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लॉकडाउन में ऑनलाइन शिक्षा पहाड़ों में कितनी सफल?

उत्तराखंड के श्रीनगर गढ़वाल विश्वविद्यालय में भी ऑनलाइन पढ़ाई चल रही है, लेकिन क्या इसका फायदा छात्रों को मिल रहा है

On: Friday 15 May 2020
 
Photo credit: Taxi premiere
Photo credit: Taxi premiere Photo credit: Taxi premiere

शिवानी पाण्डेय

हर्षित उतराखंड के गढ़वाल केन्द्रीय विश्वविद्यालय से बीएससी कर रहे हैं। कोरोना के कारण विश्वविद्यालय शुरुआत में 31 मार्च तक के लिए ही बंद हुआ। इस कारण इन कुछ दिनों की छुट्टियों के लिए चमोली जिले में स्थित अपने घर चले गए। कोरोना का संकट बढ़ा तो विश्वविद्यालय ने ऑनलाइन पढ़ाई शुरू कर दी, लेकिन हर्षित पढ़ नही पा रहे, क्योंकि गांव में नेटवर्क ही नहीं आता। किसी दोस्त से विश्वविद्यालय में हुई ऑनलाइन पढ़ाई का हाल पूछने के लिए उसे एक किलोमीटर की चढ़ाई चढ़ कर बाजार आना पड़ता है, तब कही जा कर वो जानकारी जुटा पाता है और जब से ऑनलाइन पढ़ाई हुई है तब से हर शाम बाजार आ कर ये जानकारी जुटाने का काम उसकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया है।

अभिषेक भी हर्षित के साथ ही पहाड़ के एक बड़े शहर श्रीनगर में पढ़ते हैं। कोरोना से विश्वविद्यालय बंद होने के कारण अभिषेख जोशीमठ (चमोली) ब्लाक स्थित अपने गाँव आ गया| उस से बात होनी भी मुश्किल है। न उसके पास एंड्राइड फोन है और न गांव में बटन वाले सस्ते फोन पर भी बात करने लायक नेटवर्क आ पाता है। किसी से कुछ पूछना हो तो वो गांव के पास धार (पहाड़ में ऊँची जगह) में जा कर ही यह मुमकिन हो पाता है।

बकुल ऑनलाइन कक्षाओं का लाभ नही ले पा रही है, जबकि बकुल रुड़की जैसे बड़े शहर में रहती है। बकुल के शहर में नेटवर्क की स्पीड इतनी नही है कि उस से ऑनलाइन क्लासेज का लाभ उठाया जा सके।

ये तीन उदाहरण है जो उत्तराखंड समेत देश का हाल बताने के लिए काफी है। गांवों में कनेक्टिविटी नही है तो शहरों में स्पीड। कोरोना महामारी के इस समय में केंद्र सरकार, राज्य सरकार, यूजीसी और विश्वविद्यालयों ने ऑनलाइन पढ़ाई का हल्ला मचाया हुआ है, बिना यह देखे कि इस व्यवस्था के लिए संसाधन है या नही। ऑनलाइन पढ़ाई बिना यह देखे शुरू कर दी है कि कितने छात्रों के पास स्मार्टफोन या लैपटॉप है या नहीं है| बिना यह देखे कि छात्र और शिक्षक इस नये माध्यम के लिए कितना तैयार है?

संयुक्त राष्ट्र शैक्षणिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) के अध्ययन में सामने आया है कि कोरोना महामारी का सबसे ज्यादा प्रभाव छात्रों पर पड़ा है| दुनिया के 191 देशों के करीब 157 करोड़ छात्र इस से प्रभावित हुए है। इन प्रभावित छात्रों में भारत के 32 करोड़ छात्र भी शामिल है| 

भारत में 25 मार्च के पहले दौर के राष्ट्रीय लॉकडाउन शुरू होने से पहले ही स्कूल, कॉलेज एहतियात के तौर पर बंद कर दिए गए। 21 दिनों की ये समयसीमा 14 अप्रैल को खत्म होनी थी, इस बीच केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने कहा कि छात्रों और शिक्षकों की सुरक्षा सरकार के लिए सर्वोपरि है और उनका मंत्रालय यह सुनिश्चित करने के लिए तैयार है कि यदि स्कूल और कॉलेज को 14 अप्रैल के बाद भी बंद रखने की जरूरत पड़ी तो छात्रों को पढ़ाई-लिखाई का कोई नुकसान नहीं हो। महामारी का संकट बढ़ने लगा तो सरकारों ने ऑनलाइन पढ़ाई करने के निर्देश दिए।

लेकिन इसने देश में एक नई तरह की असमानता को जन्म दे दिया है। इस ऑनलाइन पढ़ाई में गांव के छात्र वंचित हो गए हैं और शहरों के भी वो छात्र वंचित हो गये है जिनके पास स्मार्टफोन, लेपटॉप या महंगे गैजेट नहीं है।

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में उच्च शिक्षा विभाग के हवाले से बताया गया है कि पूरे राज्य में केवल 44 फीसदी छात्रों तक ही ऑनलाइन पढ़ाई पहुंच पाई है। इस रिपोर्ट के अनुसार चमोली में सर्वाधिक 61 फीसदी छात्र और चम्पावत में सबसे कम 28 फीसदी छात्र  ऑनलाइन शिक्षा से जुड़ पाए हैं।

