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जन आंदोलन से रुका 4000 पेड़ों का कटान

केंद्र सरकार की एक योजना के तहत इस रोड को फोर लेन किया जाना है और इसके लिए सरकार ने सैकड़ों पेड़ों की बलि लेने की योजना बना ली थी

On: Friday 09 August 2019
 
पश्चिम बंगाल के दमदम को बांग्लादेश से जोड़नेवाला जेसोर रोड पर लोगों ने इस तरह पेड़ों को बचाया। फोटो: उमेश कुमार राय
पश्चिम बंगाल के दमदम को बांग्लादेश से जोड़नेवाला जेसोर रोड पर लोगों ने इस तरह पेड़ों को बचाया। फोटो: उमेश कुमार राय पश्चिम बंगाल के दमदम को बांग्लादेश से जोड़नेवाला जेसोर रोड पर लोगों ने इस तरह पेड़ों को बचाया। फोटो: उमेश कुमार राय

उमेश कुमार राय

पश्चिम बंगाल के दमदम को बांग्लादेश से जोड़नेवाला जेसोर रोड, जिसे एनएच 112 भी कहा जाता है, को ऐतिहासिक कारणों से जाना जाता है। यह रोड 19वीं शताब्दी में बनकर तैयार हुआ था और रोड बनने के पांच-छह दशकों तक इसके किनारे काफी पेड़ लगाए गए।  अभी इस रोड की दोनों तरफ लगे ज्यादातर पेड़ों की उम्र 100 से 150 सालों से अधिक है। दमदम से पेट्रोपोल (बांग्लादेश सीमा) तक इस रोड की लंबाई 60 से 65 किलोमीटर है। वहीं, बारासात से बनगांव तक यह रोड 53 किलोमीटर के आसपास है। इस 53 किलोमीटर में करीब 4000 पेड़ हैं।

केंद्र सरकार की एक योजना के तहत इस रोड को फोर लेन किया जाना है और इसके लिए सरकार ने सैकड़ों पेड़ों की बलि लेने की योजना बना ली थी, लेकिन स्थानीय लोगों के आंदोलन और कुछ सामाजिक संस्थाओं के कड़े हस्तक्षेप तथा अदालत के स्थगनादेश के कारण इन पेड़ों को जीवनदान मिल गया।  

पेड़ बचाने के लिए कोर्ट जानेवाले संगठन एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स (एपीडीआर) से जुड़े रंजीत सुर कहते हैं, “जेसोर रोड पर लगे पेड़ सदियों पुराने हैं। इन्हें बचाने के लिए स्थानीय लोगों ने काफी संघर्ष किया। हमलोग भी इनके साथ थे। पहले जनांदोलन किया गया और बाद में कलकत्ता हाईकोर्ट में हमने जनहित याचिका दायर कर दी। दुर्भाग्य से हाईकोर्ट में हम हार गए, तो सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।”

जेसोर रोड के निर्माण के बारे में बताया जाता है कि इसे 19वीं शताब्दी की शुरुआत में बनाया गया था। बांग्लादेश के जेसोर के रहनेवाले एक धनाढ्य व्यापारी काली प्रसाद पोद्दार ने इस रोड का निर्माण कराया था। ये रोड दमदम से जेसोर तक जाती है और शायद इसलिए इसका नाम जेसोर रोड रखा गया था।

 जेसोर रोड फिलहाल टू-लेन है। नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआई) इस टू-लेन को फोरलेन बनाना चाहती है। इसके लिए सड़क के किनारे खड़े हजारों पेड़ों को काटना होगा। पेड़ों को काटने की मंजूरी लेने के लिए एनएचएआई ने राज्य के वन विभाग को पत्र लिखा और उसे तुरंत इसकी मंजूरी भी मिल गई। पहले चरण में जेसोर रोड की पांच जगहों पर 350 पेड़ काटे जाने थे। जब स्थानीय लोगों को जब इसकी जानकारी मिली, तो उन्होंने आंदोलन शुरू कर दिया। एपीडीआर व कुछ अन्य संगठन भी स्थानीय लोगों के इस आंदोलन में शामिल हो गए।

पेड़ों की कटाई के खिलाफ 21 फरवरी 2017 को एपीडीआर की तरफ से कलकत्ता हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई थी। लेकिन, तब तक 60 पेड़ काटे जा चुके थे। वर्ष 2017 के अप्रैल महीने में कलकत्ता हाईकोर्ट ने पेड़ों को काटने पर रोक लगा दी। बाद में कई सुनवाइयां हुईं। एनएचएआई की तरफ से तमाम दलीलें दी गईं और आखिरकार पिछले साल अगस्त में कलकत्ता हाईकोर्ट ने पेड़ों को काटने की इजाजत दे दी, लेकिन इस शर्त पर कि एक पेड़ की जगह पांच पेड़ अन्यत्र लगाने होंगे। लेकिन, याचिकाकर्ताओं की अपील पर कोर्ट ने आदेश को तीन हफ्ते तक लागू नहीं करने को कहा।

इधर, एक पेड़ की जगह पांच पेड़ लगाने की शर्त याचिकाकर्ताओं के लिए नाकाबिल-ए-मंजूर थी, इसलिए वे सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए। जेसोर रोड के पेड़ों को बचाने को लेकर आंदोलन में शामिल होनेवाले संगठन अरण्यक समाज से जुड़े व जेसोर रोड के रहनेवाले राहुलदेव विश्वास ने कहा, “आप एक सौ साल पुराना पेड़ काट कर अन्य जगह पांच पौधे लगा दें, ये व्यावहारिक नहीं है। दूसरी बात ये कि जेसोर रोड के पुराने पेड़ों का ऐतिहासिक महत्व है। इन पेड़ों के इर्द-गिर्द बांग्ला साहित्यकारों ने कई रचनाएं गढ़ी हैं। इसलिए हमलोगों ने हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में मामला दर्ज कराया।” सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी है और मामले की अगली सुनवाई 9 अगस्त तय की गई है।  

इसके अलावा पर्यावरण का भी मसला है। जानकार मानते हैं कि अगर जेसोर रोड पर लगे हजारों पेड़ काट दिए जाएंगे, तो आसपास की इकोलॉजी बुरी तरह प्रभावित होगी, जो अंततः आसपास रहनेवाले लोगों के लिए दुश्वारियों का बायस बनेगी। वैसे भी पश्चिम बंगाल उन सूबों में शुमार है, जहां वायु प्रदूषण से सबसे ज्यादा जानें जाती हैं।  इसी साल फरवरी में सेंटर ऑफ साइंस एंड एनवायरमेंट की तरफ से जारी एक वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 13 फीसदी मौतों की वजह वायु प्रदूषण है। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2017 में 40 प्रतिशत मौतें पश्चिम बंगाल, यूपी और महाराष्ट्र में हुईं।