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मानसून बना पहेली, कहीं बाढ़ तो कहीं सूखा

अत्याधिक बारिश के कारण 256 जिलों में बाढ़ जैसे हालात हैं, जबकि कई जिलों में सूखे जैसे हालात हैं

By Akshit Sangomla, Giriraj Amarnath

On: Monday 07 September 2020
 
La Niña-like conditions may prevail in September, leading to more very heavy rainfall episodes and further floods. Photo: Vikas Choudhary

अगस्त के अंत तक भारत का हर पांचवा जिले सूखे जैसे हालात से गुजर रहा है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के आंकड़ों के मुताबिक, इन जिलों में 31 अगस्त तक या तो सामान्य से कम बारिश (19 से 60 फीसदी के बीच) या सामान्य से बहुत कम बारिश (60 फीसदी से कम) बारिश हुई है।

विशेष रूप से मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा और नागालैंड जैसे कुछ उत्तर पूर्व भारतीय राज्यों में स्थिति बहुत खराब है। इन राज्यों के सभी जिलों में सामान्य से बहुत कम बारिश हुई है। वास्तव में उत्तर पूर्व के इन राज्यों में पिछले कई सालों से मानसून की बारिश बह़ुत कम हो रही है। भारत के उत्तर में लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश में दोनों जिलों में कम वर्षा हुई है। उनमें से एक कारगिल में 91 प्रतिशत बारिश की कमी है। पड़ोसी राज्य जम्मू और कश्मीर में आधे से अधिक जिले भी सामान्य बारिश से कम बारिश हुई है । उत्तर प्रदेश, पंजाब, दिल्ली, हरियाणा, उत्तराखंड, झारखंड और हिमाचल प्रदेश में भी आधे से एक तिहाई जिलों में वर्षा कम हुई है। 

यह तब है जब पूरे देश की बात करें तो इस मानसून सीजन में 31 अगस्त तक कुल बारिश सामान्य से 10 फीसदी अधिक हुई है। यदि यह स्थिति सितंबर में भी रहती है तो भारत में 25 वर्षों में पहली बार 10 प्रतिशत या उससे अधिक मानसून वर्षा होगी। भारत में मानसून की अधिकता 2019 में नौ प्रतिशत थी। पुणे में भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम) के आंकड़ों के अनुसार, लगातार दो वर्षों तक इतनी अधिक वर्षा लगभग 100 वर्षों के बाद हुई होगी।

गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 3 सितंबर, 2020 तक देश के 13 राज्यों के 256 जिलों में बाढ़ आई, जिसमें 1034 लोग मारे गए और 2 करोड़ लोग प्रभावित हुए। 12 लाख हेक्टेयर से अधिक फसल क्षेत्र और 5220 जानवर भी बाढ़ से प्रभावित हुए हैं, जिससे किसानों के लिए आजीविका संबंधी चिंताएं पैदा हो गई, जो पहले ही कोविड-19 महामारी और राष्ट्रीय लॉकडाउन की मार झेल चुके हैं।

अगर मानसून से इंसानी मौतों की बात करें तो सबसे अधिक गुजरात, मध्य प्रदेश और असम में क्रमशः 185, 179 और 139 मौतें हो चुकी हैं। प्रभावित फसल क्षेत्र के लिहाज से कर्नाटक इस सीजन में 4.5 लाख हेक्टेयर फसल के नुकसान के साथ सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। ओडिशा और असम ने भी 3.85 लाख हेक्टेयर और 2.65 लाख हेक्टेयर फसल भूमि को बाढ़ के पानी में खो दिया है। गुजरात और मध्य प्रदेश से अधिकारियों ने अभी तक फसल क्षेत्रों पर कोई प्रभाव नहीं बताया है।

विशेष रूप से गुजरात और मध्य प्रदेश में अधिकांश बाढ़ अगस्त के महीने में हुई है, जो इस साल रिकॉर्ड तोड़ बारिश देखी गई। अगस्त महीने में देश में व्यापक रूप से अधिक वर्षा 25 प्रतिशत हुई जिसने 44 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ दिया। कोलंबो, श्रीलंका में स्थित अंतर्राष्ट्रीय जल प्रबंधन संस्थान (आईडब्ल्यूएमआई) द्वारा जारी नक्शे में बताया गया है कि अगस्त में जुलाई और जून की तुलना में अगस्त में बहुत भारी वर्षा की घटनाओं ( 116 मिमी से अधिक) की संख्या में वृद्धि हुई। ऐसा (मानचित्रों में पीले और लाल क्षेत्र) देखा जा सकता है।

