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संरक्षित क्षेत्रों की 500 हेक्टेयर वनभूमि 68 परियोजनाओं को दी गई

2019 में नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ की स्थायी समिति ने संरक्षित क्षेत्रों में इन परियोजनाओं को हरी झंडी दी

By Ishan Kukreti

On: Friday 07 August 2020
 

Photo: Pxfuelनेशनल बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ (एनबीडल्यूएल) की स्थायी समिति द्वारा साल 2019 में संरक्षित क्षेत्रों की 481.56 हेक्टेयर वनभूमि विभिन्न परियोजनाओं को दे दी गई। संरक्षित वनभूमि में वन्यजीव अभयारण्य, राष्ट्रीय उद्यानों की भूमि भी शामिल है।   

यह जानकारी एनेलिसिस ऑफ वाइल्डलाइफ क्लीयरेंसेस इन इंडिया 2019 (जनवरी से दिसंबर) पेपर में 6 अगस्त 2020 को प्रकाशित हुई है। इसका विश्लेषण दिल्ली स्थित लीगल इनिशिएटिव फॉर फॉरेस्ट एंड एनवायरमेंट द्वारा किया गया है।

जिन 68 परियोजनाओं के लिए वनभूमि दी गई उनमें सिंचाई, रेलवे, खनन आदि शामिल हैं। स्थायी समिति ने 2019 में कुल 156 परियोजनाओं पर विचार किया जिनमें से 68 परियोजनाओं को मंजूरी प्रदान की गई। इनमें रेलवे की तीन परियोजनाएं शामिल हैं जिनमें 53 प्रतिशत भूमि वनभूमि इस्तेमाल होगी।

एनबीडब्ल्यूएल वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत गठित वैधानिक संगठन है। यह केंद्र सरकार को वन्यजीवों के संरक्षण के लिए नीतियां बनाने और सलाह देने का काम करता है।  

पेपर में कहा गया है, “वन्यजीव अभयारण्यों, राष्ट्रीय उद्यानों और संरक्षित क्षेत्र की कुल 481.56 हेक्टेयर भूमि परियोजनाओं हेतु दी गई और केवल एक प्रस्ताव खारिज किया गया है।”

इस वनभूमि में 87 प्रतिशत (418.70 हेक्टेयर) लीनियर प्रोजेक्ट, 7 प्रतिशत (35.83 हेक्टेयर) सिंचाई, 4 प्रतिशत (17.5 हेक्टेयर) आधारभूत सुविधाओं और शेष दो प्रतिशत (9.52 हेक्टेयर) खनन परियोजनाओं के लिए है।

लीनियर प्रोजेक्ट में रेलवे, सड़क, ट्रांसमिशन लाइन, पुल, सुरंग और पाइपलाइन से जुड़ी परियोजनाओं शामिल हैं।

वनभूमि का बड़ा हिस्सा रेलवे की तीन परियोजनाओं मुंबई-अहमदाबाद हाई स्पीड रेल (बुलेट ट्रेन), कैसल रॉक- कुलेम-मडगांव रेलवे डबलिंग प्रोजेक्ट (गोवा) और सकरी-बिरौल-कुशेष्वर स्थान (बिहार) परियोजनाओं के खाते में गया है।  

विश्लेषण के मुख्य लेखकों में शामिल आरके सिंह ने कहा है कि संरक्षित क्षेत्रों में पर्यावरणीय प्रभाव का कोई अध्ययन किए बिना कई परियोजनाओं की सिफारिश की जा रही है। कई परियोजनाएं पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना के दायरे में भी नहीं आती। केवल प्रभागीय वन अधिकारी की टिप्पणियों पर विचार किया जाता है। उन्होंने कहा कि कई परियोजनाएं ऐसी हैं जिन्हें कहीं और भी किया जा सकता था।