गढ़वाल विश्वविद्यालय उत्तराखंड का एकमात्र केन्द्रीय विश्वविद्यालय है| उच्च शिक्षा के लिए श्रीनगर पहाड़ों का केंद्र है| कोरोना महामारी के कारण गढ़वाल  विश्वविद्यालय 16 मार्च से बंद है। छात्रों की पढ़ाई पर कोई असर न पड़े इसके लिए विश्वविद्यालय ने ऑनलाइन पढ़ाई शुरू की, लेकिन डेढ़ माह बीत जाने के बाद भी 30-40 फीसदी से ज्यादा बच्चों को विश्वविद्यालय ऑनलाइन पढ़ाई से नहीं जोड़ पाया है। 

गढ़वाल विश्वविद्यालय में अंग्रेजी विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो० सुरेखा डंगवाल का कहना है कि “अंग्रेजी में स्नातक में द्वितीय, चतुर्थ व छठे सेमेस्टर में लगभग 800 छात्र-छात्राएं है। वे और उनके साथ के अन्य शिक्षक व्हाट्सएप, मेल, ऑनलाइन क्लासेज (जूम, मीट आदि) सभी माध्यमों से अभी तक केवल 180 से 200 छात्रों तक ही जुड़ पाये हैं। हमारे विश्वविद्यालय में आर्थिक रूप से कमजोर तबके के छात्रों का प्रतिशत ज्यादा है जिसके कारण उनसे ऑनलाइन पढ़ाई के लिए सबसे जरूरी टूल स्मार्टफोन की उम्मीद करना ही बेमानी है। ऑनलाइन पढ़ाई, संकट के समय में एक अच्छा माध्यम हो सकता था लेकिन संसाधनों की कमी से छात्रों का एक बड़ा तबका इस से वंचित हो गया है|”

गढ़वाल विश्वविद्यालय में ही गणित विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो० आर०सी० डिमरी का कहना है कि इस सत्र में गणित में चलने वाले तीनों सेमेस्टर में गणित विषय में 1400 के करीब छात्र है| कोरोना के कारण ऑनलाइन पढ़ाई शुरू की लेकिन महिना बीत जाने के बाद भी केवल 20-30 फीसदी बच्चे ही जुड़ पाए है| इसका कारण प्रो० डिमरी बताते है कि ऑनलाइन पढ़ाई के लिए सबसे जरूरी चीज है, अच्छी स्पीड की नेट कनेक्टिविटी, जो कि शहरों में ही हो सकता है जबकि हमारे यहां ग्रामीण पृष्ठभूमि के छात्र अधिक पढ़ते है| विभिन्न व्हाट्सएप ग्रुप में हमसे अभी तक केवल 400 ही छात्र जुड़ पाए है, जबकि जूम ऐप में तो 1400 में से केवल 100 ही जुड़ पा रहे है|

प्रो० डिमरी गढ़वाल विश्वविद्यालय में विज्ञान संकाय के संकायाध्यक्ष (डीन) भी है। जिसमे वे भौतिक और रसायन विज्ञान जैसे ज्यादा छात्र संख्या वाले विषयों को भी देखते है, लेकिन इन विषयों का हाल भी गणित से जुदा नही है। विज्ञान संकाय के डीन होने के नाते डिमरी ऑनलाइन पढ़ाई के उस पक्ष पर भी ध्यान आकर्षित करते हैं जिस पर शायद किसी का ध्यान नहीं गया| नेट कनेक्टिविटी अच्छी न होने के कारण शिक्षक पीडीएफ बना कर छात्रों को मेल और व्हाट्सएप से पढ़ाई के साधन उपलब्ध करवा रहे हैं, लेकिन छात्रों को बिना क्लासरूम और प्रयोगशाला के कैसे समझ आएगा? यह केवल खानापूर्ति ही है।

प्रो. डंगवाल और प्रो. डिमरी इस ओर भी ध्यान देते है कि जहां छात्र सीमित रहते हैं वहां यह माध्यम लाभदायक भी हो रहा है| जैसे मास्टर कोर्सेज़ के ही 70-80 फीसदी छात्र लॉक डाउन के बाद भी पढ़ाई कर पा रहे है।

जेंडर गैप

भारतीय इंटरनेट और मोबाइल समूह के 2019 की रिपोर्ट कहती है कि भारत में 67 फीसदी पुरुषों की तुलना में केवल 33 फीसदी महिलाएं ही इन्टरनेट का प्रयोग करती है| और ग्रामीण भारत में यह असमानता 72 फीसदी पुरुषों की तुलना में केवल 28 फीसदी रह जाता है| अगर आँकड़े ये है तो फिर गाँवों के देश में हम ऑनलाइन शिक्षा को कैसे सभी छात्रों और उन लडकियों तक पहुँचा पायेंगे, जिनके हिस्से खेती-बाड़ी और घर के तमाम कामों को करने के बाद अंत में पढ़ाई आती है?

शोध छात्रा

राजनीति विज्ञान विभाग, गढ़वाल विश्वविद्यालय