछे छूट जाती है।

एरोजेल टिकाऊ होता है और इसे साफ किया जा सकता है, उदाहरण के लिए, नमक का पानी किसी भी चीज को खराब कर सकता है। लेकिन एरोजेल को तुरंत फिर से इस्तेमाल किया जा सकता है। इस प्रक्रिया को कई बार दोहराया जा सकता है। तेरो-पेट्री रुको ने बताया कि वाष्पीकरण प्रणाली से गुजरने वाला पानी बहुत उच्च गुणवत्ता का पीने योग्य पानी बन जाता है। रुको ऑर्गेनिक इलेक्ट्रॉनिक्स की प्रयोगशाला में पोस्टडॉक और शोधकर्ताओं में से एक हैं।

यह प्रणाली विशेष रूप से इसलिए अच्छी है क्योंकि इसमे लगी सभी सामग्रीयां पर्यावरण के अनुकूल हैं। शोधकर्ताओं ने बताया कि हम इसमें नैनो सेल्यूलोज और पॉलिमर का उपयोग करते हैं, जिसका पर्यावरण और लोगों पर बहुत कम प्रभाव पड़ता है। हमने सामग्री का उपयोग भी बहुत कम मात्रा में किया है: एरोजेल 90% वायु से बना होता है। सिमोन फैबियानो ने कहा हम आशा और विश्वास करते हैं कि हमारे परिणाम उन लाखों लोगों की मदद कर सकते हैं जिनके पास साफ पानी तक पहुंच नहीं है। प्रोफेसर ज़ेवियर क्रिस्पिन के पर्यवेक्षण के तहत, कार्बनिक इलेक्ट्रॉनिक्स की प्रयोगशाला में शोबो हान द्वारा एरोजेल विकसित किया गया था।