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एक साल पहले लगाया जा सकेगा अल नीनो का पूर्वानुमान, वैज्ञानिकों ने खोजा नया तरीका

वैज्ञानिक रूप से, अल-नीनो प्रशांत महासागर के भूमध्यीय क्षेत्र की उस मौसमी घटना का नाम है, जिसमें पानी की सतह का तापमान सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है

By Lalit Maurya

On: Friday 03 January 2020
 
Photo credit: Wikimedia commons
Photo credit: Wikimedia commons Photo credit: Wikimedia commons

पॉट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च, बीजिंग नॉर्मल यूनिवर्सिटी और जस्टस-लिबिग-यूनिवर्सिटेट गिएसेन के शोधकर्ताओं ने एक ऐसा रास्ता खोजने में सफलता हासिल की है, जिससे अल नीनो का पूर्वानुमान, उसके घटने से एक साल पहले लगाया जा सकता है। प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज में प्रकाशित अध्ययन में इसके बारे में विस्तार से बताया गया है। इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने जटिलता-आधारित दृष्टिकोण के बारे में बताया है, जिसकी मदद से इन चरम मौसमी घटनाओं की सटीक भविष्यवाणी की जा सकती है।

 

आखिर क्यों जरुरी है अल-नीनो की भविष्यवाणी

अल-नीनो स्पैनिश भाषा का शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ है- शिशु यानी छोटा बालक। वैज्ञानिक रूप से, एल-नीनो प्रशांत महासागर के भूमध्यीय क्षेत्र की उस मौसमी घटना का नाम है, जिसमें पानी की सतह का तापमान सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है और पूर्व की और बहने लग जाता है। जो न केवल समुद्र पर बल्कि वायुमंडल पर भी प्रभाव डालता है। वैज्ञानिक ऐसी घटनाओं के बारे में अधिक जानने के लिए उत्सुक हैं क्योंकि वे दुनिया के कुछ हिस्सों में सामान्य से ज्यादा बारिश और दूसरे में सूखे की स्थिति को जन्म देते हैं। वैसे तो अल-नीनो की घटना भूमध्य रेखा के आस-पास प्रशान्त क्षेत्र में घटित होती है लेकिन यह पूरी दुनिया के मौसम पर अपना प्रभाव डालती है। भारतीय मौसम भी इस घटना से अछूता नहीं है। यह ने केवल बाढ़ लाती है, बल्कि सूखे के चलते कृषि और खाद्य सुरक्षा को बड़े पैमाने पर प्रभावित करती है। यदि इसके बारे में पहले से पता हो की यह घटना कब घटने वाली है। तो यह इससे निपटने के लिए एक व्यापक योजना तैयार की जा सकती है। वैज्ञानिक अब तक छह महीने पहले इसकी भविष्यवाणी कर सकते थे। लेकिन इस नए अध्ययन में, शोधकर्ताओं ने पाया है कि वो इस घटना से एक साल पहले इसका सटीक पूर्वानुमान लगा सकते हैं।

कैसे लगाया जा सकता है पूर्वानुमान

इस नई विधि में जटिलता के सिद्धांत को आधार बनाया गया है। जिसकी  मदद से समुद्र की सतह के तापमान सम्बन्धी आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इसके लिए वैज्ञानिकों ने प्रशांत महासागर के पूर्वी हिस्से को वर्गाकार सेल में बांट दिया और हर सेल के तापमान का उसके आस-पास और दूर के सेलों के तापमान से तुलनात्मक अध्ययन किया गया। इस तरह के तुलनात्मक अध्ययन से तापमान के आंकड़ों में पायी जाने वाली विसंगति को मापा जा सकता है। इस तरह साल-दर-साल के आंकड़ों की तुलना करने से उनके सामने विसंगति का एक पैटर्न बन गया। जब आंकड़ों में विसंगति अधिक थी, उसका मतलब था कि अगले साल अल नीनो के घटने की सबसे प्रबल सम्भावना है। शोधकर्ताओं के सामने जब एक बार यह पैटर्न आ गया, तो उन्होंने इसकी मदद से अतीत में घटी अल नीनो की घटनाओं को समझने का प्रयास किया | जिसके लिए उन्होंने 1984 से 2018 के बीच समुद्री सतह के वार्षिक तापमान के आंकड़ों का विश्लेषण किया। जिसमें उन्होंने पाया कि उनकी यह विधि 10 में से नौ बार अल-नीनो का सही पूर्वानुमान करने में सफल हुई थी। इसके साथ ही उन्होंने यह भी पाया कि पिछले वर्ष विसंगति जितना अधिक थी, अल नीनो की घटना उतनी ही प्रबल थी।