जून में मानसून की बारिश या तो उत्तर पूर्व भारत खासकर असम, उत्तर पश्चिम बंगाल और मेघालय में, या भारत के पश्चिमी तट पर जहां मानसून की बारिश जून के प्रारंभ में चक्रवात निसारगा आया था। मानसून की बारिश के लिए जुलाई एक सूखा महीना था, जो महीने के अंत में 10 प्रतिशत की कमी के साथ समाप्त हुआ। पश्चिमी तट और उत्तर पूर्वी भारत में भी बहुत भारी वर्षा की घटनाओं में कमी आई।

अगस्त में गुजरात से मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ से होते ओडिशा तक बनी एक विस्तृत बेल्ट में भारी बारिश हुई। मानचित्र स्पष्ट रूप से दिखाता है कि अगस्त में बारिश ने उत्तर पूर्वी क्षेत्र के कुछ हिस्सों - असम, उत्तरी पश्चिम बंगाल और मेघालय में कुछ वर्षा की घटनाओं के साथ देश के बाकी हिस्सों को छोड़ दिया।

देश भर में ला नीना के कारण भी बहुत ज्यादा बारिश हुई।आईआईटीएम, पुणे के जलवायु वैज्ञानिक, रॉक्सी मैथ्यू कोल्ल कहते हैं, "वर्तमान में हमारे पास प्रशांत क्षेत्र में ला नीना जैसी स्थितियां हैं, जो एक मजबूत मानसून परिसंचरण (सर्कुलेशन) के लिए अनुकूल हैं।" “जबकि उत्तरी अरब सागर का तापमान गर्म है। हमारे शोध से पता चलता है कि उत्तर अरब सागर का गर्म तापमान मानसून के लिए नमी और गर्मी की प्रचुर आपूर्ति प्रदान करता है और संवहन (कंवेक्शन) को बढ़ाता है। ऐसा अगस्त में देखी गया, जो भारी बारिश का कारण हो सकता है। 

वैश्विक एजेंसियां ​​यह भी संकेत देती हैं कि सितंबर में ला नीना जैसी स्थितियां प्रबल हो सकती हैं, जो भारी बारिश का कारण बन सकती है और जिससे बाढ़ के हालात बन सकते हैं।

गंगा बेसिन में सबसे अधिक बाढ़

हाल के वर्षों में बारिश के कारण बांग्लादेश, भारत और नेपाल में लाखों लोग मारे गए हैं, उनके घरों को नुकसान पहुंचा है और बाढ़ से नष्ट हुई फसलें खराब हुई हैं। इस साल के मानसून की वजह से आई बाढ़ पिछली बाढ़ों से अलग है। कोविड-19 महामारी की वजह से हालात और बिगड़ गए हैं। 1000 से अधिक लोग अपनी जान गंवा चुके हैं और गंगा बेसिन क्षेत्रों में रह रहे 1 करोड़ से अधिक लोग प्रभावित हैं। बताया गया है कि बांग्लादेश का एक तिहाई हिस्सा पिछले दो महीनों में बाढ़ से प्रभावित हुआ है। अनुमान है कि लगभग 15 लाख लोग विस्थापित हुए हैं और सैकड़ों हजारों मकान क्षतिग्रस्त हुए हैं।

आईडब्ल्यूएमआई और सीजीआईएआर रिसर्च प्रोग्राम ऑन क्लाइमेट चेंज, एग्रीकल्चर एंड फूड सिक्योरिटी ( सीसीएएफएस) ने ईएसए सेंटिनल -1 एसएआर उपग्रहों का उपयोग करते हुए मशीन लर्निंग के माहौल में तेजी से और मजबूत फ्लड मैपिंग एल्गोरिदम विकसित किया है, जो बाढ़ का अनुमान लगाने के लिए गूगल अर्थ इंजन में स्वतंत्र रूप से उपलब्ध हैं। यह आपदा प्रबंधन की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है।

पिछले पांच वर्षों से लगातार जुलाई सूखा महीना होने के बावजूद बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के कई  इलाकों में बाढ़ थी।

मानसून के दौरान गंगा घाटी में बाढ़ सामान्य घटना है। इन इलाकों में बाढ़ से निपटने के इंतजाम करने की सख्त जरूरत है।

आईडब्ल्यूएमआई ने इंडेक्स-आधारित बाढ़ बीमा (आईबीएफआई) लागू किया है, ताकि ज्यादा बाढ़ आने की स्थिति में उन्हें वित्तीय नुकसान से बचाया जा सके, किसानों को शीघ्र मुआवजा भुगतान प्राप्त हो और वे प्रकृति और इसके साथ जुड़े जोखिमों के साथ जीने में सक्षम हों।